
मंशा तो है लेकिन दिशा कहां? बजट 2026 पर विशेषज्ञों की चिंता
बजट 2026 में सरकार ने राजकोषीय अनुशासन और स्थिरता पर जोर दिया, लेकिन वैश्विक चुनौतियों के बीच दीर्घकालिक विकास रणनीति को लेकर सवाल बने हुए हैं।
भारत का बजट 2026 सुर्खियां बटोरने वाले बड़े ऐलानों से कम और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक कसावट पर ज्यादा केंद्रित नजर आता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बजट को 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में चल रहे दीर्घकालिक सुधारों की यात्रा का एक और कदम बताया है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य से निपटने के लिए इसमें कोई ठोस और विश्वसनीय रोडमैप नजर नहीं आता।
‘टॉकिंग सेंस विद स्रिनी’ कार्यक्रम के दौरान द फेडरल के प्रधान संपादक एस. श्रीनिवासन ने कहा कि यह एक कामचलाऊ बजट है, जो नए रास्ते खोलने के बजाय खाली जगहों को भरता नजर आता है। उनके मुताबिक, सरकार ने बड़े प्रोत्साहन पैकेज देने के बजाय राजकोषीय अनुशासन और मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता पर दांव लगाया है।
बजट में अगले वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है, जो मौजूदा 4.4 प्रतिशत से थोड़ा कम है। साथ ही करीब 7 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान जताया गया है। बुनियादी ढांचे पर खर्च लगभग 1 लाख करोड़ रुपये बढ़ाया गया है, जिससे कुल पूंजीगत व्यय 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। रक्षा बजट में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है, जबकि रक्षा क्षेत्र में पूंजीगत खरीद लगभग 22 प्रतिशत बढ़ी है।
वैश्विक चुनौतियों का दबाव
श्रीनिवासन ने कहा कि ये आंकड़े सरकार के मैक्रोइकोनॉमिक मजबूती के दावे को मजबूत करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि जब वैश्विक चुनौतियां तेज हो रही हों, तब क्या यह पर्याप्त है? इन चुनौतियों में पश्चिमी देशों में बढ़ता संरक्षणवाद, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से प्रेरित तेज तकनीकी बदलाव शामिल हैं।
हालांकि भारत में महंगाई फिलहाल नियंत्रण में है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक ‘गोल्डीलॉक्स स्थिति’ कहता है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल स्थिरता से दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास सुनिश्चित नहीं हो सकता।
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री कलैयारासन ने कहा कि आज अर्थव्यवस्था स्वस्थ दिख रही है, लेकिन यह अपने आप हमें कल के लिए तैयार नहीं करती। बजट अल्पकालिक मैक्रो स्थिरता को संबोधित करता है, लेकिन उत्पादक क्षमता बढ़ाने की दीर्घकालिक रणनीति स्पष्ट नहीं है।
आर्थिक सर्वेक्षण और बजट के बीच अंतर
कलैयारासन ने आर्थिक सर्वेक्षण और बजट के बीच तालमेल की कमी की ओर भी इशारा किया। उनके अनुसार, जहां आर्थिक सर्वेक्षण में तकनीकी उन्नयन, विनिर्माण विस्तार और संस्थागत क्षमता निर्माण की जरूरत पर जोर दिया गया था, वहीं बजट में इन लक्ष्यों को हासिल करने के तरीकों पर बहुत कम स्पष्टता है।
उन्होंने कहा कि भारत की एक संरचनात्मक कमजोरी यह है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार मुख्य रूप से पूंजी प्रवाह से बनता है, न कि निर्यात अधिशेष से। इससे अर्थव्यवस्था अचानक पूंजी निकासी के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है, जबकि चीन ने अपने भंडार मजबूत विनिर्माण निर्यात के जरिए बनाए हैं।
एमएसएमई सेक्टर पर फोकस
बजट में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर नए सिरे से जोर दिया गया है। सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये का इक्विटी फंड, क्रेडिट गारंटी के विस्तार और चुनिंदा ‘एमएसएमई चैंपियंस’ के लिए पेशेवर और तकनीकी सहायता देने की घोषणा की है।
श्रीनिवासन ने कहा कि एमएसएमई को सबसे ज्यादा जरूरत वित्त तक पहुंच और तकनीक तक पहुंच की होती है। बजट वित्तीय पहलू को तो संबोधित करता है, लेकिन तकनीक के सवाल पर अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है।
कलैयारासन ने और कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि भारत अब तक उस रास्ते को दोहराने में सफल नहीं हो पाया है, जहां सूक्ष्म इकाइयां धीरे-धीरे छोटी, फिर मध्यम और अंततः बड़ी कंपनियों में बदलती हैं। एमएसएमई, बड़ी कंपनियों और विदेशी निवेशकों के बीच मजबूत संबंधों के बिना उत्पादकता कम ही रहेगी।
दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की चुनौती केवल सेमीकंडक्टर या रक्षा जैसे उच्च-स्तरीय रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना नहीं है, बल्कि कम लागत वाले उपभोक्ता उत्पादों का बड़े पैमाने पर विनिर्माण भी है। एक ऐसा क्षेत्र जहां चीन अब भी आगे है। कलैयारासन ने कहा कि बजट मंशा जरूर दिखाता है, लेकिन स्पष्ट और ठोस दीर्घकालिक रोडमैप के बिना यह मंशा भारत को वह रणनीतिक मजबूती नहीं दिला पाएगी, जिसकी उसे जरूरत है।

