
बंगाल चुनाव के पहले चरण के मतदान में 20 दिन बाकी, SIR में मतदाता सूची से नाम गायब होने को लेकर हंगामा जारी
विभिन्न समुदायों में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, विरोध प्रदर्शनों और सड़क जाम की घटनाओं ने SIR को केंद्र में ला दिया है, जबकि मतदाता इस पूरी प्रक्रिया को लेकर बंटे हुए और भ्रमित बने हुए हैं।
पिछले कुछ हफ्तों से चल रहा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध अब तेज हो गया है। कई जिलों में सड़क जाम, प्रदर्शन और प्रशासन के साथ टकराव की खबरें सामने आई हैं। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे अल्पसंख्यक बहुल जिलों से लेकर उत्तर 24 परगना के मतुआ इलाकों तक, नाराज मतदाताओं ने सड़कों को जाम किया, चुनाव कार्यालयों का घेराव किया और विरोध प्रदर्शन किए।
इस घटनाक्रम के बाद मालदा के कालियाचक क्षेत्र में न्यायिक अधिकारियों के घेराव की जांच के लिए NIA को लगाया गया है और अब तक कम से कम 35 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें ISF का एक उम्मीदवार भी शामिल है।
जो मामला शुरुआत में मतदाता सूची से नाम गायब होने और दस्तावेजी दिक्कतों की शिकायतों तक सीमित था, वह अब मतदान से ठीक पहले एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
कई नाम गायब होने का मामला
इस सप्ताह मालदा के मोथाबाड़ी, कालियाचक और आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जब सैकड़ों लोगों ने राजमार्ग जाम कर दिए और प्रशासनिक दफ्तरों का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटा दिए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, सिर्फ मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में ही करीब 30,000 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं।
प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में कहा, “पहले इस मुद्दे का समाधान होना चाहिए, उसके बाद ही चुनाव कराए जाएं।”
राज्य के कई अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आई हैं, जहां बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर नाराजगी देखी गई।
मुर्शिदाबाद के डोमकल की 62 वर्षीय रहीमा बीबी ने कहा, “मेरा नाम 20 साल से सूची में है। अचानक कहा जा रहा है कि यह ‘जांच के दायरे में’ है। अगर मैं मतदाता सूची में ही नहीं हूं, तो फिर मैं कहां हूं?”
हालांकि अधिकारियों का कहना है कि SIR एक नियमित प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना है—जिसमें डुप्लीकेट नाम, मृत मतदाता और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाया जाता है।
लेकिन जिस पैमाने और तरीके से नाम हटाए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, उसने विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी संगठनों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
बीजेपी लोगों को भ्रमित करने के लिए फुसफुसाहट वाली मुहिम (whisper campaign) चला रही है, ताकि इसका दोष हम पर डाला जा सके। नाम हटाए जाने में हमारी कोई भूमिका नहीं थी। टीएमसी समर्थकों के भी कई नाम हटाए गए हैं। सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि ये नाम क्यों हटाए गए,” बीएलओ नागेंद्रनाथ सरदार ने कहा।
प्रमुख परिवार भी प्रभावित
SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के पैमाने ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है, यहां तक कि ऐतिहासिक रूप से प्रतिष्ठित परिवार भी इससे अछूते नहीं रहे। एक चौंकाने वाले मामले में, बंगाल के पूर्व नवाब मीर जाफर के लगभग 346 वंशजों के नाम मुर्शिदाबाद के लालबाग इलाके में पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए।
एक अन्य समान मामले में, सुप्रबुद्ध सेन—जो नंदलाल बोस के नाती हैं (नंदलाल बोस ने भारत के संविधान की मूल पांडुलिपि को चित्रित किया था और भारत रत्न जैसे सरकारी पुरस्कारों के प्रतीक चिह्न डिजाइन किए थे)—का नाम भी उनकी पत्नी के साथ बीरभूम के शांतिनिकेतन में मतदाता सूची से हटा दिया गया।
सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं
विपक्ष के दावों और जमीनी रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुसलमान सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रहे हैं, लेकिन असंतोष सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं है।
उत्तर 24 परगना के बोंगांव उपखंड में, बांग्लादेश मूल के अनुसूचित जाति समुदाय मतुआ के सदस्यों ने भी अपने नाम हटाए जाने की शिकायत की है। गैघाटा के पास एक विरोध प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने एक घंटे से ज्यादा समय तक हाईवे जाम रखा और दस्तावेजी प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग की।
बगदा विधानसभा क्षेत्र में 1,993 नाम हटाए गए, जबकि गैघाटा में 2,240 नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इसी तरह बोंगांव उत्तर और दक्षिण विधानसभा क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, जिनमें लगभग सभी मतुआ समुदाय से जुड़े हैं। इनमें से कई मामले अभी भी जांच (adjudication) प्रक्रिया में हैं।
बगदा विधानसभा क्षेत्र के धुलानी ब्लॉक के सुशील बिस्वास ने कहा, “मेरे परिवार के सभी 10 सदस्यों के नाम, जिनमें मेरा बेटा जो सेना में जवान है, भी शामिल है, हटा दिए गए हैं। हम नागरिक हैं, लेकिन हमारे साथ बाहरी लोगों जैसा व्यवहार किया जा रहा है।”
महिलाएं भी अधिक प्रभावित
ग्रामीण इलाकों में महिलाएं भी इस प्रक्रिया से असमान रूप से प्रभावित हुई हैं। धुलानी में हटाए गए 129 नामों में ज्यादातर महिलाएं हैं, जिनके नाम वैवाहिक रिकॉर्ड में गड़बड़ी या उपनाम बदलने जैसी वजहों से सूची से गायब हो गए—जो भारत में आम स्थिति है।
इन बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की घटनाओं ने SIR को लेकर राजनीतिक विमर्श को जटिल बना दिया है। अब यह मुद्दा सिर्फ अल्पसंख्यकों के मताधिकार से वंचित होने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी और विभिन्न सामाजिक समूहों के सामने आने वाली बाधाओं तक फैल गया है।
इन विरोध प्रदर्शनों ने यह बहस भी छेड़ दी है कि क्या SIR प्रक्रिया अनजाने में उन समुदायों के बीच राजनीतिक एकजुटता पैदा कर रही है, जो खुद को निशाने पर महसूस कर रहे हैं, और क्या इसका चुनावी फायदा किसी पार्टी को मिल सकता है।
अब तक SIR को लेकर प्रतिक्रियाएं मिली-जुली और बंटी हुई नजर आ रही हैं, न कि किसी एक पार्टी के पक्ष में स्पष्ट झुकाव दिख रहा है।
मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से का मानना है कि मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण केंद्र सरकार के इशारे पर उनकी समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया गया। टीएमसी नेताओं ने इस नैरेटिव को और मजबूत करते हुए चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच कथित “ईसी-बीजेपी गठजोड़” का आरोप लगाया है, जिसका उद्देश्य हाशिए पर पड़े समूहों को मताधिकार से वंचित करना है।

