दावों के पीछे हकीकत, बजट में भारतीय रेल की अनदेखी
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दावों के पीछे हकीकत, बजट में भारतीय रेल की अनदेखी

बजट 2026 में इन्फ्रास्ट्रक्चर के दावों के बावजूद भारतीय रेल की गिरती यात्री-माल ढुलाई, क्षमता संकट और बढ़ते कर्ज पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।


Indian Railways in Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का ताज़ा बजट कुछ वैसा ही प्रतीत होता है, जैसे कोई जिद्दी बच्चा यह सोचकर अपना रिपोर्ट कार्ड छिपा ले कि इससे उसके खराब प्रदर्शन पर ध्यान नहीं जाएगा। खास तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को बूस्ट देने को लेकर बजट में किए गए भारी-भरकम दावों के बावजूद, लगातार तीसरे साल वित्त मंत्री ने अपने 90 मिनट के बजट भाषण में भारतीय रेल का कोई जिक्र नहीं किया।

सबसे अहम बात यह है कि रेलवे की दो सबसे गंभीर समस्याओं रेल यातायात में कमजोर प्रदर्शन और क्षमता विस्तार के लिए लगातार अपर्याप्त फंडिंग का जिक्र न कर यह मान लिया गया है कि हालात सामान्य दिखाए जा सकते हैं। बजट के आंकड़ों से ज्यादा चिंताजनक यह है कि मौजूदा वर्ष में भारतीय रेल के कमजोर प्रदर्शन पर कोई संदर्भ ही नहीं दिया गया। जबकि यही संदर्भ यह समझने के लिए जरूरी था कि रेलवे के लिए आगे क्या रखा गया है।

आने वाले वित्त वर्ष को छोड़िए, जिस पर यह बजट केंद्रित है मौजूदा वर्ष में ही रेलवे यात्री और माल ढुलाई, दोनों के उन लक्ष्यों से चूक चुकी है, जो वित्त मंत्री ने पिछले साल तय किए थे।

यात्री यातायात में ठहराव

सबसे पहले यात्री यातायात की स्थिति देखें। पिछले साल वित्त मंत्री ने 1,311 अरब पैसेंजर किलोमीटर (PKM) का लक्ष्य रखा था, जो 2024-25 की तुलना में 16 प्रतिशत अधिक था। लेकिन चालू वर्ष के संशोधित अनुमानों के मुताबिक, यात्री यातायात इस लक्ष्य से 11 प्रतिशत कम रहेगा। वास्तव में, यह पिछले वर्ष के मुकाबले केवल 3.4 प्रतिशत की मामूली बढ़त दर्शाता है।

इसके बावजूद या शायद यह जानते हुए कि अगले साल जनता का ध्यान किसी और दिशा में चला जाएगा। वित्त मंत्री ने 2026-27 में यात्री यातायात में 5 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का अनुमान पेश किया है।

माल ढुलाई भी निराशाजनक

माल ढुलाई की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है, जबकि यही रेलवे के ऑपरेटिंग मुनाफे का प्रमुख स्रोत है। पिछले साल 2025-26 के लिए 967 अरब नेट टन किलोमीटर (NTK) का लक्ष्य रखा गया था, जो खुद 2024-25 के स्तर से थोड़ा कम था। अब संशोधित अनुमान बताते हैं कि चालू वर्ष में माल ढुलाई पिछले वर्ष की तुलना में 1.3 प्रतिशत कम रहेगी। इसके बावजूद, 2026-27 के लिए करीब 4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान पेश कर दिया गया है।

2030 के लक्ष्य से बहुत पीछे रेलवे

अगर माल ढुलाई के प्रदर्शन को 2021 में बनाए गए राष्ट्रीय रेल योजना (नेशनल रेल प्लान) के लक्ष्यों से तुलना करें, तो स्थिति और चिंताजनक नजर आती है। इस योजना में 2030 तक रेलवे की माल ढुलाई हिस्सेदारी को 25-26 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 40 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए 3,000 मिलियन टन ओरिजिनेटिंग ट्रैफिक का मध्यम अवधि लक्ष्य तय किया गया था।

