
यूपी में आलू की बंपर पैदावार के बावजूद सस्ते दामों से जूझ रहे किसान
प्रयागराज जिले को आलू उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां हर साल बड़ी मात्रा में आलू पैदा होता है और इस बार भी पैदावार अच्छी रही।
उत्तर प्रदेश में इस साल आलू की बंपर पैदावार हुई है, लेकिन बाजार में गिरते दामों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। कई इलाकों में आलू 3 से 4 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है, जिससे किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
प्रयागराज के किसान गुलाम मोहम्मद बताते हैं, “4 बीघे में आलू लगाया था और करीब 550 बोरी उत्पादन हुआ। लेकिन 50-55 हजार रुपए प्रति बीघा लागत के मुकाबले सिर्फ 25-30 हजार रुपए ही मिल रहे हैं। इस हालत में हम बर्बाद हो जाएंगे।”
अच्छी पैदावार, लेकिन बाजार में गिरावट
प्रयागराज जिले को आलू उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां हर साल बड़ी मात्रा में आलू पैदा होता है और इस बार भी पैदावार अच्छी रही।
नवाबगंज क्षेत्र के किसान श्यामलाल त्रिपाठी, जिन्होंने 10 साल बाद आलू की खेती की, बताते हैं कि G-4 किस्म का आलू लगाने के बावजूद उन्हें सिर्फ 5-7 रुपए प्रति किलो का भाव मिल रहा है।
“अगर 10 रुपए से ऊपर रेट मिलता तो फसल बेच देते, लेकिन अभी लागत भी नहीं निकल रही। इसलिए आलू को कोल्ड स्टोर में रखने की तैयारी है,” वे कहते हैं।
शादी के लिए बोई फसल, अब घाटे का डर
बजहा गांव के किसान आनंद त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने आलू की खेती इस उम्मीद में की थी कि फसल बेचकर बेटी की शादी के लिए पैसा मिलेगा।
“25 साल से खेती कर रहे हैं, लेकिन इस बार हालत सबसे खराब है। सरकार से कोई मदद नहीं मिलती। गेहूं-चावल की तरह आलू पर भी MSP होना चाहिए,” उन्होंने कहा।
मजदूरों की कमी और बढ़ती लागत
किसानों को सिर्फ कम दाम ही नहीं, बल्कि मजदूरों की कमी से भी जूझना पड़ रहा है।
गुलाम मोहम्मद बताते हैं, “इतने बड़े खेत में सिर्फ 2 लोग आलू निकाल रहे हैं। मजदूर नहीं मिल रहे। 600 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से पूरा आलू करीब डेढ़ लाख में बिकेगा, जबकि लागत इससे ज्यादा है।”
कई किसान अपनी फसल को कोल्ड स्टोर में रखने की योजना बना रहे हैं, हालांकि स्टोरेज की लागत और तकनीकी जोखिम भी चिंता का कारण हैं।
300 रुपए क्विंटल तक गिरे दाम
बाजार में आलू के दाम बेहद नीचे आ चुके हैं। एक व्यापारी के मुताबिक छोटा आलू (गोला): 300 रुपए प्रति क्विंटल और G-4 आलू: 600-700 रुपए प्रति क्विंटल है। व्यापारी ने कहा, “हमें पता है कि इससे किसानों की लागत नहीं निकल रही, लेकिन बाजार में यही रेट चल रहा है।”
आलू को नागपुर, बिलासपुर और जबलपुर जैसी मंडियों में भेजा जा रहा है, लेकिन मजदूरों की कमी के कारण लागत और बढ़ रही है।
मजदूरों का भी अलग संघर्ष
खेतों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति भी आसान नहीं है।
संजू नाम की महिला मजदूर बताती हैं कि उन्हें रोज 20 किलो आलू मजदूरी के रूप में मिलता है, जिसे वे घर के उपयोग और भविष्य के लिए कोल्ड स्टोर में रखती हैं।
उत्पादन ज्यादा, भंडारण कम
विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर प्रदेश देश के कुल आलू उत्पादन का 30-35% हिस्सा पैदा करता है।
6–7 लाख हेक्टेयर में खेती
250–270 लाख टन उत्पादन
2,207 कोल्ड स्टोर, जिनकी क्षमता 192 लाख मीट्रिक टन
इसका मतलब है कि पूरी फसल को स्टोर करना संभव नहीं है।
आगे भी राहत की उम्मीद कम
फूड पॉलिसी विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक उत्पादन के कारण कीमतों में गिरावट आई है और निकट भविष्य में दाम बढ़ने की संभावना कम है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं जैसे पश्चिम एशिया के तनाव का आलू की कीमतों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।
समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि आलू की प्रोसेसिंग यूनिट (चिप्स, पापड़ आदि) बढ़ाई जाएं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू किया जाए। बाजार और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर किया जाए।

