दावोस में फोटो-ऑप या फंड फ्लो? MoU की हकीकत पर मंथन
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दावोस में फोटो-ऑप या फंड फ्लो? MoU की हकीकत पर मंथन

दावोस में भारत की बढ़ती भागीदारी पर सुहेल सेठ और डॉ. भट्टाचार्य ने सवाल उठाए। बड़े प्रतिनिधिमंडल, MoU और निवेश नतीजों पर खास नजरिए को पेश किय।


हाल ही में उद्योगपति-स्तंभकार सुहेल सेठ और अर्थशास्त्री-उद्यमी डॉ. जयजित भट्टाचार्य दावोस (स्विट्ज़रलैंड) में भारत की बढ़ती मौजूदगी पर चर्चा के लिए एक साथ आए। इस बहस में उन्होंने बड़े सरकारी प्रतिनिधिमंडलों की उपयोगिता, विश्व आर्थिक मंच (WEF) में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों (MoUs) के वास्तविक नतीजों और करदाताओं के पैसे से की जाने वाली भागीदारी पर सवाल उठाए। चर्चा का केंद्र बिंदु दावोस जैसे खूबसूरत अल्पाइन रिसॉर्ट में होने वाली घरेलू बैठकों की छवि और भारत की वैश्विक पहुंच को अधिक रणनीतिक बनाने के सुझाव रहे।

‘भारतीय प्रतिनिधिमंडल लगातार बड़े होते गए’

सुहेल सेठ ने खुद को एंटी-दावोस बताते हुए स्पष्ट किया कि उनका विरोध दावोस मंच से नहीं, बल्कि भारत द्वारा इसके इस्तेमाल के तरीके से है। उन्होंने कहा कि दावोस “पिकनिक या पार्टी” से काम नहीं करता। सेठ ने बताया कि उन्होंने 2000 से 2014 के बीच 14 बार दावोस की यात्रा की और उस दौर में मंच के कामकाज को करीब से देखा, जब भारत का संदेश अधिक सधा हुआ था और प्रतिनिधिमंडल छोटे होते थे।


उन्होंने मौजूदा हालात की तुलना करते हुए कहा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल का आकार 31 लोगों से बढ़कर 4,118 लोगों तक पहुंच गया है। सेठ ने सवाल उठाया कि क्या सभी प्रतिभागी वास्तव में कारोबारी नेता या वरिष्ठ राजनीतिक निर्णयकर्ता थे। उन्होंने पंजीकरण शुल्क, होटल और यात्रा जैसे खर्चों का हवाला देते हुए भागीदारी की लागत पर भी सवाल खड़े किए।

सेठ ने कहा कि उनकी चिंता व्यक्तिगत खर्च नहीं, बल्कि यह है कि क्या सार्वजनिक धन से की गई ये भागीदारी वास्तव में ठोस नतीजों में बदलती है। खासकर तब, जब भारत के राजनीतिक नेता और घरेलू कारोबारी हस्तियां विदेश जाकर ऐसे समझौते करती हैं, जो उनके मुताबिक देश में ही किए जा सकते थे।

MoU और उसकी छवि

सुहेल सेठ ने दावोस में हस्ताक्षरित MoU के उदाहरण देते हुए पूछा कि घरेलू स्तर के समझौतों को स्विट्ज़रलैंड में करने का औचित्य क्या है। उन्होंने अभिषेक लोढ़ा द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ किए गए MoU का हवाला दिया और ऐसे समझौतों की छवि पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि अक्सर घोषणाओं और वास्तविक निवेश के बीच बड़ा अंतर रह जाता है।

उन्होंने इसकी तुलना असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं से की, जो वैश्विक सीईओ से सीधे निवेश पर चर्चा कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का उदाहरण दिया, जो महिलाओं से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए निवेश गठबंधन तैयार करने में लगी हैं।

सेठ ने यह भी कहा कि निवेश आकर्षित करना केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं हो सकता। उनके शब्दों में, निवेश गंभीर काम है और उन्होंने प्रतीकात्मक गतिविधियों शॉल ओढ़ाना, फोटो खिंचवाना पर तंज कसते हुए कहा कि बिना फॉलो-अप के इनका कोई मतलब नहीं।

दावोस का असली मकसद

सुहेल सेठ ने दावोस को राजनीति और कारोबार के संगम का मंच बताया, जहां राजनीति नीतिगत माहौल बनाती है और कारोबारी वैश्विक विस्तार की राह तलाशते हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दौर में इंडिया एवरीवेयर जैसे ब्रांडिंग संदेश का जिक्र किया, जब कमलनाथ वाणिज्य मंत्री थे।

उन्होंने दावोस में बैज व्यवस्था नीला, सफेद और हरा के बारे में बताते हुए कहा कि बड़े काफिलों और निजी स्टाफ के साथ यात्रा करने से यह पूरा आयोजन एक “जंकट” जैसा दिखने लगता है। सेठ ने कहा कि ब्रांड इंडिया स्थायी है, लेकिन संदेश कमजोर होता जा रहा है। उन्होंने मौजूदा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से भी कहा था कि ब्रांडिंग लाइन ज्यादा स्पष्ट होनी चाहिए, और एडवांटेज इंडिया जैसे शब्दों को बेहतर बताया।

‘दावोस का संदर्भ है’

डॉ. जयजित भट्टाचार्य ने माना कि दावोस में कुछ बैठकें ऐसी होती हैं, जो कहीं भी हो सकती हैं और कभी-कभी सतही भी लगती हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि कई बैठकों का अपना संदर्भ और संकेतात्मक महत्व होता है। उन्होंने बताया कि उनके फैमिली ऑफिस ने दावोस में महाराष्ट्र में निवेश के लिए MoU साइन किया था, जो जमीन पर लागू भी हुआ और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन से जुड़ा रहा।

