
कम टैक्स, ज्यादा मुनाफा… फिर भी प्राइवेट निवेश ठप क्यों? AI With Sanket
नाइना लाल किदवई के मुताबिक, बजट 2026 के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह टैक्स, निवेश, रोजगार और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन बनाए। सही नीतियों के साथ भारत न सिर्फ ग्रोथ बनाए रख सकता है, बल्कि वैश्विक निवेश का बड़ा केंद्र भी बन सकता है।
इंडिया सैनिटेशन कोएलिशन की चेयरपर्सन और FICCI की पूर्व अध्यक्ष नाइना लाल किदवई का कहना है कि भारत की टैक्स नीति इस समय एक “कठिन संतुलन” से गुजर रही है। एक तरफ सरकार को निवेश आकर्षित करने के लिए टैक्स दरें प्रतिस्पर्धी रखनी हैं तो दूसरी ओर सार्वजनिक सेवाओं और विकास योजनाओं के लिए पर्याप्त राजस्व भी जुटाना है। उनका साफ कहना है कि अगर टैक्स दरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहींरहीं, तो अमीर लोग और बड़ी कंपनियां दोनों ही विदेशों का रुख कर सकती हैं।
The Federal से बातचीत में नाइना लाल किदवई ने बजट 2026 से जुड़ी उम्मीदों, पर्सनल इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स के बीच बढ़ते अंतर, रुपये पर दबाव और इस बात पर खुलकर बात की कि क्यों आज भी मांग, रोजगार और निर्यात भारत की कंपनियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता बने हुए हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति
नाइना लाल किदवई का मानना है कि भारत अगले वित्त वर्ष में मजबूत मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति के साथ प्रवेश कर रहा है। अधिकतर अनुमानों के अनुसार आर्थिक वृद्धि दर करीब 7% रह सकती है, जो वैश्विक हालात को देखते हुए एक अच्छा आंकड़ा है। उन्होंने कहा कि भले ही 9–10% की ग्रोथ आदर्श होती, लेकिन 7% भी मजबूत प्रदर्शन है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार राजकोषीय घाटे को काबू में रखने में सफल रही है और बिना जरूरत से ज्यादा खर्च किए घाटे को 4.8% से घटाकर 4.4% तक लाया गया है। हालांकि, अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर भारत के कुछ श्रम-प्रधान क्षेत्रों, जैसे परिधान, हीरा और चमड़ा उद्योग पर पड़ा है।
रुपये पर दबाव और निर्यात का मौका
किदवई ने कहा कि रुपये में गिरावट एक “चिकन-एंड-एग” स्थिति जैसी है। जैसे ही रुपया कमजोर होता है, विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) डॉलर रिटर्न को देखते हुए पैसा निकालने लगते हैं, जिससे रुपये पर और दबाव आता है। आरबीआई का रुख यही रहा है कि वह लंबे समय तक रुपये को किसी एक स्तर पर थाम नहीं सकता, लेकिन उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की कोशिश जरूर करता है। हालांकि, कमजोर रुपया भारत के लिए एक अवसर भी बन सकता है, क्योंकि इससे निर्यात सस्ते होते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात को भी मजबूती देनी होगी। इलेक्ट्रॉनिक्स और iPhone मैन्युफैक्चरिंग इसका अच्छा उदाहरण हैं, जहां घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई है।
ग्रोथ के आंकड़ों पर बहस
इकोनॉमिक सर्वे में संभावित ग्रोथ 7.5% बताई गई है, जिस पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं। इस पर किदवई ने कहा कि आंकड़ों की गणना के तरीकों को लेकर बहस हो सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर माहौल सकारात्मक है। उन्होंने FICCI के एक सर्वे का हवाला दिया, जिसमें 100 से ज्यादा CEOs ने 7% ग्रोथ हासिल होने को लेकर भरोसा जताया है।
बजट से उद्योग की उम्मीदें: रोजगार, निवेश और निर्यात
नाइना लाल किदवई के मुताबिक, उद्योग जगत सरकार से तीन चीजों पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की उम्मीद कर रहा है—रोजगार सृजन, पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) और निर्यात। उन्होंने कहा कि रोजगार सृजन सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि सर्विस सेक्टर और पर्यटन जैसे क्षेत्रों से भी हो सकता है। साथ ही, स्किल डेवलपमेंट बेहद जरूरी है, क्योंकि बिना सही कौशल के नौकरियां पैदा होने के बावजूद भरी नहीं जा सकेंगी।
निजी निवेश क्यों नहीं बढ़ रहा?
कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और मुनाफा बढ़ने के बावजूद निजी निवेश न बढ़ने पर उन्होंने कहा कि जब तक कंपनियों की मौजूदा क्षमता पूरी तरह इस्तेमाल नहीं होती, वे नई फैक्ट्रियां लगाने से बचती हैं। फिलहाल क्षमता उपयोग 75% से नीचे है, जबकि 80–85% के स्तर पर पहुंचने के बाद ही कंपनियां नए निवेश के बारे में सोचती हैं। इसके लिए घरेलू मांग और निर्यात दोनों को बढ़ाना जरूरी है। PLI जैसी योजनाएं कंपनियों को नए क्षेत्रों, जैसे सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा में निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
पर्सनल टैक्स बनाम कॉरपोरेट टैक्स
पर्सनल इनकम टैक्स कलेक्शन तेजी से बढ़ने और कॉरपोरेट टैक्स के मुकाबले आम लोगों पर ज्यादा बोझ की धारणा पर किदवई ने कहा कि कॉरपोरेट टैक्स की दर करीब 25% है, जबकि व्यक्तिगत टैक्स दरें सरचार्ज मिलाकर 40% से ज्यादा तक पहुंच जाती हैं। उन्होंने कहा कि टैक्स नीति बनाते समय वैश्विक प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखना जरूरी है।
निवेश आकर्षित करने की चुनौती
किदवई ने कहा कि दुबई, वियतनाम जैसे देशों में कम टैक्स और आसान नियमों की वजह से निवेश तेजी से जा रहा है। अगर भारत में टैक्स दरें और कारोबारी माहौल प्रतिस्पर्धी नहीं रहा, तो पूंजी बाहर जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि GST ने सिस्टम से लीक हो रहे पैसे को रोका है और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए संसाधन उपलब्ध कराए हैं, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत घटी है।
स्वास्थ्य और व्यवहार परिवर्तन पर इकोनॉमिक सर्वे
इकोनॉमिक सर्वे में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मोटापा और मोबाइल लत को जोखिम बताए जाने पर किदवई ने कहा कि एक स्वस्थ और उत्पादक आबादी ही भारत की असली ताकत है। टैक्स और कीमतों के जरिए लोगों को स्वस्थ विकल्प चुनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन की दिशा में एक कदम है।

