बढ़ते कर्ज पर घमासान, केंद्र-राज्य सरकारें आमने-सामने
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बढ़ते कर्ज पर घमासान, केंद्र-राज्य सरकारें आमने-सामने

राज्यसभा में बजट बहस के दौरान केंद्र के बढ़ते कर्ज, FRBM सीमा उल्लंघन, बढ़ते ब्याज बोझ और राज्यों को कम फंड देने के मुद्दे पर तीखी नोकझोंक हुई।


पिछले सप्ताह राज्यसभा में बजट पर चर्चा के दौरान तीखा टकराव देखने को मिला, जब विपक्षी सदस्यों ने केंद्र सरकार के बढ़ते कर्ज बोझ को लेकर सवाल उठाए। वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उधारी लापरवाही से नहीं ली गई है, बल्कि राज्यों की बढ़ती वित्तीय मांगों को भी ध्यान में रखना होगा। उनका स्पष्ट संदेश था कि भारत का कर्ज घटाना केवल दिल्ली की जिम्मेदारी नहीं है राज्यों को भी इस बोझ में भागीदार बनना होगा।

आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। वित्त वर्ष 2012 (FY12) में केंद्र सरकार का कर्ज ₹43.5 लाख करोड़ था, जो वित्त वर्ष 2025 (FY25) में बढ़कर ₹200 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। अनुमान है कि यह वित्त वर्ष 2027 (FY27) तक ₹218.5 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। कोविड-19 महामारी के कारण बढ़ी उधारी को पूरी तरह दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि महामारी से पहले ही कर्ज तेजी से बढ़ रहा था और स्वास्थ्य संकट कम होने के बाद भी यह वृद्धि जारी रही।

कर्ज को समझने का एक बेहतर तरीका उसे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में देखना है। 2003 के राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के अनुसार, केंद्र और राज्यों की सम्मिलित सरकारों का कर्ज GDP के 60 प्रतिशत तक सीमित होना चाहिए, जिसमें केंद्र की सीमा 40 प्रतिशत निर्धारित है। उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि केंद्र इस सीमा का पालन करने में विफल रहा है, हालांकि महामारी वर्ष FY21 में 61.4 प्रतिशत के उच्चतम स्तर से इसमें कुछ कमी आई है।

भारत ने 1991 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज मांगते समय उसके आग्रह पर FRBM की सीमा कर्ज पर नियंत्रण और राजकोषीय घाटा GDP के 3 प्रतिशत तक सीमित रखने को स्वीकार किया था। International Monetary Fund ने आमतौर पर अपने राहत पैकेज के साथ राजकोषीय सख्ती (फिस्कल ऑस्टेरिटी) की शर्तें जोड़ी हैं। हालांकि अब IMF के विचारों में परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं।

मार्च 2022 में IMF की आंतरिक पत्रिका “Finance & Development” में प्रकाशित लेखों में कहा गया कि पुराने राजकोषीय नियम अब प्रासंगिक नहीं रहे। IMF के फिस्कल मॉनिटर के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में औसत सरकारी कर्ज GDP का 122 प्रतिशत है, जबकि उभरते बाजारों में यह 64 प्रतिशत है। भारत का सामान्य सरकारी कर्ज लगभग 80 प्रतिशत है।

दुनियाभर में ब्याज दरों में भारी गिरावट को भी पुराने सख्ती नियमों की अप्रासंगिकता का कारण बताया गया है। एक लेख में कहा गया कि 2007-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद European Union की आर्थिक पुनर्बहाली में राजकोषीय सख्ती ने देरी की। महामारी के दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता Joseph Stiglitz ने अमेरिका को सलाह दी कि वह सख्ती छोड़कर अधिक उधारी ले और अधिक खर्च करे, क्योंकि कम सरकारी खर्च विकास को बाधित कर सकता है और कर्ज-GDP अनुपात बढ़ा सकता है। भारत के संदर्भ में भी नोबेल विजेता Abhijit Banerjee और पूर्व आरबीआई गवर्नर Raghuram Rajan ने इसी तरह की दलीलें दी थीं।

कर्ज के स्तर को देखने का एक अन्य तरीका ब्याज भुगतान का अनुपात है। जितना अधिक ब्याज भुगतान होगा, उतना ही कम धन विकास और सामाजिक योजनाओं पर खर्च के लिए बचेगा। वित्त वर्ष 2012 में केंद्र का ब्याज भुगतान उसके कुल राजस्व प्राप्तियों का 20.7 प्रतिशत था, जो वित्त वर्ष 2026 (संशोधित अनुमान) में बढ़कर 25.7 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2027 (बजट अनुमान) में 26.3 प्रतिशत होने का अनुमान है। यह रुझान चिंता बढ़ाने वाला है।

जहां तक राज्यों की बढ़ती मांग का सवाल है, वित्त मंत्री ने राज्यसभा में इसका उल्लेख किया। लेकिन विश्लेषण बताते हैं कि इसके पीछे ठोस कारण हैं। पहला, 14वें वित्त आयोग (42 प्रतिशत) और 15वें वित्त आयोग (41 प्रतिशत) द्वारा अनुशंसित कर-वितरण के बावजूद, वित्त वर्ष 2018 से 2026 (बजट अनुमान) के दौरान औसतन केवल 33 प्रतिशत ही राज्यों को मिला। दूसरा, कुल हस्तांतरण—जिसमें कर-वितरण, स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन के लिए अनुदान तथा केंद्रीय योजनाओं के तहत धन शामिल है औसतन 36.7 प्रतिशत रहा, जो पहले के लगभग 50 प्रतिशत स्तर से कम है।

तीसरा, जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद राज्यों ने अधिकांश अप्रत्यक्ष करों पर अपना अधिकार छोड़ दिया, जिससे उनकी वित्तीय स्वतंत्रता और सीमित हो गई। चौथा, महामारी के बाद केंद्र ने राज्यों की उधारी पर कड़ी निगरानी रखी है और इसे बिजली क्षेत्र, शहरी निकायों तथा कारोबार सुगमता सुधारों से जोड़ दिया है। यहां तक कि नियमित धन हस्तांतरण को भी राज्यों द्वारा केंद्र की योजनाओं—जैसे PM SHRI—के अनुरूप नामकरण और क्रियान्वयन से जोड़ा गया है।

चूंकि प्रत्यक्ष करों पर लगभग केंद्र का एकाधिकार है, राज्यों के पास संसाधन जुटाने के सीमित साधन बचे हैं। ऐसे में उन्हें वित्तीय जरूरतों के लिए केंद्र की ओर देखना पड़ता है। यह बहस केवल कर्ज के आंकड़ों की नहीं, बल्कि भारत की संघीय वित्तीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों के संतुलन की भी है।

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