
विकसित भारत 2047 पर खतरा? नए लेबर कोड्स से क्यों बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ‘विकसित भारत@2047’ की ओर बढ़ना है तो अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की जरूरत है। FTE जैसे प्रावधान अगर परमानेंट जॉब्स को कमजोर करते हैं तो यह सपना और दूर हो सकता है।
पहली नजर में फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट (FTE) कोई बड़ा बदलाव नहीं लगता, क्योंकि देश में पहले से ही बड़ी संख्या में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरियां दी जा रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर धीरे-धीरे स्थायी (परमानेंट) नौकरियों की जगह FTE ले लेता है तो इससे उन लोगों की उम्मीदों को गहरा झटका लग सकता है, जो अपने जीवनकाल में ‘विकसित भारत@2047’ यानी विकसित देश जैसी जीवन-शैली का सपना देख रहे हैं।
FTE क्यों है यह अहम?
FTE एक ऐसा रोजगार मॉडल है, जिसमें कर्मचारी को लिखित कॉन्ट्रैक्ट, तय वेतन, भत्ते और सामाजिक सुरक्षा मिलती है, जो इसे परमानेंट नौकरी जैसा बनाती है। इसी वजह से इसे स्थायी नौकरी का एक “लगभग समान विकल्प” माना जा रहा है। लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच है। FTE में दो अहम बातें नहीं हैं—
1. इसे परमानेंट बनाने का कोई प्रावधान नहीं
2. न्यूनतम कॉन्ट्रैक्ट अवधि तय नहीं
इसका मतलब यह है कि नियोक्ता किसी को एक हफ्ते, एक महीने, तीन महीने, 11 महीने या उससे अधिक समय के लिए FTE पर रख सकता है और उस पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं होगी। उदाहरण के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर फैकल्टी, दिल्ली-NCR की फैक्ट्रियों में 11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट और कई सेक्टर्स में सालाना या उससे लंबे कॉन्ट्रैक्ट।
किस पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
यह तर्क दिया जा सकता है कि FTE फिलहाल औद्योगिक संस्थानों तक सीमित है, इसलिए खतरा सीमित है। लेकिन असल में यह देश की शीर्ष 10% वर्कफोर्स यानी सबसे अच्छी नौकरियों वाले वर्ग को प्रभावित करता है।
भारत में क्वालिटी जॉब्स की सच्चाई
पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2023-24 के मुताबिक, कुल वर्कफोर्स का सिर्फ 21.7% ही “रेगुलर वेतन/सैलरी” वाली नौकरी में है। इनमें से भी 53.4% को सामाजिक सुरक्षा नहीं और 58% के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं। इस तरह कुल वर्कफोर्स का केवल करीब 10% ही वास्तव में फॉर्मल या क्वालिटी जॉब्स की श्रेणी में आता है। श्रम मंत्रालय के अनुसार, 2023-24 में भारत की कुल वर्कफोर्स 64.33 करोड़ थी। यानी FTE का सीधा असर करीब 6.4 करोड़ लोगों पर पड़ सकता है।
परमानेंट नौकरियां लगातार घट रहीं
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) के आंकड़े बताते हैं कि “रेगुलर” यानी परमानेंट कर्मचारियों की संख्या तेजी से घट रही है। वहीं, “कैजुअल और कॉन्ट्रैक्ट” कर्मचारियों की संख्या बढ़ रही है। यह ट्रेंड 475 केंद्रीय उपक्रमों में देखा गया है (बैंक और बीमा कंपनियों को छोड़कर)। उदाहरण के तौर पर महारत्न कंपनी NTPC में 2024-25 में कुल श्रमिकों में से 96.6% कॉन्ट्रैक्ट पर थे।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी वही कहानी
एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज (ASI) 2023-24 के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग में कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की हिस्सेदारी 42% तक पहुंच गई। फैक्ट्रियों की कुल कमाई में मजदूरी का हिस्सा लगातार घट रहा है।
सरकार और बड़ी कंपनियों की नौकरियां भी सिमट रहीं
PLFS 2020-21 के अनुसार, सिर्फ 6.8% लोग सरकारी नौकरियों में, 5.3% लोग पब्लिक और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में। यानी सबसे बेहतर नौकरियां सिर्फ 12.1% लोगों के पास थीं। इसके बाद सरकार ने ये आंकड़े सार्वजनिक करना बंद कर दिया।
क्या यही था मध्यम वर्ग का सहारा?
आज़ादी के बाद भारत में मध्यम वर्ग के उभार का श्रेय सार्वजनिक क्षेत्र और बाद में आईटी सेक्टर को दिया जाता है। ये दोनों ही क्वालिटी जॉब्स पैदा करते थे। नौकरियां इसलिए अहम हैं क्योंकि वे सब्सिडी, मुफ्त राशन या कैश ट्रांसफर की तुलना में बेहतर और टिकाऊ संपत्ति वितरण का जरिया होती हैं।
‘विकसित भारत@2047’ और हकीकत
सरकार का दावा है कि 2047 तक भारत एक विकसित देश बनेगा, लेकिन “विकसित” की कोई साफ परिभाषा या रोडमैप अब तक सामने नहीं आया है। फरवरी 2024 में ईएसी-पीएम के तत्कालीन अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने लिखा था कि इसका मतलब शायद “हाई-इनकम देश” बनना हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत के टॉप 10% कर्मचारी भी इस सपने तक पहुंच सकते हैं?
टॉप 10% की कमाई भी कम क्यों?
ईएसी-पीएम द्वारा प्रायोजित 2022 की एक स्टडी के मुताबिक, ₹25,000 मासिक वेतन (₹3 लाख सालाना) टॉप 10% वेतन वर्ग में आता है। 2020 के डॉलर रेट पर यह करीब $4,225 सालाना होता है।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार:-
$1,146–4,515 = लोअर-मिडिल इनकम
$4,516–14,005 = अपर-मिडिल इनकम
$14,005 से ऊपर = हाई इनकम
यानी भारत के टॉप 10% कर्मचारी भी सिर्फ लोअर-मिडिल इनकम श्रेणी में आते हैं।
वेतन क्यों नहीं बढ़ रहे?
तीन अहम संकेत:-
1. SBI रिसर्च के मुताबिक 2019-25 के बीच रियल वेतन वृद्धि 0.14% रही।
2. IT कंपनियों में एंट्री-लेवल सैलरी 15 साल से लगभग स्थिर, रियल टर्म में 50–60% गिरावट।
3. खुद मुख्य आर्थिक सलाहकार ने “कॉर्पोरेट मुनाफे बढ़ने के बावजूद वेतन ठहराव” की बात मानी।
कॉन्ट्रैक्ट जॉब्स = कम वेतन
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ICRIER की कई स्टडीज़ बताती हैं कि कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स को कम वेतन मिलता है। उनकी उत्पादकता भी परमानेंट कर्मचारियों से कम होती है। कंपनियां लागत घटाने और वेतन दबाव रोकने के लिए कॉन्ट्रैक्ट हायरिंग करती हैं।
क्या कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के भरोसे विकसित भारत संभव है?
विकसित देशों में भी कॉन्ट्रैक्ट जॉब्स हैं, लेकिन वे पहले से ही उच्च आय और बेहतर जीवन-स्तर पर हैं। भारत में स्थिति अलग है:-
- 64 करोड़ वर्कफोर्स
- 46% आबादी कृषि पर निर्भर
- 58% लोग मुफ्त राशन और सरकारी सहायता पर जीवन यापन कर रहे हैं
इतनी बड़ी आबादी को विकास से बाहर रखकर कोई भी देश विकसित नहीं बन सकता।