वर्तमान में रेलवे लगभग 1,700 मिलियन टन माल ढुलाई कर रही है। यानी अगले चार वर्षों में 75 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की जरूरत है। लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में अब तक माल ढुलाई की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर केवल 4 प्रतिशत रही है। 2030 का लक्ष्य पाने के लिए इसे 15.7 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ना होगा। यह दर्शाता है कि सरकार अपने ही तय मानकों से कितनी दूर है।

यात्री क्षमता की गंभीर कमी

वंदे भारत ट्रेनों के शोर-शराबे के बावजूद, यात्री यातायात गंभीर क्षमता संकट से जूझ रहा है। इंडिगो एयरलाइंस संकट के दौरान रेलवे के पास अंतर-शहरी यात्रा बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने का सुनहरा मौका था, लेकिन वह मांग को पूरा नहीं कर सका। यह सीधा संकेत है कि रेलवे की क्षमता सीमित है।

पिछले एक दशक में यात्री यातायात की वार्षिक वृद्धि दर सिर्फ 1.22 प्रतिशत रही है। इसके उलट, सड़क परिवहन का हिस्सा तेजी से बढ़ा है। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, अंतर-शहरी बस यात्रा पिछले कुछ वर्षों में 25 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी है। उच्च वर्ग के करीब 30 करोड़ यात्री बसों से यात्रा कर रहे हैं, जो लगभग रेलवे की उच्च श्रेणी यात्री संख्या के बराबर है।

दूसरी ओर, प्रवासी मजदूर जैसे कमजोर वर्ग भी लंबी दूरी के लिए ठसाठस और असुरक्षित बसों में यात्रा करने को मजबूर हैं, क्योंकि ट्रेनों में जगह नहीं मिलती। यह रेलवे की असफलता को दर्शाता है, जबकि रेल यात्रा पर्यावरण के लिहाज से कहीं अधिक बेहतर विकल्प है।

पूंजीगत खर्च में ठहराव

रेलवे की सबसे बड़ी समस्या ट्रैक कंजेशन है, जो यात्री और माल दोनों यातायात में बाधा बनता है। इसके समाधान के लिए पूंजीगत खर्च जरूरी है। 2025-26 में रेलवे को 2.65 लाख करोड़ रुपये का कुल समर्थन मिला था, जो पिछले वर्ष से वास्तविक रूप में कम था।

2026-27 में इसे बढ़ाकर 2.93 लाख करोड़ रुपये किया गया है, लेकिन यह दो साल पहले की तुलना में केवल 8.5 प्रतिशत अधिक है—जो महंगाई को भी नहीं समेटता।

लागत बढ़ोतरी से कैपेक्स पर असर

स्थिति इसलिए और खराब है क्योंकि नई लाइनों, ट्रैक रिन्यूअल और लाइन डबलिंग की लागत तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के तौर पर, 2026-27 में नई रेल लाइनों के लिए 36,772 करोड़ रुपये रखे गए हैं। लेकिन इससे केवल 500 किमी लाइन बनेगी, जबकि पिछले साल 700 किमी का लक्ष्य था। यानी प्रति किलोमीटर लागत 44 करोड़ से बढ़कर 73 करोड़ रुपये हो गई। एक साल में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी।

कर्ज का बढ़ता बोझ

बजट का एक और गंभीर पहलू रेलवे का बढ़ता कर्ज है। 2026-27 में रेलवे का करीब 13.5 प्रतिशत पूंजीगत खर्च पुराने कर्ज चुकाने में जाएगा। यह राशि लगभग 40,000 करोड़ रुपये होगी। भारतीय रेलवे वित्त निगम (IRFC) को 2026-27 में 22,389 करोड़ रुपये का शुद्ध भुगतान प्रस्तावित है।2025-26 तक IRFC पर रेलवे की देनदारी 4.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी है और 2028 के बाद यह बोझ और बढ़ेगा।

भारत की सबसे अहम लेकिन उपेक्षित राष्ट्रीय संपत्ति भारतीय रेलवे की समस्याओं को नजरअंदाज करने से वे खत्म नहीं होंगी। रेल नेटवर्क ऐसा क्षेत्र है जो व्यापक आर्थिक प्रोत्साहन दे सकता है, लेकिन बजट में इसकी जमीनी चुनौतियों से आंख चुराना, आने वाले समय में सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।

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