AI Impact Summit: बड़े मंच पर बड़ी बातें, क्या दिखेगा असली असर?
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AI Impact Summit: बड़े मंच पर बड़ी बातें, क्या दिखेगा असली असर?

दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट के बीच प्रभाव, निवेश, नियमन और समान पहुंच पर बहस तेज है, सवाल है कि क्या घोषणाएं जमीनी बदलाव ला पाएंगी।


AI Impact Summit News: दिल्ली में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट का आगाज हो चुका है। इसके नाम से ही संकेत मिलता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब महज महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि ठोस परिणामों की दिशा में बढ़ रही है। हालांकि, जब नीति-निर्माता, स्टार्टअप संस्थापक और शोधकर्ता इस ऐतिहासिक सम्मेलन में जुटे हैं, तब इम्पैक्ट यानी प्रभाव के वास्तविक अर्थ पर ही बहस छिड़ गई है।

‘सम्मेलन का मुख्य मूल्य’

एमिटी सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के निदेशक एम.के. दत्ता के अनुसार, इस सम्मेलन का सबसे बड़ा महत्व समाज के विभिन्न वर्गों में एआई के प्रति जागरूकता और भागीदारी बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन से अलग-अलग आयु वर्ग, पेशों और लिंग समूहों के लोगों में एआई के प्रति समझ और स्वीकार्यता बढ़ती है।

उनका मानना है कि विविध हितधारकों को एक मंच पर लाना अपने आप में एक बड़ा प्रभाव है। इससे विभिन्न क्षेत्रों को नवाचार के माध्यम से अपनी समस्याओं के समाधान का अवसर मिलता है। उनके अनुसार, यही कारण है कि इम्पैक्ट शब्द इस सम्मेलन के लिए उपयुक्त है।

भारत को मजबूत सुरक्षा ढांचे की जरूरत

डिजिटल फ्यूचर्स लैब की संस्थापक और कार्यकारी संपादक उर्वशी अनेजा, जो प्रौद्योगिकी की नैतिकता और शासन पर काम करती हैं, मानती हैं कि प्रभाव पर जोर देना समयानुकूल है, लेकिन वह केवल दृश्यता को परिणाम मान लेने के खिलाफ चेतावनी देती हैं। उन्होंने कहा कि एआई को लेकर वर्तमान उत्साह के दौर में यह सवाल अहम है कि क्या यह तकनीक अपने वादों को पूरा कर पाएगी। खासकर वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए, जो विकास में छलांग लगाने और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एआई में भारी निवेश कर रहे हैं।

अनेजा के अनुसार, एआई का प्रसार या अपनाया जाना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसका प्रभाव सकारात्मक ही होगा। यदि भारत वास्तव में प्रभाव सुनिश्चित करना चाहता है, तो उसे एआई प्रणालियों के मूल्यांकन में निवेश करना होगा और उनकी सुरक्षा के लिए ठोस नियामक ढांचा तैयार करना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि एआई की वास्तविक जरूरत कहां है, न कि इसे हर समस्या का समाधान मान लिया जाए।

‘सुलभता और पहुंच अहम मुद्दे’

प्रभाव की चर्चा के साथ-साथ एआई की लागत और पहुंच भी बड़ी चिंता है। दत्ता का कहना है कि यदि विशेष प्रयास नहीं किए गए, तो एआई केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रह जाएगा। उन्होंने कहा कि एआई अभी भी महंगी तकनीक है। सुपरकंप्यूटर जैसी आधारभूत संरचना के बिना छोटे खिलाड़ी इसमें भाग नहीं ले सकते। यदि कोई बड़ी कंपनी नहीं है, तो बड़े पैमाने पर एआई का उपयोग कठिन होगा। इसलिए ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना जरूरी है, जिसमें एमएसएमई और स्टार्टअप भी प्रवेश कर सकें।

उनके अनुसार, ऐसे सम्मेलन नवाचार और पूंजी के बीच सेतु का काम करते हैं। यहां विचार रखने वाले नवप्रवर्तक निवेशकों और वेंचर कैपिटल से जुड़ सकते हैं, जिससे विचारों को वित्तीय समर्थन मिल सके।

‘लगातार निवेश की जरूरत’

जामिया मिलिया इस्लामिया के कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर खालिद रजा का मानना है कि केवल दृष्टि प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं, उसे स्थायी निवेश से समर्थन देना होगा। उन्होंने कहा कि भारत ने वैश्विक एआई एजेंडा को आकार देने की महत्वाकांक्षा जताई है, लेकिन इसे साकार करने के लिए उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (HPC) अवसंरचना, बड़े और गुणवत्तापूर्ण डेटा सेट निर्माण और शैक्षणिक संस्थानों में दीर्घकालिक शोध क्षमता सुदृढ़ीकरण में निरंतर निवेश आवश्यक है।

रजा का यह भी कहना है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को एआई संसाधनों तक समान पहुंच देना एक समावेशी और नवाचार-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए जरूरी है।

संभावित नतीजों की उम्मीद

रजा को उम्मीद है कि सम्मेलन से राष्ट्रीय एआई कंप्यूटिंग ढांचे के विस्तार, अकादमिक-उद्योग-सरकार सहयोग की मजबूती और जिम्मेदार एआई विकास को बढ़ावा देने वाली अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की घोषणाएं होंगी।उनके अनुसार, यदि भारत अपनी प्रतिभा, अकादमिक उत्कृष्टता, स्टार्टअप नवाचार और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को समन्वित राष्ट्रीय एआई कार्यक्रमों में एकीकृत कर सके, तो वह वैश्विक स्तर पर अनुप्रयुक्त और समावेशी एआई विकास का एक विशिष्ट मॉडल स्थापित कर सकता है।

केंद्रीकरण पर आलोचना

हालांकि सम्मेलन को लेकर आलोचनाएं भी सामने आई हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) के संस्थापक निदेशक अपार गुप्ता ने आरोप लगाया है कि निर्णय लेने की शक्ति सीमित दायरे में केंद्रित है। उनके अनुसार, सम्मेलन का आधिकारिक कार्यक्रम पिछले आयोजनों की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत है, लेकिन एजेंडा तय करने की शक्ति मुख्य रूप से सरकार और बड़ी तकनीकी कंपनियों के हाथों में है।

उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रमों का बड़ा हिस्सा केंद्रीय और राज्य आईटी विभागों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित है। जबकि श्रमिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों या हाशिए पर मौजूद समुदायों के लिए समान स्तर का मंच उपलब्ध नहीं है।

‘क्या यह सम्मेलन वास्तविक बदलाव लाएगा?’

गुप्ता ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस सम्मेलन से निकले दस्तावेज और घोषणाएं वास्तविक बदलाव में बदलेंगी या यह महज एक भव्य आयोजन बनकर रह जाएगा। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि कई सार्वजनिक अधिकारी, शोधकर्ता और नागरिक समाज प्रतिनिधि ईमानदारी से भाग ले रहे हैं, लेकिन सम्मेलन की संरचना और संदर्भ शायद उनके प्रयासों को पर्याप्त महत्व न दे।

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट महत्वाकांक्षा और संभावनाओं का मंच है। लेकिन इम्पैक्ट का वास्तविक अर्थ तभी सामने आएगा जब घोषणाएं जमीन पर ठोस बदलाव में बदलेंगी। जागरूकता, निवेश, नियमन, समान पहुंच और पारदर्शिता इन सबके संतुलन से ही भारत एआई के क्षेत्र में प्रभावी और समावेशी भूमिका निभा सकेगा।

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