
Economic Survey 2026: क्यों उठे मोटापा और मोबाइल लत के मुद्दे? AI With Sanket
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक सर्वे 2025–26 में संख्या और भाषा तो आकर्षक हैं, लेकिन गहरी समस्याओं जैसे निवेश, मांग, रोजगार, असमानता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को पर्याप्त रूप से नहीं देखा गया।
पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग और वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रो. संतोष मेहरोत्रा ने आर्थिक सर्वे 2025–26 का विश्लेषण किया और इसके विकास पर जताए गए पॉजिटिव नजरिए पर सवाल उठाए। दोनों विशेषज्ञों ने 'AI With Sanket' शो में इस सर्वे की मुख्य बातें और किन पहलुओं को नजरअंदाज किया गया है, इस पर चर्चा की।
विशेषज्ञों ने सर्वे के उद्देश्य को स्पष्ट किया कि इसका मुख्य काम है अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन करना, आगामी वर्ष के लिए अनुमान प्रस्तुत करना और चुनौतियों की पहचान करना। हालांकि, गर्ग और मेहरोत्रा का मानना है कि केवल बड़े आंकड़े और आशाजनक स्वरूप मांग, निवेश, रोजगार और बाहरी विश्वास जैसी गहरी समस्याओं को हल नहीं कर सकते।
संभावित विकास और मुद्रा गिरावट
गर्ग ने सर्वे में प्रस्तुत “संभावित विकास” के आंकड़ों को संदिग्ध बताया और इसे “विश्वसनीय पैरामीटरों पर आधारित नहीं” कहा। उन्होंने कहा कि मुख्य फोकस वर्तमान वर्ष की विकास दर और अगले वर्ष के अनुमान पर होना चाहिए। सर्वे के अनुसार, चालू वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था का विकास 7.4% रहा, जबकि नाममात्र (Nominal) विकास लगभग 8% दर्ज किया गया। हालांकि, गर्ग ने कहा कि डॉलर के संदर्भ में वास्तविक विकास पर ध्यान देना जरूरी है। रुपये की गिरावट और नाममात्र विकास का संयोजन डॉलर में वृद्धि को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। उन्होंने इसे "इरनी" बताते हुए कहा कि भारत वास्तविक दृष्टि से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन डॉलर के संदर्भ में कमजोर दिखाई देता है।
मांग, निवेश और रोजगार की चुनौती
मेहरोत्रा ने कहा कि सर्वे ने कुल मिलाकर कमजोर मांग की समस्या को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने बताया कि निवेश-से-जीडीपी अनुपात पिछले कई वर्षों से स्थिर है, जबकि पहले उच्च निवेश के साथ रोजगार सृजन और वास्तविक वेतन वृद्धि होती थी। आज तीन महत्वपूर्ण शर्तें पूरी नहीं हो रही हैं:-
1. निजी निवेश पर्याप्त नहीं बढ़ रहा।
2. गैर-कृषि रोजगार सृजन कम है।
3. वास्तविक वेतन वृद्धि कमजोर है।
इससे भविष्य के विकास पर सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
चीनी तुलना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य
गर्ग ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितता निवेश को रोक सकती है, लेकिन चीन के अनुभव से तुलना करना जरूरी है। उन्होंने चीन के निर्यात अधिशेष में वृद्धि का हवाला देते हुए बताया कि वैश्विक परिस्थितियां समान होने पर भी परिणाम अलग हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य की तकनीक और “फ्यूचर गुड्स” जैसे ऊर्जा संक्रमण, डिजिटल सिस्टम और इलेक्ट्रिक वाहन में चीन का प्रभुत्व है, जबकि भारत पिछड़ रहा है। इस कारण, भारत में निवेश चक्र अपने आप बदलने की संभावना कम है।
व्यवहारिक मुद्दों पर विवाद
सर्वे में डिजिटल लत, मोटापा और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड जैसे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी विषयों को आर्थिक खतरे के रूप में उठाया गया। गर्ग ने इसे “मनोरंजक और ध्यान भटकाने वाला” बताया और कहा कि इनका विकास दर से कोई स्पष्ट संबंध नहीं। उन्होंने सुझाव दिया कि ये स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के मुद्दे हैं, जबकि वित्त मंत्रालय का ध्यान राजकोषीय प्राथमिकताओं जैसे खर्च, कराधान और घाटा पर होना चाहिए। मेहरोत्रा ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। उनका कहना था कि मोटापा और हृदय रोग को आर्थिक दृष्टि से वर्ग और असमानता के परिप्रेक्ष्य में जोड़ना चाहिए था। उन्होंने कहा कि मोटापा उच्च आय वर्ग में अधिक है और अधिकांश जनता ऐसी खरीद शक्ति नहीं रखती। यह असमानता का प्रतीक है, जिसे सर्वे ने पर्याप्त रूप से नहीं संबोधित किया।
रोजगार, जनसांख्यिकी और दीर्घकालिक विकास
गर्ग ने डिजिटल लत को गहरी संरचनात्मक समस्याओं से जोड़ते हुए कहा कि भारत में युवा आबादी बहुत बड़ी है लेकिन पर्याप्त रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं है। मेहरोत्रा ने कहा कि भारत में विकास मुख्य रूप से 10–15% शीर्ष आय वर्ग की खपत पर आधारित है, जो दीर्घकालिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं। उन्होंने चेताया कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय लाभ विंडो 2040 तक खो देगा और यह युवाओं के रोजगार और वृद्ध जनसंख्या के दबाव के कारण एक “डबल संकट” उत्पन्न करेगा।

