
बंगाल में 91 लाख वोटरों के नाम हटे: “चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी” | AI With संकेत
वरिष्ठ पत्रकारों ने पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर मतदाता नाम हटाए जाने को “विश्वसनीयता संकट” बताया है और कहा है कि इससे चुनाव की निष्पक्षता, समय और असर को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पश्चिम बंगाल में 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने से चुनाव आयोग के सामने एक बड़ा “विश्वसनीयता संकट” खड़ा हो गया है। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि इस कदम से यह चिंता बढ़ गई है कि क्या यह प्रक्रिया आगामी चुनावों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है।
इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और उसके समय को लेकर निष्पक्षता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
AI With Sanket के ताजा एपिसोड में, The Federal ने वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी और शिखा मुखर्जी से बात की। इसमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के प्रभाव, इसके इर्द-गिर्द राजनीतिक नैरेटिव और चुनावी संस्थाओं पर इसके असर पर चर्चा की गई।
विश्वसनीयता पर सवाल
91 लाख नाम हटाए जाने का पैमाना सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है। शिखा मुखर्जी ने कहा कि यह आंकड़ा “सीधे झकझोर देने वाला” है, खासकर तब जब पहले 58 लाख नाम हटाने को लेकर ही बहस चल रही थी।
उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर धारणा तेजी से बदल रही है और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी को एक साथ जोड़कर देखने लगे हैं। उनके मुताबिक, यह भरोसे में गहरी कमी को दर्शाता है।
मुखर्जी ने कहा कि राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य पश्चिम बंगाल में ऐसी धारणा बेहद महत्वपूर्ण है। “चुनाव आयोग ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है,” उन्होंने कहा, और जोड़ा कि कई लोग इस पूरी प्रक्रिया को “केंद्र द्वारा बंगाल पर थोपा गया खाका” मान रहे हैं।
धारणा भी उतनी ही अहम
नीरजा चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही धारणा भी। “अगर चुनाव लड़ने वाली कोई बड़ी पार्टी यह महसूस करती है कि उसके साथ न्याय नहीं हो रहा, तो चुनाव आयोग को जवाब देना चाहिए,” उन्होंने कहा।
उन्होंने कहा कि आयोग, एक “अंपायर” के रूप में, संदेह से ऊपर रहना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में व्यापक असहजता देखने को मिल रही है, खासकर चुनाव के इतने करीब इस प्रक्रिया के समय को लेकर।
नीरजा चौधरी ने इस प्रक्रिया में जल्दबाज़ी पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा, “अभी ही क्यों?” और सुझाव दिया कि यह प्रक्रिया पहले भी की जा सकती थी या फिर इसके पूरा होने तक चुनाव टाले जा सकते थे।
समय को लेकर बहस
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के समय को एक बड़ा मुद्दा माना जा रहा है। शिखा मुखर्जी ने कहा कि “यह SIR बिल्कुल भी सामान्य नहीं है”, बल्कि पैमाने और तरीके दोनों में “असाधारण” है।
उन्होंने इसे “पश्चिम बंगाल के लोगों पर सज़ा जैसा” बताया और कहा कि “डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट” जैसे नैरेटिव ने इस प्रक्रिया के शुरू होने से पहले ही लोगों के मन में डर पैदा कर दिया था।
उनके अनुसार, इस प्रक्रिया ने भय का माहौल बना दिया, जिसमें ऐसी खबरें भी सामने आईं कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, उनके बैंक खाते फ्रीज हो सकते हैं या उन पर यात्रा प्रतिबंध लग सकते हैं।
लागू करने में खामियां
मुखर्जी ने कार्यान्वयन में गंभीर विसंगतियों की ओर इशारा किया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “कहीं मां का नाम सूची में है, लेकिन बेटे और पोती के नाम हटा दिए गए हैं”, जो समझ से परे है।
उन्होंने कहा कि अगर यह प्रक्रिया सामान्य होती, तो ऐसी गड़बड़ियां नहीं होतीं। “अगर ERO और BLO को अपना काम सही तरीके से करने दिया जाता, तो यह सब नहीं होता,” उन्होंने कहा।
उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया, जहां पासपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय यात्रा इतिहास रखने वाले लोगों के नाम भी सूची से हटा दिए गए, जिससे प्रक्रिया की सटीकता पर और सवाल उठते हैं।
‘छोटी संख्या नहीं’
