
2026 में शेयर बाजार से बड़े रिटर्न की उम्मीद नहीं! भारत बढ़ रहा 'ग्लोबल फाइनेंशियल संकट’ की ओर?
शेयर बाजार में हर निवेशकों की पूंजी डूबती जा रही है. ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद बीएसई सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी 50 में करीब 11 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है.
क्या भारत 2008 के 'ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस संकट’ की ओर बढ़ रहा है? क्यों निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार में कोई बड़ी तेजी की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए? क्यों भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों को छोड़ देनी चाहिए बड़े रिटर्न की उम्मीद? ये बात हम इसलिए हम कह रहे हैं क्योंकि 28 फरवरी को मिडिल ईस्ट में अमेरिका इजरायल के ईरान पर हमला करने के बाद से ही भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट का सिलसिला जारी है.
शेयर बाजार में गिरावट का ये आलम है कि हर निवेशकों की पूंजी डूबती जा रही है. ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद बीएसई सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी 50 में करीब 11 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के इस दौरान करीब 12.3 बिलियन डॉलर यानी 1.13 लाख करोड़ रुपये के शेयर्स बाजार में बेच डाले. तो बीएसई पर लिस्टेड शेयरों के मार्केट कैप में 47 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आ चुकी है. रुपया डॉलर के मुकाबले बेदम होता जा रहा है और ईरान युद्ध के बाद से 3.50 फीसदी गिर चुका है और 95 के लेवल के करीब जा पहुंचा है. और इस सब के लिए सबसे बड़ा गुनागहार कच्चा केल 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा जो कि युद्ध के शुरू होने से पहले 65-70 डॉलर प्रति बैरल के करीब था.
और यही वजह है कि दुनिया के बड़े ब्रोकरेज हाउसेज जिनकी सलाह दुनियाभर के निवेशक मानते हैं जिनकी सलाह को भारतीय निवेशक भी बेहद गंभीरता से सुनते हैं और उसे मानते भी हैं. ये ब्रोकरेज हाउसेज, बाजार की दिशा दशा से लेकर चुनौतियों के बारे में निवेशकों को आगाह कर रहे हैं. दुनिया की दिग्गज ब्रोकरेज कंपनी गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भारतीय शेयर बाजार को लेकर बड़ी भविष्यवाणी कर दी है. गोल्डमैन सैक्स जो पहले भारतीय शेयर बाजार से बेहतर रिटर्न की अपेक्षा में ओवरवेट (Overweight) थी अब उसने भारत की रेटिंग को घटाकर न्यूट्रल कैटगरी जिसे MarketWeight कहते हैं उस कैटगरी में डाल दिया है. इसका मतलब ये हुआ कि Goldman Sachs को भारतीय बाजार से ना तो बेहतर रिटर्न और ना कोई खराब रिटर्न की ही उम्मीद है. Goldman Sachs ने अनुमान जताया था कि एनएसई निफ्टी साल 2026 में 29300 के आंकड़े को छू सकता है लेकिन अब उसने अपने टारगेट को घटाकर 25900 अंक कर दिया है.
Goldman Sachs ने अपनी रिपोर्ट में कहा, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावट के चलते भारत की अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. खासतौर पर Strait of Hormuz के बंद रहने पर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने की आशंका है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा जो ईंधन खपत के लिए आयात पर निर्भर है. रिपोर्ट में गोल्डमैन सैक्स ने कहा कि, अगर एनर्जी कीमतें ऐसे ही ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत की आर्थिक तस्वीर कमजोर हो सकती है. रिपोर्ट में 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया गया है. महंगाई बढ़ने और चालू खाता घाटा (CAD) के GDP के 2% तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है. भारतीय करेंसी रुपये पर दबाव बढ़ेगा और हालात संभालने के लिए आरबीआई को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
रिपोर्ट में Goldman Sachs ने कहा, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि कंपनियों की कमाई पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा. रिपोर्ट में अगले दो वर्षों के लिए कंपनियों की कमाई (Earnings Growth) का अनुमान घटाकर 8% और 13% कर दिया गया है, जो पहले 16% से ज्यादा था. खासकर घरेलू मांग से जुड़े सेक्टर जैसे ऑटो, कंज्यूमर और अन्य साइक्लिकल सेक्टर की कमाई सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है. विदेशी से लेकर घरेलू निवेशकों का भरोसा भी कमजोर पड़ता दिख रहा है. सितंबर 2024 के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 42 अरब डॉलर निकाल लिए हैं.
