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सोना क्यों बना भरोसेमंद साथी? बड़े देशों ने बढ़ाया Gold रिजर्व, क्या और बढ़ेगी कीमतें?

Gold Price: आज सोना केवल सजावट या निवेश का साधन नहीं है, बल्कि यह विश्व की आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता का पैमाना भी बन गया है।


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Gold Price Surge: जब दुनिया में जंग, आर्थिक उथल-पुथल और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल होता है, तब हर कोई एक ही चीज की तरफ देखता है और वह है 'सोना'। ये सिर्फ चमकीला निवेश नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, ताकत और सुरक्षित भविष्य का पैमाना बन चुका है। भारत से लेकर रूस, चीन और तुर्की तक, हर देश अपनी रिजर्व में सोने का हिस्सा बढ़ा रहा है। वे इसे केवल पैसे के तौर पर नहीं, बल्कि अनिश्चितता में बचाव की कवच मानते हैं। सोने की इस चमक पर केवल बाजार का उछाल ही नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति और जंगों का भी गहरा असर है। आइए जानते हैं कि क्यों हर संकट में सोना सबसे भरोसेमंद साथी बन जाता है?

बीते कुछ सालों में सोना केवल एक कीमती धातु नहीं, बल्कि ग्लोबल पॉलिटिक्स, युद्ध और आर्थिक अस्थिरता का सबसे भरोसेमंद दोस्त बन गया है। निवेशक और केंद्रीय बैंक दोनों ही इसे सेफ हेवन यानी सुरक्षित निवेश के रूप में देखते हैं। भारत इसका एक बड़ा उदाहरण है। 2020 में भारत के गोल्ड रिजर्व 661 टन थे, जो 2025 तक बढ़कर 879 टनहो गए। सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई देश भी अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं। पिछले पांच सालों के रुझान (Trend) दिखाते हैं कि सोने ने शेयर बाजार और अन्य एसेट क्लास से बेहतर रिटर्न दिया है।

केंद्रीय बैंक बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे

सोने की कीमतों में तेजी का सबसे बड़ा कारण सेंट्रल बैंकों की खरीदारी है। 2022 से 2024 के बीच दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने करीब 3200 टन सोना खरीदा। इस सूची में रूस, चीन, भारत और तुर्की सबसे आगे हैं। ये देश धीरे-धीरे अपनी विदेशी मुद्रा (डॉलर) की हिस्सेदारी घटाकर गोल्ड को प्राथमिकता दे रहे हैं। यानी सोने की मांग केवल आम निवेशकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारों और वैश्विक आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा है।

अनिश्चितता के समय सोने की बढ़ती मांग

इतिहास दिखाता है कि जब भी दुनिया में युद्ध, वित्तीय संकट या राजनीतिक अस्थिरता आई, सोने की कीमतें रिकॉर्ड तेजी से बढ़ी हैं। 1970 के दशक में ईरान रिवोल्यूशन, अफगानिस्तान पर सोवियत हमला और योम किपूर युद्ध के दौरान सोने और तेल की कीमतें बढ़ीं। 2008 का लेहमन ब्रदर्स फाइनेंशियल क्राइसिस या 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद निवेशकों ने सोने की ओर रुख किया। अनिश्चितता में निवेशक ऐसी संपत्ति चाहते हैं, जो अपनी वैल्यू बनाए रखे और सोना इसके लिए सबसे भरोसेमंद है।

सोने का इतिहास

सोने और वैश्विक वित्तीय प्रणाली का गहरा संबंध 1944 के ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट से जुड़ा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के पास दुनिया का लगभग 66 प्रतिशत गोल्ड रिजर्व था। इसी ताकत से डॉलर को वैश्विक रिजर्व करेंसी बनाया गया और हर डॉलर के पीछे गोल्ड की गारंटी दी गई। यह सिस्टम लंबे समय तक डॉलर और गोल्ड को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जोड़े रखता रहा।

निक्सन शॉक और गोल्ड की उछाल

1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को गोल्ड से अलग कर दिया, जिसे निक्सन शॉक कहा जाता है। इससे अमेरिका को मनचाहा पैसा छापने की आजादी मिली। कई देशों का डॉलर पर भरोसा कमजोर हुआ। 1971 से 1980 के बीच सोने की कीमतें 38 डॉलर प्रति आउंस से बढ़कर 636 डॉलर प्रति आउंस हो गईं। इस नौ साल के उछाल ने साफ किया कि सोना वित्तीय अस्थिरता में भी अपनी वैल्यू बनाए रखता है, इसलिए इसे सेफ हेवन कहा जाता है।

सोने की खासियत

सोना अर्थव्यवस्था के कमजोर पड़ने पर भी अपनी कीमत बनाए रखता है। गल्फ युद्ध, इराक संकट, 9/11 अटैक और 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट के समय निवेशकों ने हमेशा गोल्ड को प्राथमिकता दी है।

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