
AI और नई तकनीक से बासमती में उछाल, 2050 तक 3 करोड़ टन निर्यात का अनुमान
पद्मश्री वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह के अनुसार मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2050 तक भारत 3 करोड़ टन बासमती चावल निर्यात कर सकता है।
भारत आने वाले वर्षों में बासमती चावल के वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ और मजबूत कर सकता है। मशहूर धान वैज्ञानिक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अशोक कुमार सिंह का अनुमान है कि यदि मौजूदा वृद्धि दर जारी रही तो वर्ष 2050 तक भारत करीब 3 करोड़ टन बासमती चावल का निर्यात कर सकता है। यह अनुमान दुनिया भर में प्रीमियम चावल की बढ़ती मांग और बेहतर वैज्ञानिक शोध की जरूरत को दर्शाता है।
बासमती चावल का निर्यात पहले से ही भारत के लिए अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा कमाता है। बेहतर किस्मों का विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और पानी बचाने वाली खेती की तकनीकें तय करेंगी कि भारत वैश्विक बाजार में अपनी बढ़त को कितना आगे बढ़ा पाता है।
बासमती अनुसंधान और निर्यात पर वैज्ञानिक की राय
प्रसिद्ध चावल वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह, जिन्होंने लोकप्रिय किस्म ‘पूसा बासमती-1509’ विकसित की, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व निदेशक रह चुके हैं और वर्तमान में वहीं एमेरिटस वैज्ञानिक हैं। उन्होंने बासमती अनुसंधान, निर्यात, नई प्रजनन तकनीकों और इस फसल के भविष्य पर विस्तार से बात की।
क्या पश्चिम एशिया तनाव से निर्यात प्रभावित होगा?
डॉ. सिंह के अनुसार यदि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष एक महीने के भीतर समाप्त हो जाता है, तो फिलहाल समुद्र में या भारतीय बंदरगाहों पर रुकी बासमती की खेप अंततः अपने गंतव्य तक पहुंच जाएगी। अधिकांश ऑर्डर पहले से ही आयातकों द्वारा तय किए जा चुके हैं।
हालांकि समस्या युद्ध अधिभार (War Surcharge) की है, जो बढ़कर करीब 2000 डॉलर प्रति कंटेनर हो गया है। अगर स्थिति लंबी चली तो निर्यातकों के लिए लागत संभालना मुश्किल हो सकता है। साथ ही बंदरगाहों पर अटके चावल पर डेमरेज या नुकसान शुल्क भी बढ़ सकता है।
इस वर्ष भारत को लगभग 65 लाख टन बासमती निर्यात की उम्मीद थी, जबकि पिछले साल यह करीब 60 लाख टन था। आमतौर पर हर महीने लगभग 5 लाख टन बासमती का निर्यात होता है, जिसमें से करीब 70 प्रतिशत पश्चिम एशिया जाता है।
यूरोप में भारतीय बासमती की स्थिति
यूरोपीय संघ (EU) भी भारतीय बासमती का बड़ा बाजार है। मूल्य के लिहाज से यहां निर्यात करीब 7,000–8,000 करोड़ रुपये का है। 2016–17 में भारत ने यूरोप को लगभग 6 लाख टन बासमती निर्यात किया था। लेकिन कीटनाशक अवशेषों को लेकर चिंताओं के कारण 2020 के आसपास यह घटकर 2.5 लाख टन रह गया। अब स्थिति सुधर रही है क्योंकि नई किस्में बैक्टीरियल ब्लाइट और ब्लास्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी हैं, जिससे कीटनाशकों का इस्तेमाल कम हो गया है।
यूरोप के कड़े मानक
यूरोपीय संघ के मानक बेहद सख्त हैं। वहां किसी भी ऐसे कीटनाशक के लिए, जिसका उपयोग यूरोप में नहीं होता, अवशेष सीमा 0.01 पार्ट्स प्रति मिलियन तय की गई है। यह प्रयोगशाला उपकरणों की पहचान सीमा के बराबर है। तुलना करें तो अमेरिका में यह सीमा करीब 3 ppm और जापान में 8 ppm तक है। नई रोग प्रतिरोधी किस्मों के कारण बासमती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत कम हो गया है, जिससे निर्यात के लिए बेहतर गुणवत्ता का चावल मिल रहा है।
क्या यूरोप खुद सुगंधित चावल उगाता है?
