फॉर्म-6 बना चुनावी मुद्दा, बंगाल में गड़बड़ी के आरोपों से सियासी उबाल
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फॉर्म-6 बना चुनावी मुद्दा, बंगाल में गड़बड़ी के आरोपों से सियासी उबाल

बंगाल में फॉर्म-6 के हजारों आवेदन से चुनावी गड़बड़ी के आरोप, पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल उठ रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि आयोग सही से काम नहीं कर रहा।


पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने आरोप लगाया है कि एक ही दिन में करीब 30,000 आवेदन जमा किए गए, जिससे चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। इस मुद्दे ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है।

इस विषय पर चर्चा के दौरान टीएमसी प्रवक्ता शुभनाकर भट्टाचार्य, वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी और द फेडरल के समीर के पुरकायस्थ ने इस पूरे मामले की गंभीरता, विश्वसनीयता और चुनावों पर इसके संभावित असर पर बातचीत की।

फॉर्म-6 विवाद क्या है?

टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि कम समय में कई विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में आवेदन जमा किए गए, जिससे संगठित तरीके से गड़बड़ी की आशंका बढ़ती है। शुभनाकर भट्टाचार्य ने इस प्रक्रिया को “सबसे भ्रष्ट” करार देते हुए कहा कि यह चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश है। उन्होंने यह भी कहा कि जनगणना में देरी और अचानक मतदाता सूची संशोधन इस समस्या की जड़ हो सकते हैं।उनके मुताबिक, यह सिर्फ पश्चिम बंगाल का मुद्दा नहीं है, बल्कि बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में भी इसी तरह के पैटर्न देखने को मिले हैं।

विपक्ष की प्रतिक्रिया पर सवाल

भट्टाचार्य ने कांग्रेस और वाम दलों की कमजोर प्रतिक्रिया की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह समय सभी विपक्षी दलों के एकजुट होने का था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके अनुसार, पहले राज्यों में इस तरह की घटनाओं पर ठोस कार्रवाई न होने से ऐसी प्रवृत्तियां बढ़ी हैं।

कानूनी पहलू

इस मामले में कानूनी सवाल भी उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, बड़ी संख्या में एक साथ आवेदन जमा करने पर रोक है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन नियमों का उल्लंघन हुआ है।

समय और प्रक्रिया पर सवाल

शिखा मुखर्जी ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी फॉर्म-6 जमा होना असामान्य है। उन्होंने कहा कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसा नहीं होता। इसलिए चुनाव आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि आवेदन जमा करने और उन्हें निपटाने की समय-सीमा क्या है।

पारदर्शिता की कमी

चर्चा में सबसे बड़ा मुद्दा चुनाव आयोग की चुप्पी रहा। मुखर्जी ने कहा कि आयोग ने राजनीतिक दलों से बैठकें तो की हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। समीर पुरकायस्थ ने भी कहा कि जानकारी की कमी से लोगों के बीच संदेह बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि कई पूरक मतदाता सूचियां जारी हुई हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि किन नामों को जोड़ा या हटाया गया है।

राजनीतिक असर

पुरकायस्थ का मानना है कि यह विवाद चुनावी मुद्दों को बदल सकता है। अब यह मामला चुनाव का मुख्य मुद्दा बनता जा रहा है, जबकि भ्रष्टाचार और शासन से जुड़े अन्य मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की अस्पष्टता टीएमसी के आरोपों को मजबूती दे सकती है।

जनसंख्या और बाहरी वोटर का मुद्दा

टीएमसी ने यह भी आरोप लगाया कि दूसरे राज्यों के लोगों को पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में शामिल किया जा रहा है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि नहीं हो पाई है। शिखा मुखर्जी ने कहा कि अगर ऐसा हो रहा है तो इसमें प्रवासी या विभाजन के बाद बसे लोग शामिल हो सकते हैं, लेकिन बिना आधिकारिक आंकड़ों के कुछ कहना मुश्किल है।

जमीनी स्तर पर भ्रम

मतदाताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति है। मुखर्जी ने बताया कि एक ही परिवार के कुछ लोगों के नाम सूची में हैं, जबकि कुछ के नहीं। यहां तक कि पासपोर्ट जैसे वैध दस्तावेज रखने वाले लोगों के नाम भी हटाए जाने की खबरें हैं, जिससे सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। पुरकायस्थ ने कहा कि जानकारी की कमी के कारण लोग अपनी स्थिति तक सही से जांच नहीं कर पा रहे हैं।

संस्थाओं पर भरोसा घटा

चर्चा में यह भी सामने आया कि इस तरह की घटनाओं से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो रहा है। अधिकारियों के बार-बार तबादले, प्रक्रिया में स्पष्टता की कमी और असंगत फैसलों ने संदेह का माहौल पैदा कर दिया है।

हालांकि समाधान को लेकर कोई एक राय नहीं बनी, लेकिन सभी ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग को पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए। शिखा मुखर्जी ने कहा कि आयोग को समय-सीमा, प्रक्रिया और डेटा को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर यह विवाद और गहरा सकता है और पहले से तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल को और जटिल बना सकता है।

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