दोनों पैनलिस्ट इस बात पर सहमत थे कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की जांच जरूरी है।
नीरजा चौधरी ने कहा कि कुछ नाम हटाए जाना सही हो सकता है—जैसे मृत्यु या पलायन के कारण—लेकिन “91 लाख कोई छोटी संख्या नहीं है।”
उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा खुद दर्शाता है कि वर्षों से मतदाता सूची को ठीक से अपडेट नहीं किया गया। “यह दिखाता है कि चुनाव आयोग ने समय-समय पर अपना काम ठीक से नहीं किया,” उन्होंने कहा।
निर्णय प्रक्रिया (Adjudication) में कमी
एक और बड़ी चिंता निर्णय प्रक्रिया (adjudication) में स्पष्टता की कमी को लेकर जताई गई।
शिखा मुखर्जी ने जोर देकर कहा कि जिन लोगों के नाम समीक्षा के तहत रखे गए हैं, उन्हें इसके स्पष्ट कारण बताए जाने चाहिए।
“आप सिर्फ यह नहीं कह सकते कि यह एक तकनीकी गलती थी,” शिखा मुखर्जी ने कहा। उन्होंने जोड़ा कि कई मामलों में कोई स्पष्टीकरण ही नहीं दिया गया। उन्होंने ट्रिब्यूनल स्थापित करने में हो रही देरी पर भी सवाल उठाया। घोषणाओं के बावजूद “दो हफ्ते से अधिक” समय बीत चुका है, लेकिन ट्रिब्यूनल अभी तक पूरी तरह काम नहीं कर रहे हैं, जिससे प्रभावित लोगों के पास कोई ठोस विकल्प नहीं बचा है।
कानूनी रास्ता
नीरजा चौधरी ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप अब लगभग अनिवार्य हो सकता है। “आप और कहां जाएंगे?” उन्होंने सवाल किया और कहा कि जब खुद चुनाव आयोग पर ही संदेह हो, तो अदालत ही एकमात्र रास्ता बचती है।
उन्होंने याद दिलाया कि ममता बनर्जी पहले भी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुकी हैं, जिसे उन्होंने कानूनी और राजनीतिक—दोनों कदम बताया। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि चुनाव के इतने करीब कानूनी प्रक्रिया मामले को और जटिल बना सकती है।
मतदाताओं की परेशानी
चर्चा में आम मतदाताओं पर पड़ रहे बोझ को भी उजागर किया गया। नीरजा चौधरी ने बताया कि लोग “लंबी कतारों में खड़े होकर अपने दस्तावेज़ ठीक कराने की कोशिश कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया “यूज़र-फ्रेंडली” नहीं है, खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए। “आप अपने नागरिकों को इस तरह की परेशानियों से नहीं गुजार सकते,” उन्होंने कहा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि वोट देने का अधिकार यह भी सुनिश्चित करता है कि यदि किसी का नाम मतदाता सूची से हटाया जाए, तो उसे अपनी बात रखने का मौका मिले—एक ऐसा सिद्धांत, जो उनके अनुसार फिलहाल कमजोर पड़ता दिख रहा है।
नए मतदाताओं को जोड़ने की कमी
एक और अहम मुद्दा नए मतदाताओं को जोड़ने पर ध्यान की कमी को लेकर उठाया गया। नीरजा चौधरी ने कहा कि बढ़ती आबादी में मतदाता सूची में नाम हटाने के साथ-साथ नए नाम भी जुड़ने चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया, “ऐसा क्यों है कि हम सिर्फ नाम हटाने की ही बातें सुन रहे हैं?” और अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कई कोशिशों के बावजूद उन्हें अपने वोटर रजिस्ट्रेशन को अपडेट कराने में कठिनाई हुई।
शिखा मुखर्जी ने भी इस चिंता को दोहराते हुए कहा कि ध्यान नाम हटाने पर ज्यादा और नए मतदाताओं को शामिल करने पर कम दिखाई देता है।
राजनीतिक असर
इस पूरी प्रक्रिया के राजनीतिक असर को लेकर स्थिति अनिश्चित लेकिन महत्वपूर्ण है। मुखर्जी ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर बना नैरेटिव वास्तविक आंकड़ों से ज्यादा मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि “डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट” पर जोर एक व्यापक वैचारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो इस प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है।
नीरजा चौधरी ने जोड़ा कि पारदर्शिता और स्पष्टता की कमी से “मिलीभगत” जैसे संदेह पैदा हो रहे हैं, यहां तक कि उन लोगों में भी जो बड़े स्तर पर गड़बड़ी में विश्वास नहीं रखते।
अंतिम निष्कर्ष
दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखे कि मतदाता सूची की सफाई जरूरी है, लेकिन मौजूदा प्रक्रिया सवालों के जवाब देने के बजाय और सवाल खड़े कर रही है।
शिखा मुखर्जी ने साफ शब्दों में कहा, “चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी।”
वहीं, नीरजा चौधरी ने निष्कर्ष निकाला कि पूरी प्रक्रिया में भरोसा पैदा होना चाहिए। “यह आपको यह भरोसा नहीं दिलाती कि सब कुछ ठीक है,” उन्होंने कहा।

