यूरोप से टकराव, क्या भारत को मिलेगा फायदा? ट्रंप टैरिफ नीति के दूरगामी असर
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यूरोप से टकराव, क्या भारत को मिलेगा फायदा? ट्रंप टैरिफ नीति के दूरगामी असर

US-Europe trade dispute: ट्रंप की टैरिफ नीति सिर्फ़ व्यापार नहीं, बल्कि राजनीति और दबाव की रणनीति है। भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी।


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Trump tariff threats: जब कोई देश व्यापार को मुनाफे की जगह दबाव बनाने का हथियार बनाने लगे तो उसकी गूंज पूरी दुनिया के बाजारों, कूटनीति और रिश्तों को हिला देती है। डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ़ धमकी भी कुछ ऐसी ही है। निशाने पर भले ही यूरोप हो, लेकिन इसकी परछाईं भारत तक पहुंचती दिख रही है। सवाल सिर्फ़ ग्रीनलैंड या टैक्स का नहीं है, सवाल यह है कि क्या वैश्विक व्यापार अब भरोसे से नहीं, बल्कि ताकत से तय होगा?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप के कुछ देशों पर नए टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की धमकी दी है। इसका असर सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि भारत पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप टैरिफ को एक राजनीतिक और आर्थिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे देशों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर अमेरिका अपने पुराने सहयोगी देशों पर भी टैरिफ लगा सकता है तो भारत को किसी भी ट्रेड डील को लेकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं होना चाहिए।

ग्रीनलैंड को लेकर विवाद

17 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर डेनमार्क और उसके सहयोगी देश ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के प्रस्ताव का विरोध करते हैं तो वह उन पर नए टैरिफ लगाएंगे। इन देशों में डेनमार्क, फिनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन शामिल हैं। ट्रंप ने घोषणा की है कि 1 फरवरी से इन देशों पर 10% टैरिफ लगाया जाएगा, जो बाद में बढ़कर 25% तक हो सकता है। ये टैरिफ तब तक लागू रहेंगे, जब तक कोई समझौता नहीं हो जाता।

ट्रंप ग्रीनलैंड क्यों चाहते हैं?

ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। उनका दावा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया तो चीन और रूस वहां अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से उन्होंने यहां तक कहा कि वह ज़रूरत पड़ने पर बल प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेंगे। यूरोप के ये आठों देश ट्रंप की इस योजना का विरोध कर रहे हैं।

दुनिया के बाजारों पर असर

ट्रंप के इस एलान के बाद दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशक सोना और चांदी जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर जा रहे हैं। शेयर बाज़ारों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। भारत समेत कई देशों के बाज़ारों पर दबाव बन सकता है हालांकि, लंबे समय में यह स्थिति भारत के लिए एक मौक़ा भी बन सकती है।

भारत के लिए कहां मौका?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और यूरोप के बीच ट्रेड वॉर जैसी स्थिति बनती है तो भारत को फ़ायदा हो सकता है। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर बातचीत काफी समय से रुकी हुई है। अमेरिका-यूरोप तनाव के कारण भारत और यूरोप एक-दूसरे के क़रीब आ सकते हैं और FTA बातचीत में तेज़ी आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो भारत को दवाइयां (फार्मा), टेक्सटाइल, रत्न और आभूषण, स्टील, ऑटोमोबाइल, सोलर उपकरण और लेदर उद्योग क्षेत्रों में फायदा हो सकता है। पिछले साल जुलाई में भारत और ब्रिटेन के बीच करीब 6 अरब पाउंड की फ्री ट्रेड डील हुई थी, जिससे दोनों देशों को फ़ायदा मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि भारत को अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए और यूरोप जैसे नए व्यापारिक साझेदारों के साथ संबंध मज़बूत करने चाहिए।

भारत के लिए सबक

ट्रंप पहले भी रूस से तेल ख़रीदने को लेकर भारत पर भारी टैरिफ लगा चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के दबाव में भारत ने कई ऐसे फ़ैसले किए हैं जो उसे आर्थिक रूप से महंगे पड़े हैं। भारत ने रूस से तेल आयात कम किया है। चीन, ईरान और दक्षिण अफ़्रीका के साथ ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास से दूरी बनाई है। ईरान और वेनेज़ुएला से तेल खरीद रोक दी है। इसके अलावा अमेरिकी टैरिफ की घोषणा के बाद चाबहार पोर्ट से भारत के हटने की ख़बरें भी सामने आईं है।

चाबहार पोर्ट पर भारत का रुख

इन खबरों पर भारत सरकार ने कहा है कि वह चाबहार पोर्ट के संचालन को लेकर ईरान और अमेरिका दोनों से संपर्क में है और स्थिति पर नजर रखे हुए है। ग्रीनलैंड का मामला भारत को यह सिखाता है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील होने के बावजूद भविष्य में दबाव नहीं बनेगा—इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए भारत को अमेरिका को एकतरफ़ा छूट देने से बचना चाहिए।

क्या भारत अमेरिकी दबाव में फैसले ले रहा है?

विशेषज्ञों का कहना है कि 2019 में जब अमेरिका ने ईरान के तेल पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अचानक ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इससे भारत–ईरान ऊर्जा संबंध कमज़ोर हो गए और इसका फ़ायदा चीन को मिला। आज चीन सबसे सस्ते दामों पर ईरान से तेल ख़रीद रहा है, जबकि अमेरिका ने इस पर कोई सख़्त कार्रवाई नहीं की। जैसे ही चाबहार पोर्ट से जुड़ी अमेरिकी प्रतिबंध-छूट खत्म होने वाली है, भारत वहां से पीछे हटता दिख रहा है। यह हैरानी की बात है, क्योंकि मई 2024 में भारत और ईरान के बीच चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को लेकर 10 साल का समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत को पोर्ट के विकास, उपकरण लगाने और संचालन करने का अधिकार मिला था। चाबहार पोर्ट पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जिसे चीन चला रहा है) के मुकाबले भारत की एक अहम रणनीतिक परियोजना है।

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