भट्टाचार्य के मुताबिक, दावोस में समझौते पर हस्ताक्षर करना विदेशी निवेशकों को यह संकेत देता है कि सरकार सीरियस है। उन्होंने ओलंपिक का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी कई बार अधिकारियों की संख्या खिलाड़ियों से ज्यादा होती है, यानी यह एक मिक्स्ड बैग है। उन्होंने कहा कि दावोस भारत से अलग माहौल देता है, जहां अनौपचारिक बातचीत संभव हो पाती है जैसे किसी कैफे में मुख्यमंत्री से मिल जाना जो भारत में उतना सहज नहीं है।

स्विट्ज़रलैंड में घरेलू बैठकें

चर्चा में कई उदाहरण सामने आए महाराष्ट्र सरकार और लोढ़ा डेवलपर्स का MoU, झारखंड सरकार और टाटा स्टील के बीच ग्रीन स्टील पर बातचीत, मध्य प्रदेश प्रतिनिधियों की जियो-हॉटस्टार से बैठक, और एवरस्टोन ग्रुप के जयंत सिन्हा, ईरोस इनोवेशन के किशोर लुल्ला, कर्नाटक के मंत्री एम. बी. पाटिल तथा टाटा समूह के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन से जुड़ी मुलाकातें।

मुख्य सवाल यही रहा कि क्या घरेलू समझौतों और घोषणाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच जरूरी है, खासकर तब जब करदाताओं के पैसे से बड़े प्रतिनिधिमंडल भेजे जाते हैं।

क्या दावोस सामाजिक मंच बन गया?

सुहेल सेठ ने कहा कि समय के साथ दावोस का चरित्र बदल गया और उन्होंने तब जाना छोड़ दिया, जब यह अधिक सामाजिक आयोजनों और बैज संस्कृति तक सीमित होने लगा। उन्होंने मुकेश अंबानी, आनंद महिंद्रा, अदि गोदरेज, पिरोजशा गोदरेज, अजीम प्रेमजी, श्याम और शोभना भारतीया, पवन मुंजाल जैसे नेताओं को गंभीर प्रतिभागी बताया।

उन्होंने पुराने भारत-ब्रांडिंग आयोजनों टीसीएस डिनर, राहुल बजाज डिनर, इंफोसिस डिनर का जिक्र किया, जहां वैश्विक नेताओं से सीधा संवाद होता था। सेठ का तर्क था कि भारत के पास इस “वैश्विक मंच” का रणनीतिक इस्तेमाल करने का मौका है, लेकिन वह इसे लगातार बेहतर ढंग से नहीं कर पा रहा।

भट्टाचार्य ने सहमति जताई कि करदाताओं का पैसा जंकट में नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब सरकारी धन शामिल होता है, तो छवि और जवाबदेही का सवाल और बड़ा हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि कई MoU नियामकीय स्थिरता और भरोसे की कमी के कारण पूरी तरह निवेश में नहीं बदल पाते। हालांकि, अगर 10 प्रतिशत भी अमल में आए, तो वह भी बड़ी रकम हो सकती है।

उन्होंने दावोस को ऐसा मंच बताया, जहां अनियोजित लेकिन उपयोगी बातचीत से छोटे परमाणु रिएक्टर जैसे उभरते क्षेत्रों में रुचि पैदा हो सकती है।

भारत में वैकल्पिक मंच?

चर्चा का अहम मुद्दा यह भी रहा कि क्या भारत को दावोस जैसा मंच देश में ही बनाना चाहिए। भट्टाचार्य ने कहा कि भारतीय कंपनियां और राज्य सरकारें पहले से ही भारी रकम खर्च करती हैं और वही संसाधन भारत में ऐसा मंच बनाने में लगाए जा सकते हैं। सेठ ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि किसी और के मैदान में खेलने का मतलब किसी और के नियम मानना होता है।

उन्होंने दुबई के वर्ल्ड गवर्नमेंट समिट का उदाहरण दिया और बताया कि दावोस के संस्थापक क्लॉस श्वाब भी दुबई के मंच से जुड़े हैं। भट्टाचार्य ने जोड़ा कि अगर भारत वैकल्पिक मंच बनाए, तो उसे केवल भारत-केंद्रित नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ के लिए होना चाहिए।

प्रतिनिधित्व और प्रासंगिकता

सुहेल सेठ ने सवाल उठाया कि व्यापार से जुड़े प्रमुख केंद्रीय मंत्री, जैसे पीयूष गोयल, कई बार दावोस में क्यों नहीं होते। उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की भागीदारी को गंभीर बताया। साथ ही उन्होंने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के दावोस में फिसलकर घायल होने का किस्सा सुनाते हुए बेहतर योजना और संगठन की जरूरत पर जोर दिया।

छह सूत्री समाधान

सुहेल सेठ ने दावोस कमेटी ऑफ इंडिया (DCI) बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करें और जो यह तय करे कि कौन-कौन जाएगा, प्राथमिकताएं क्या होंगी और द्विपक्षीय बैठकें कैसे होंगी। चर्चा के अंत में सरकार के लिए छह सुझाव रखे गए। प्रतिनिधिमंडल छोटा करना, खर्च और नतीजों की व्याख्या करना, अधिक प्रासंगिक प्रतिनिधि भेजना, भारत में दावोस-जैसे आयोजन विकसित करना, DCI बनाना और ग्लोबल साउथ के लिए मंच तैयार करना।

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