
जनवरी में बेरोजगारी दर बढ़कर हुई 5%, महिलाओं की नौकरी पर गहराया संकट
जनवरी में देश की बेरोजगारी दर बढ़कर 5% हो गई है, जो दिसंबर में 4.8% थी। जिसमें महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब रही। कुल मिलाकर, रोजगार के मोर्चे पर साल की शुरुआत चुनौतीपूर्ण रही है।
नई दिल्ली: जनवरी महीने में देश की बेरोजगारी दर में हल्की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बेरोजगारी दर दिसंबर के 4.8% से बढ़कर जनवरी में 5% हो गई। यह बढ़ोतरी भले ही मामूली लगती हो, लेकिन महिलाओं और युवाओं के बीच बेरोजगारी में ज्यादा तेजी से इजाफा देखा गया है।
ये आंकड़े उन लोगों पर आधारित हैं जिनकी उम्र 15 साल या उससे अधिक है और जो काम नहीं कर रहे थे, लेकिन सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश कर रहे थे। ये आंकड़े करंट वीकली स्टेटस (CWS) के आधार पर तैयार किए गए हैं। इसका मतलब है कि सर्वे से पहले के सात दिनों में व्यक्ति ने काम किया या नौकरी की तलाश की, उसी आधार पर उसकी स्थिति तय की जाती है।
युवाओं में बढ़ी चिंता
15 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर जनवरी में बढ़कर 14.7% हो गई, जो दिसंबर में 14.4% थी। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से युवा महिलाओं में बेरोजगारी बढ़ने की वजह से हुई है। हालांकि, पुरुष युवाओं की बेरोजगारी दर में हल्की गिरावट देखने को मिली, लेकिन महिलाओं के बीच नौकरी की कमी ने कुल आंकड़े को ऊपर धकेल दिया। इससे साफ है कि रोजगार के अवसरों में लैंगिक असमानता अब भी बनी हुई है।
महिलाओं की स्थिति ज्यादा प्रभावित
जनवरी के आंकड़ों से पता चलता है कि महिलाओं के लिए रोजगार की स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण रही। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में बेरोजगारी ज्यादा तेजी से बढ़ी है। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि नौकरी के अवसरों तक महिलाओं की पहुंच अब भी सीमित है। कई क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कम हो रही है, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।
श्रम बल भागीदारी दर में गिरावट
श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) यानी काम कर रहे या काम की तलाश कर रहे लोगों का कुल आबादी में हिस्सा भी जनवरी में घटा है। यह दर दिसंबर के 56.1% से घटकर जनवरी में 55.9% रह गई। पुरुषों की भागीदारी दर घटकर 77.6% हो गई, जबकि महिलाओं की भागीदारी दर 35.1% पर आ गई। इसका मतलब है कि कम लोग या तो काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं।
गांव और शहर का अंतर
ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम भागीदारी दर जनवरी में घटकर 58.7% रह गई, जो दिसंबर में 59% थी। यानी गांवों में काम करने या काम ढूंढने वालों की संख्या कम हुई है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में मामूली सुधार देखा गया। शहरों में श्रम भागीदारी दर 50.2% से बढ़कर 50.3% हो गई। हालांकि यह बढ़ोतरी बहुत छोटी है, लेकिन इससे संकेत मिलता है कि शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर थोड़े बेहतर हो सकते हैं।
क्या है इसका मतलब?
जनवरी के आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजगार की स्थिति में हल्का दबाव बना हुआ है। खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए नौकरी के अवसर सीमित हो रहे हैं। अगर श्रम भागीदारी दर लगातार घटती है, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार के नए अवसर पैदा करना और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना आने वाले समय में बड़ी चुनौती होगी। कुल मिलाकर, नए साल की शुरुआत रोजगार के मोर्चे पर बहुत सकारात्मक नहीं रही है। सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह जरूरी होगा कि वे रोजगार बढ़ाने और युवाओं व महिलाओं के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