डॉ. सिंह के अनुसार यूरोपीय संघ में सुगंधित चावल का उत्पादन नहीं होता। वहां मुख्य रूप से अमेरिकी लॉन्ग-ग्रेन चावल और कुछ मात्रा में थाईलैंड का जैस्मिन राइस खाया जाता है। इसलिए यूरोप के बाजार में बासमती का अपना अलग महत्व बना हुआ है।
नई किस्में: ज्यादा उत्पादन और कम समय
उदाहरण के तौर पर पूसा बासमती-1509 की पैदावार पूसा बासमती-1121 से ज्यादा है। जहां 1121 की औसत उपज लगभग 18 क्विंटल प्रति एकड़ है, वहीं 1509 करीब 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक उपज देती है।
साथ ही इसकी फसल अवधि भी कम है—करीब 120 दिन, जबकि पहले 145 दिन लगते थे। रोग प्रतिरोधी किस्में किसानों की प्रति एकड़ करीब 3000 रुपये कीटनाशक खर्च भी बचाती हैं।
‘बाकाने’ बीमारी से चुनौती
बासमती में एक बड़ी समस्या ‘बाकाने’ नामक फंगल रोग है। यह फंगस पौधे में गिबरेलिक एसिड बनाता है, जिससे पौधा असामान्य रूप से लंबा हो जाता है और अंत में सूख जाता है। ‘बाकाने’ जापानी शब्द है, जिसका अर्थ है “मूर्ख पौधा” क्योंकि संक्रमित पौधे बाकी पौधों से बहुत ऊंचे दिखते हैं। अधिकांश बासमती किस्में इस रोग के प्रति संवेदनशील हैं और लगभग 10–15 प्रतिशत तक संक्रमण हो सकता है। वैज्ञानिक अब पारंपरिक किस्मों और जंगली प्रजातियों में ऐसे जीन खोज रहे हैं जो इस बीमारी के प्रति प्रतिरोधक हों।
नई तकनीकों से तेज हो गया अनुसंधान
पहले बासमती की नई किस्म विकसित करने में 20–25 साल लग जाते थे। उदाहरण के तौर पर पहली सेमी-ड्वार्फ किस्म विकसित होने में करीब 24 साल लगे थे। अब मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग, मार्कर-सहायता चयन, ऑफ-सीजन नर्सरी और स्पीड ब्रीडिंग जैसी तकनीकों से यह समय घटकर करीब 6 साल रह गया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग
आजकल पौध प्रजनन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भी उपयोग शुरू हो गया है। जीनोमिक डेटा के आधार पर वैज्ञानिक पौधों की संभावित क्षमता का अनुमान लगा सकते हैं, जिससे हजारों पौधों की फील्ड टेस्टिंग की जरूरत कम हो जाती है।
2050 तक 3 करोड़ टन निर्यात की संभावना
2010 में भारत ने लगभग 23 लाख टन बासमती निर्यात किया था। 2025 तक यह बढ़कर करीब 60 लाख टन हो गया। यदि यही रफ्तार जारी रही तो 2040 तक 1.6 करोड़ टन और 2050 तक करीब 3 करोड़ टन निर्यात संभव है।
मूल्य के लिहाज से बासमती निर्यात 2010 में 11,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025 में 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और भविष्य में यह 5.9 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है।
खेती का विस्तार कहां होगा?
बासमती चावल को भौगोलिक संकेतक (GI) का दर्जा प्राप्त है, इसलिए इसे केवल निर्धारित क्षेत्रों में ही उगाया जा सकता है। पंजाब में लगभग 32 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है, लेकिन केवल 7–8 लाख हेक्टेयर में ही बासमती उगाया जाता है। बाकी क्षेत्र में गैर-बासमती धान है, जिसे पूर्वी राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल—की ओर स्थानांतरित किया जा सकता है।
खेती की नई पद्धति की जरूरत
पारंपरिक धान उत्पादन में 1 किलो चावल के लिए लगभग 3000 लीटर पानी लगता है। इसलिए वैज्ञानिक डायरेक्ट-सीडेड राइस (DSR) पद्धति को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग 35 प्रतिशत कम हो सकता है, मजदूरी लागत में करीब 6000 रुपये प्रति एकड़ की बचतपानी की खपत में लगभग 35 प्रतिशत कमी आ सकती है।
अनुसंधान पर अधिक निवेश की जरूरत
डॉ. सिंह का मानना है कि भारत को कृषि अनुसंधान पर और अधिक निवेश करना चाहिए। कई देशों में कृषि जीडीपी का लगभग 1 प्रतिशत अनुसंधान पर खर्च किया जाता है।भारत में कृषि जीडीपी का 1 प्रतिशत लगभग 54,000 करोड़ रुपये होगा, जबकि अभी खर्च इससे कम है। दिलचस्प बात यह है कि बासमती निर्यात से ही भारत को हर साल लगभग 6 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा मिलती है।
उनके अनुसार यदि निर्यात से मिलने वाले सेस या मंडी शुल्क का छोटा हिस्सा भी शोध में लगाया जाए, तो भारत कृषि नवाचार को काफी मजबूत बना सकता है।

