ईरान युद्ध के बाद 30 अरब डॉलर घट गया फॉरेक्स रिजर्व, क्या विदेशी मुद्रा में कमी से बढ़ेगी भारत की मुश्किलें?
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ईरान युद्ध के बाद 30 अरब डॉलर घट गया फॉरेक्स रिजर्व, क्या विदेशी मुद्रा में कमी से बढ़ेगी भारत की मुश्किलें?

ईरान युद्ध शुरू हुआ तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728 बिलियन डॉलर था जो कि युद्ध शुरू होने के 3 हफ्ते बाद भारत घटकर 698 बिलियन डॉलर पर आ गया है.


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मिडिल ईस्ट में बीते एक महीने से जारी तनाव के बाद से भारत की विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार गिरावट आई है. महज तीन हफ्तों में ही फॉरेक्स रिजर्व में 30 बिलियन डॉलर की कमी आ गई है. इस तेज गिरावट ने चिंता बढ़ा दी है. ऐसे में अब सवाल उठ रहा है विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का सिलसिला यहीं थम जाएगा या फिर आगे भी जारी रह सकता है?

विदेशी मुद्रा भंडार में कमी क्या है चिंता का सबब?

आईआईटी दिल्ली में डिपार्टमेंट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर सीमा शर्मा ने दे फेडरल देश को बताया, कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के चलते भारत का इंपोर्ट बिल काफी बढ़ गया है, जिसकी वजह से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ा है. इसके अलावा, रुपये में गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर रहा है. उन्होंने कहा, युद्ध के माहौल में विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में जारी बिकवाली के चलते भी स्थिति और बिगड़ रही है. प्रोफेसर सीमा शर्मा ने कहा, मिडिल ईस्ट में यह संकट जल्द से जल्द खत्म होना चाहिए, वरना हालात और बिगड़ सकते हैं और यह न सिर्फ भारत बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर अस्थिरता का खतरा पैदा करेगा. पूरी दुनिया को इस संकट को समाप्त करने के लिए एकजुट होना चाहिए. भू-राजनीतिक संघर्षों का समाधान वैश्विक आर्थिक स्थिरता की कीमत पर नहीं होना चाहिए. लोगों के लिए रोजगार, संघर्षों को खत्म करने के क्रूर तरीकों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

कच्चे तेल में तेजी ने बढ़ाई मुश्किलें

दरअसल अमेरिका - इजरायल और ईरान के बीच बीते एक महीने से जारी युद्ध के कारण कच्चे तेल के दामों में उबाल है. महज एक महीने में कच्चे तेल के दामों में 50 फीसदी से ज्यादा का उछाल आ चुका है. युद्ध शुरू होने के पहले कच्चा तेल जहां 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा था वो अब 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा है. ऐसे में सरकारी तेल कंपनियों के लिए कच्चे तेल आयात करना महंगा हो गया है. उन्हें युद्ध शुरू होने के पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हो रही है. युद्ध के भड़कने के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपये में भी जोरदार गिरावट आई है. एक डॉलर के मुकाबले रुपये का वैल्यू 95 के लेवल पर जा लुढ़का है. ऐसे में भारत की सरकारी तेल कंपनियों पर दोहरी मार पड़ी है. क्रूड ऑयल महंगा होने के साथ रुपये में कमजोरी और डॉलर में आई मजबूती के चलते कच्चा तेल आयात करने के लिए सरकारी तेल कंपनियों को ज्यादा डॉलर की दरकार पड़ रही है जिससे फॉरेक्स रिजर्व में कमी आई है.

