
27 लाख वोटर्स का सवाल, क्या बंगाल चुनाव तय करेंगे भविष्य की प्रक्रिया?
बंगाल में 27 लाख नाम हाल ही में न्यायिक जांच के बाद हटाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने या देरी करने वाली राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर बड़े पैमाने पर मतदाता बहिष्कार और सुनियोजित चुनावी प्रक्रिया के आरोपों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अंतिम समय तक वोटर लिस्ट में संशोधन और केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती ने चुनावी पारदर्शिता और लोकतंत्र को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। इस विषय पर द फेडरल ने उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और कोलकाता स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के अध्यक्ष प्रो. ओम प्रकाश मिश्रा से बातचीत की।
वोटर लिस्ट में लगातार बदलाव पर सवाल
प्रो. मिश्रा का कहना है कि चुनावी रोल का अपडेट होना सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें नए मतदाता जुड़ते हैं और मृत या स्थानांतरित लोगों के नाम हटाए जाते हैं। लेकिन SIR के नाम पर जो हो रहा है, वह चिंताजनक है। यह प्रक्रिया मतदाताओं को शामिल करने के बजाय बाहर करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। उनके अनुसार, “अब स्थिति यह हो गई है कि लोग सरकार नहीं चुन रहे, बल्कि मतदाताओं को ही चुना जा रहा है। यह अभूतपूर्व है और संवैधानिक सीमाओं के करीब है।”
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर उठे सवाल
मतदाताओं के नाम हटाने के लिए “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे प्रो. मिश्रा ने पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने कहा कि यह चुनाव आयोग द्वारा गढ़ा गया एक नया आधार है, जिसका उद्देश्य कुछ राजनीतिक अपेक्षाओं को पूरा करना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी पत्नी, जो 30 वर्षों से मतदाता हैं, उनका नाम भी इसी आधार पर सूची से हटा दिया गया था, जिसे बाद में जोड़ा गया। यहां तक कि एक जज के परिवार के साथ भी ऐसा हुआ। नामों की मामूली स्पेलिंग भिन्नता—जैसे अहमद/अहम्मद या चट्टोपाध्याय/चटर्जी—को भी हटाने का आधार बनाया गया है।
किन वर्गों पर पड़ा असर
हालांकि शुरुआत में यह प्रक्रिया कुछ खास समुदायों को प्रभावित करने के लिए मानी जा रही थी, लेकिन अब इसका असर व्यापक हो गया है। खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्ग—जैसे मतुआ, आदिवासी और राजबंशी समुदाय—इससे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।करीब 60 लाख लोगों को चिह्नित किया गया, जिनमें से कुछ के नाम बहाल हुए, लेकिन अभी भी लगभग 27–28 लाख लोग वोटिंग से बाहर हैं।
क्या वाकई जरूरी था यह अभ्यास?
प्रो. मिश्रा के अनुसार, पश्चिम बंगाल का वोटर-टू-पॉपुलेशन अनुपात अन्य राज्यों के समान या बेहतर है। इसके बावजूद बंगाल को समस्या वाले राज्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।जब मूल तर्क कमजोर पड़ गया, तो “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” का नया आधार सामने लाया गया। यहां तक कि पासपोर्ट और लंबे समय से वोट डालने वाले लोगों के नाम भी हटाए गए हैं।
जमीनी स्तर पर प्रतिक्रिया
इस प्रक्रिया को लेकर लोगों में भ्रम कम और नाराजगी ज्यादा है। कई परिवारों में एक-दो सदस्यों के नाम हटाए गए हैं, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ है। नागरिक समाज और विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर मुखर हैं, और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
केंद्रीय बलों की तैनाती पर सवाल
पश्चिम बंगाल में सुरक्षा बलों की तैनाती नई बात नहीं है, लेकिन इस बार इसका स्तर अभूतपूर्व है—देश के लगभग 60% केंद्रीय बल यहां तैनात किए गए हैं। प्रो. मिश्रा के अनुसार, यह आवश्यकता से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने जैसा लगता है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को मान्यता दी है, लेकिन इस मामले में स्पष्ट और निर्णायक फैसला नहीं दिया। इससे प्रक्रिया जारी रहने का रास्ता खुल गया। कोर्ट ने कुछ राहत जरूर दी, लेकिन मुख्य सवाल क्या SIR अनिवार्य है का जवाब नहीं दिया।
क्या 2026 चुनाव टर्निंग पॉइंट होगा?
प्रो. मिश्रा मानते हैं कि यह चुनाव भारत की चुनावी प्रक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। अगर ऐसी प्रक्रियाएं जारी रहीं, तो यह लोकतंत्र की मूल संरचना को बदल सकती हैं। हालांकि, जनता की मजबूत प्रतिक्रिया इसे लोकतांत्रिक मूल्यों को फिर से स्थापित करने का उदाहरण भी बना सकती है।
27 लाख मतदाताओं का असर
जिन 27 लाख लोगों को वोट देने से वंचित किया गया, वे अब राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हो गए हैं। प्रो. मिश्रा के अनुसार, इनमें से कई लोग पहले राजनीति में सक्रिय नहीं थे, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें संगठित कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि यह स्थिति उस पक्ष के खिलाफ जा सकती है, जिसने इस प्रक्रिया को डिजाइन किया था।

