
भारत- अमेरिका ट्रेड डील, मोदी-ट्रंप के दावों की 10 मुख्य बातें
डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील का दावा किया है, लेकिन न तो कोई संयुक्त बयान जारी हुआ है और न ही शर्तें स्पष्ट हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सोमवार (2 फरवरी) को यह दावा किए जाने के बाद कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच एक ट्रेड डील हो गई है, इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। हालांकि, घोषणा के 12 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बावजूद दोनों सरकारों की ओर से न तो कोई संयुक्त बयान जारी किया गया है और न ही समझौते की शर्तों से जुड़ा कोई आधिकारिक दस्तावेज, बातचीत का मसौदा या फैक्ट शीट सार्वजनिक की गई है।
अब तक सार्वजनिक तौर पर जो जानकारी उपलब्ध है, वह मुख्य रूप से डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और बाद में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा दी गई सीमित सफाइयों पर आधारित है। भारत सरकार की ओर से अब तक इस संबंध में कोई औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है। ट्रेड डील से जुड़े क्या ऐलान हुआ, क्या स्पष्ट किया गया और क्या अब भी अनिश्चित है।
ऐलान क्या है?
2 फरवरी को डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर बातचीत के बाद अमेरिका और भारत के बीच एक ट्रेड डील हो गई है।
ट्रंप ने इसे एक बड़ा समझौता बताया, जिसमें टैरिफ में कटौती, मार्केट एक्सेस का विस्तार और भारत द्वारा बड़े पैमाने पर अमेरिकी वस्तुओं की खरीद शामिल है।
अमेरिकी टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए अपने तथाकथित रेसिप्रोकल टैरिफ को तुरंत घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा।शुरुआत में भ्रम इसलिए पैदा हुआ क्योंकि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को लेकर लगाए गए दंडात्मक शुल्क के चलते टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गए थे।बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि टैरिफ वास्तव में 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया जाएगा, हालांकि यह नहीं बताया गया कि यह कटौती किन उत्पादों पर लागू होगी।
किन उत्पादों को मिलेगा फायदा—अब भी स्पष्ट नहीं
अब तक यह जानकारी सामने नहीं आई है कि भारत के कौन-कौन से निर्यात उत्पाद इस घटे हुए टैरिफ का लाभ उठाएंगे। यह भी साफ नहीं है कि नया टैरिफ दर पहले से लागू MFN (Most Favoured Nation) टैरिफ या सेक्टर-विशेष शुल्कों के साथ कैसे समायोजित होगी।
अमेरिकी प्रमुख टैरिफ बने रहेंगे
इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि यह डील अमेरिका के Section 232 के तहत लगाए गए टैरिफ को प्रभावित करेगी।स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर पर 50 प्रतिशत, और कुछ ऑटो पार्ट्स पर 25 प्रतिशत शुल्क यथावत रहने की संभावना है। फार्मास्यूटिकल्स, विमान और उनके पुर्ज़ों, तथा कुछ इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल उत्पादों पर पहले से लागू शून्य शुल्क व्यवस्था में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है।
भारत के ‘जीरो टैरिफ’ की बात पर सवाल
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर को शून्य करने पर सहमति जताई है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह कथित प्रतिबद्धता किन सेक्टरों या उत्पादों पर लागू होगी। कृषि और नियंत्रित आयात जैसे संवेदनशील क्षेत्रों का किसी भी आधिकारिक बयान में उल्लेख नहीं किया गया है।
500 अरब डॉलर की खरीद का दावा
ट्रंप के सबसे चौंकाने वाले दावों में से एक यह था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर से अधिक की वस्तुएं खरीदेगा जिसमें ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद और कोयला शामिल होंगे। हालांकि, इसके लिए कोई समयसीमा नहीं बताई गई है। वर्तमान में भारत का अमेरिका से सालाना आयात (ऊर्जा समेत) 50 अरब डॉलर से भी कम है, जिससे संकेत मिलता है कि यह लक्ष्य यदि सही है, तो कई वर्षों की दीर्घकालिक योजना हो सकता है, न कि तात्कालिक प्रतिबद्धता।
रूसी तेल से दूरी का दावा
ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा और इसके बजाय अमेरिका तथा वेनेजुएला से आयात बढ़ाएगा। यदि ऐसा होता है, तो यह भारत की ऊर्जा रणनीति में एक बड़ा बदलाव होगा। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस दावे की कोई सार्वजनिक पुष्टि या व्याख्या नहीं की गई है।
कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं
अब तक न तो कोई संयुक्त बयान, न ही कानूनी समझौता, और न ही कार्यान्वयन की समयरेखा सामने आई है। किसी भी व्यापार समझौते के अहम तत्व—जैसे प्रवर्तन तंत्र, सुरक्षा प्रावधान और विवाद समाधान प्रक्रिया पूरी तरह नदारद है।
राजनीतिक संकेत, पक्की डील नहीं
औपचारिक दस्तावेजों के अभाव में यह घोषणा फिलहाल एक एकतरफा राजनीतिक बयान ही मानी जा रही है, न कि पूर्ण ट्रेड एग्रीमेंट। जब तक दोनों सरकारें आधिकारिक पाठ जारी कर प्रतिबद्धताओं की पुष्टि नहीं करतीं, तब तक इस कथित भारत-अमेरिका ट्रेड डील का दायरा और प्रभाव अनिश्चित बना रहेगा।
संसद या कांग्रेस प्रक्रिया का भी कोई संकेत नहीं
आमतौर पर बड़े व्यापार समझौतों को लागू करने के लिए अमेरिका में कांग्रेस की मंजूरी, और भारत में संसदीय निगरानी या स्वीकृति
की आवश्यकता होती है। अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत भी हुई हो। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि यह घोषणा औपचारिक बातचीत की शुरुआत हो सकती है, न कि उसका निष्कर्ष।