3 हफ्ते में 30 बिलियन डॉलर घट गया फॉरेक्स रिजर्व

ईरान युद्ध शुरू हुआ तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728 बिलियन डॉलर था जिसमें विदेशी करेंसी एसेट्स की हिस्सेदारी 573 बिलियन डॉलर थी. लेकिन युद्ध शुरू होने के 3 हफ्ते बाद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार गिरावट आई और ये घटकर 698 बिलियन डॉलर पर आ गया तो फॉरेन करेंसी एसेट्स 559 बिलियन डॉलर पर आ गई. यानी महज तीन हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार में 30 बिलियन डॉलर की कमी आ गई. विदेशी ब्रोकरेज हाउस बर्नस्टेन (Bernstein) की रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात फॉरेक्स रिजर्व का करेंसी कंपोनेंट है यानी FCA (Foreign Currency Assets) है जो अब घटकर 555 अरब डॉलर रह गया है और 2021 के स्तर से भी नीचे है. दरअसल, फॉरेक्स रिजर्व में FCA का हिस्सा लगातार घटता जा रहा है और फिलहाल यह लगभग 78% से भी कम है जबकि 2021 में यह 90% से ज्यादा था. सोने की कीमतों में उछाल के कारण इस अनुपात में गिरावट कुछ हद तक समझ में आती है, लेकिन FCA का वास्तविक मूल्य सितंबर 2024 के मुकाबले लगभग 10% कम होना चिंता पैदा करता है.

आरबीआई का सख्त कदम बेअसर

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो वित्तीय वर्षों में भारत ने चौथी तिमाही में करंट अकाउंट सरप्लस दर्ज किया है, जिसका मुख्य कारण सर्विस एक्सपोर्ट और मजबूत रेमिटेंस रहा है. लेकिन इस बार स्थिति अलग दिख रही है मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) भारत के खिलाफ जा सकता है, और मिडिल ईस्ट की स्थिति के कारण रेमिटेंस भी कमजोर रह सकते हैं, जो देश में आने वाले कुल ट्रांसफर का लगभग 40% हिस्सा हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि, चौथी तिमाही फिर से डेफिसिट में जा सकती है. वैश्विक परिस्थितियां बहुत ज्यादा प्रतिकूल हों और एफआईआई का पैसा तेजी से बाहर निकलता रहे, तब सेंट्रल बैंक आरबीआई का हस्तक्षेप ज्यादा असरदार नहीं होता है. यही बात सोमवार 30 मार्च के देखने को मिली. करेंसी मार्केट में सट्टेबाजी को रोकने और तेज गिरावट को थामने के लिए आरबीआई ने बड़ा कदम उठाते हुए 28 मार्च को एक आदेश जारी कर बैंकों की 'नेट ओपन रुपया पोजीशन' (NOP) पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय कर दी. पहले बैंक अपनी पूंजी का 25% तक डॉलर रख सकते थे, जिससे सट्टेबाजी की संभावना बढ़ती जा रही थी. आरबीआई के इस कदम के बावजूद रुपये में गिरावट नहीं थमी और एक डॉलर के मुकाबले रुपया 95.23 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर जा फिसला है.

वित्त मंत्री बोलीं, - सॉलिड है फॉरेक्स रिजर्व

हालांकि डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट पर लोकसभा में बयान देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से जुड़े सवाल के जवाब में कहा, भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, वित्तीय हालत अच्छी है. वित्तीय घाटे को पिछले पांच सालों से सरकार ने काबू में रखा हुआ है जिसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हो रही है. भारत का फॉरेक्स रिजर्व बरकरार है और सॉलिड रहा है.

कब खत्म होगा युद्ध?

आर्थिक और बैंकिंग मामलों के जानकार अशवनी राणा ने दे फेडरल देश को बताया कि, विदेशी मुद्रा भंडार में जरूर गिरावट आई है लेकिन भारत को परेशान होने की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा, फॉरेक्स रिजर्व में यहां से और ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं है. बल्कि जैसे ही हालात सामान्य हुए FPI की वापसी होगी और कच्चे तेल के दाम गिरेंगे वैसे ही फॉरेक्स रिजर्व के बढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाएगा.

हालांकि हालात में सुधार इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव कितनी जल्दी खत्म होता है और विदेशी निवेशकों की कितनी जल्दी भारतीय बाजारों में वापसी होती है.

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