फ़्रांसीसी विरासत से भगवा बदलाव तक: क्या पुडुचेरी बदल रहा है?
x

फ़्रांसीसी विरासत से भगवा बदलाव तक: क्या पुडुचेरी बदल रहा है?

पुडुचेरी के मतदाता व्यावहारिक सोच रखते हैं और उनका मानना ​​है कि केंद्र में सत्तासीन पार्टी के साथ चलना ही बेहतर है, ताकि उनके हितों की रक्षा हो सके; संभव है कि यही समीकरण एक बार फिर चुनावों के नतीजों का निर्धारण करे।


Talking Sense With Srini : पुदुचेरी केंद्र शासित प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। यहां की राजनीति में पहचान, शासन और 'राजनीतिक व्यावहारिकता' का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। 'द फेडरल' के संपादक एस. श्रीनिवासन और सहायक संपादक प्रमिला कृष्णन के विश्लेषण के अनुसार, पुदुचेरी के मतदाता बेहद व्यावहारिक हैं। वे अक्सर उसी पार्टी को चुनना पसंद करते हैं जो केंद्र की सत्ता में होती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि पुदुचेरी वित्तीय रूप से केंद्रीय अनुदान पर निर्भर है। राज्य के दर्जे की पुरानी मांग फिर से उठी है, लेकिन आर्थिक बाधाएं इस राह में रोड़ा बनी हुई हैं। यहां के लोग जानते हैं कि केंद्र के साथ तालमेल बिठाकर ही उनके हितों की रक्षा हो सकती है। यही गणना एक बार फिर चुनावी परिणामों को तय कर सकती है।



पुदुचेरी की चुनावी जंग इस बार बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। यहां की राजनीति तमिलनाडु से बिल्कुल अलग और कॉस्मोपॉलिटन है। द्रविड़ राजनीति का प्रभाव यहां उतना गहरा नहीं है जितना पड़ोसी राज्य में देखा जाता है।

राज्य के दर्जे की पेचीदगी
पुदुचेरी में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग एक चुनावी मुद्दा जरूर है, लेकिन यह विरोधाभासों से भरा है। जानकारों का मानना है कि पुदुचेरी एक छोटा क्षेत्र है जो वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। यहां शराब और वाहन पंजीकरण पर कम टैक्स है, जो पर्यटकों और राजस्व को आकर्षित करता है। यदि इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलता है, तो ये विशेष सुविधाएं खत्म हो सकती हैं। यही कारण है कि राजनीतिक दल भले ही राज्य के दर्जे की बात करें, लेकिन आर्थिक वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयां करती है।

हाइपरलोकल राजनीति का दबदबा
जमीनी स्तर पर पुदुचेरी की राजनीति बहुत ही स्थानीय है। यहां मतदाता अपने नेताओं को नाम और परिवार से जानते हैं। लोग पार्टी के चुनाव चिन्ह से ज्यादा उम्मीदवार की पहुंच और उसके द्वारा किए गए कामों को महत्व देते हैं। बुनियादी सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में सुधार ही यहां वोट पाने का असली पैमाना है। लोग उसी उम्मीदवार को तरजीह देते हैं जो उनके लिए सुलभ हो।

भाजपा और एनडीए की बढ़ती पकड़
साल 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पुदुचेरी में अपनी उपस्थिति का तेजी से विस्तार किया है। हालांकि हिंदुत्व की विचारधारा ने यहां उतनी गहरी पैठ नहीं बनाई है, लेकिन रणनीतिक रूप से भाजपा मजबूत हुई है। वर्तमान में एआईएनआरसी (AINRC) और भाजपा का गठबंधन यानी एनडीए (NDA) विपक्ष की तुलना में बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है। गठबंधन के बीच बेहतर समन्वय इनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

विपक्ष की चुनौतियां और शासन की कमी
दूसरी ओर, कांग्रेस और द्रमुक (DMK) गठबंधन के भीतर आपसी खींचतान सार्वजनिक रूप से सामने आई है, जिससे उनकी स्थिति कमजोर हुई है। हालांकि पुदुचेरी एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, लेकिन यहां शासन की कमियां साफ नजर आती हैं। खराब सड़कें, जल संकट और शहरी भीड़भाड़ जैसे मुद्दे जनता के बीच चर्चा का विषय हैं। नगर निगम की कमजोरी के कारण बुनियादी ढांचे का विकास उस गति से नहीं हो पाया है जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

शासन की कमियां

गठबंधन और वोट शेयर से परे देखें तो शासन की कमियां यहां एक बड़ी समस्या बनी हुई हैं। अपने पर्यटन आकर्षण के बावजूद पुदुचेरी बुनियादी ढांचे के संकट से जूझ रहा है। इसके आकर्षण के बावजूद यहां नगर निगम की शक्ति और मजबूती का अभाव है। खराब सड़कें, पानी की समस्या और शहरी भीड़भाड़ जैसी समस्याएं यहां आम हैं। अंततः, पुदुचेरी का मतदाता व्यावहारिक बना हुआ है। उनका मानना है कि केंद्र की सत्ता वाली पार्टी के साथ रहना ही उनके हित में है। इस केंद्र शासित प्रदेश में, जहां सत्ता नई दिल्ली से प्रवाहित होती है, यही सोच एक बार फिर नतीजों का फैसला कर सकती है।


मतदाताओं की व्यावहारिकता
अंत में, पुदुचेरी का चुनाव इसी बात पर टिक जाता है कि मतदाता अपने भविष्य को किसके साथ सुरक्षित देखते हैं। केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते यहां सत्ता की बागडोर अक्सर नई दिल्ली से जुड़ी होती है। मतदाताओं का मानना है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ रहने से उनके हितों की बेहतर सुरक्षा होगी। यह 'कैलकुलेशन' एक बार फिर चुनाव नतीजों का मुख्य आधार बन सकता है।


Read More
Next Story