एक और ब्रोकरेज हाउस Societe Generale Group की Bernstein ने भी India Strategy: How bad can it get from here? के नाम से रिपोर्ट जारी किया है. Bernstein ने भी अपनी रिपोर्ट कहा है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं. उसने चेतावनी दी कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो हालात 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल संकट जैसे हो सकते हैं.
दरअसल 2026 में सेंसेक्स में 15 फीसदी, निफ्टी में 14 फीसदी और निफ्टी आईटी इंडेक्स जो एआई से पैदा हुए खतरे के चलते पहले से गिर रहा था उसमें 22 फीसदी की गिरावट बीते 3 महीने में आ चुकी है. Bernstein ने ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस मोमेंट का खतरा बताते हुए रिपोर्ट में कहा 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा था, ग्रोथ आधी रह गई थी, महंगाई बढ़ गई थी और रुपया कमजोर हो गया था और 2026 में ठीक वैसी ही स्थिति बनने की आशंका नजर आ रही है. रिपोर्ट में कहा गया, महंगा कच्चा तेल सबसे बड़ा चिंता का सबब है भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. अगर युद्ध लंबा चला तो महंगाई दर 6% से ऊपर जा सकती है. ब्याज दरों में कटौती टल सकती है. आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. अगर हालात और बिगड़े तो, GDP ग्रोथ 2–3% तक गिर सकती है, रुपया 100 से भी नीचे जा सकता है. शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है. भारत का फॉरेक्स रिजर्व हाल ही में घटा है और रुपये को संभालने के लिए RBI के पास सीमित विकल्प बचे हैं. अगर वैश्विक हालात और बिगड़े, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है. खाड़ी देशों से आने वाला रेमिटेंस घट सकता है, जिससे भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है.
Bernstein ने कहा उसने इस वर्ष की शुरूआत में यानी युद्ध के शुरू होने से पहले Bull Case में 28100 का जो टारगेट निफ्टी 50 के लिए दिया था उसमें 2 फीसदी की कटौती कर दी है. लेकिन मंदी का संकट गहराया तो निफ्टी 19,000 के लेवल तक गिर सकता है . हालांकि उसने 26000 निफ्टी का टारगेट दिया है जो कि मौजूदा लेवल से करीब 15 फीसदी ऊपर है. Bernstein ने भी भारतीय बाजारों पर अपने रूख को न्यूट्रल रखा है और उसका मानना है कि 2026 में बाजार फ्लैट रह सकता है. यानी पूरे साल बाजार में ज्यादा तेजी की उम्मीद नहीं है. ऐसा में निवेशकों की परेशानी जरूर बढ़ गई होगी जो बाजार में निवेशित होंगे.
एक और ब्रोकरेज फर्म Systematix Research के रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का इक्विटी मार्केट, कंपनियों की कमाई, कैपिटल इंफ्लो और वैल्यूएशन की चिंता को लेकर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है. ईरान युद्ध के शुरू होने से पहले भी साल 2024 के मध्य के बाद से ही भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था. 2024 के पीक से करीब 64 लाख करोड़ भारतीय बाजार का मार्केट कैप नीचे है. करीब 400 स्टॉक्स के अध्ययन करने के बाद पाया गया कि 63 फीसदी ने नेगेटिव रिटर्न दिया है. और जिन रिटेल निवेशकों ने सोशल मीडिया और फिन फ्यूएंसर्स के झांसे में आकर बाजार में निवेशक किया उनरी पूंजी में सबसे ज्यादा सेंध लगी है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने सितंबर 2024 के बाद से 43 बिलियन डॉलर के शेयर्स बेच डाले. घरेलू संस्थागत निवेशकों और इक्विटी म्यूचुअल फंड से बाजार को सहारा मिला जिन्होंने 59 बिलियन डॉलर का निवेश किया. अक्तूबर 2024 के बाद से एसआईपी की संख्या स्थिर बनी हुई है हालांकि औसतन एसेंट अंडर मैनेजमेंट 20 फीसदी बढ़ा है. इससे ये प्रतीत हो रहा है एफ्लूएंट सेगमेंट यानी जिनके पास पैसा है वो ज्यादा निवेश कर रहे हैं जबकि छोटे निवेशक नेगेटिव रिटर्न के संकट से जूझ रहे हैं.
ऐसे में शेयर बाजार के निवेशकों को समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें. उन्हें हर रोज स्क्रीन पर अपने बढ़ते हुए नुकसान को देखना पड़ रहा है. ये दिग्गज ब्रोकरेज हाउस निवेशकों को मौजूदा हालात में सतर्क रहने की और जल्दबाजी में फैसले लेने से बचने की नसीहत दे रहे हैं.

