
EXCLUSIVE: 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें अब बजट 2026 में होंगी लागू
राज्यों के लिए आयोग की सिफारिशें खास महत्व रखती हैं, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के लिए, जो अपने हिस्से को 50% तक बढ़ाने की मांग कर रहे थे।
एक बड़े डेवलपमेंट के तौर पर केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग (FC16) की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं। ये नए प्रावधान संयुक्त बजट 2026-27 में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी यानी रविवार को पेश करेंगी। ये सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक के पांच साल के लिए लागू होंगी। संसद का बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू हो रहा है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगी। इसी दिन सरकार अपनी वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण भी पेश करेगी। संविधान के अनुसार, बजट से पहले वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी।
16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने 17 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति से मुलाकात कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इससे पहले 29 नवंबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आयोग की कार्यशर्तें स्वीकार की थीं। आयोग ने लगभग एक साल तक केंद्र और राज्यों से परामर्श कर रिपोर्ट तैयार की।
वित्त आयोग की भूमिका
वित्त आयोग यह तय करता है कि केंद्र और राज्यों के वित्तीय संसाधनों का वितरण किस फॉर्मूला के आधार पर किया जाएगा। यह वितरण केंद्र और राज्य और राज्यों के बीच दोनों स्तरों पर होता है। 16वें वित्त आयोग को यह भी जिम्मेदारी दी गई थी कि वह राज्यों को ग्रांट-इन-एड के लिए नीतिगत सुझाव दे और पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के संसाधनों को बढ़ाने के उपाय सुझाए।
राज्यों के लिए आयोग की सिफारिशें खास महत्व रखती हैं, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के लिए, जो अपने हिस्से को 50% तक बढ़ाने की मांग कर रहे थे। 14वें वित्त आयोग के तहत यह 42% था। 15वें वित्त आयोग ने इसे घटाकर 41% कर दिया था। 16वें वित्त आयोग ने सलाह-मशवरे के दौरान कई राज्यों की मांग सुनी, लेकिन केंद्र ने करीब 40% का आंकड़ा सुझाया है, जिसमें थोड़ा लचीलापन हो सकता है। केंद्र ने कहा है कि यह वितरण संचालन दक्षता से जुड़ा होगा, यानी जो राज्य वित्तीय अनुशासन में बेहतर प्रदर्शन करेंगे, उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है कि राज्यों के बीच धन का क्षैतिज वितरण कैसे होगा। 15वें वित्त आयोग के दौरान “दूरी” मानदंड विवादित रहा, जिसे आलोचकों ने असमान वितरण का कारण बताया। 16वें आयोग इस दूरी के कारक का महत्व घटाकर अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना चाहती है। आबादी एक जुड़े हुए कारक के रूप में बनी रहेगी और आगामी जनगणना इस फॉर्मूले में भूमिका निभाएगी।
प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन
नए फॉर्मूले में संचालन दक्षता और वित्तीय अनुशासन को केंद्र में रखा गया है। जो राज्य वित्तीय अनुशासन दिखाएंगे और सेकेंड-जनरेशन सुधार (जैसे पावर सेक्टर में) करेंगे, उन्हें इनाम मिलेगा। यह प्रदर्शन-आधारित वितरण की दिशा में कदम है, जहां राज्य जिम्मेदार शासन के लिए प्रोत्साहित होंगे। 16वें वित्त आयोग ने इसे स्पष्ट रूप से अपनी सिफारिशों में शामिल किया है।
स्थानीय निकायों पर फोकस
आयोग ने पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए धन आवंटन पर भी जोर दिया है। विकास प्राथमिकताएं केवल स्वास्थ्य और शिक्षा तक सीमित नहीं होंगी। आकांक्षी जिलों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि उनकी वित्तीय क्षमता और विकास परिणाम बेहतर हो सकें। इसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर शासन को मजबूत करना और विकास निधियों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करना है।
आपदा प्रबंधन
आयोग ने आपदा प्रबंधन के लिए भी केंद्रीय आवंटन सुझाए हैं। इसका उद्देश्य भारत में आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना है। इससे आपदा से जुड़ी फंडिंग संरचित तरीके से उपलब्ध होगी और संकट के समय अचानक खर्चों की स्थिति कम होगी।
राजनीतिक तनाव
इन सिफारिशों का कार्यान्वयन राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। कई राज्यों ने केंद्र पर पर्याप्त धन आवंटित न करने का आरोप लगाया है। बजट 2026 के आने के साथ, सभी की नजरें इस बात पर हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इन competing demands को कैसे संतुलित करते हैं। परिणाम closely monitored होंगे, ताकि यह देखा जा सके कि क्या वितरण राजनीतिक रुझान की परवाह किए बिना राज्यों के बीच न्यायसंगत होगा।

