ट्रेड डील या रणनीतिक चूक, भारत के लिए क्यों खतरनाक है यह समझौता?
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ट्रेड डील या रणनीतिक चूक, भारत के लिए क्यों खतरनाक है यह समझौता?

भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को अर्थशास्त्री असंतुलित बता रहे हैं, जिसमें भारत को ज़ीरो ड्यूटी देनी होगी जबकि अमेरिका भारतीय निर्यात पर 18% टैरिफ लगाएगा।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई फोन बातचीत के बाद घोषित भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब तक सामने आए ढांचे के मुताबिक यह समझौता वॉशिंगटन के पक्ष में बुरी तरह झुका हुआ है और भारत की व्यापार रणनीति पर इसके दूरगामी असर हो सकते हैं।

प्रख्यात व्यापार अर्थशास्त्री बिस्वजीत धर ने इस समझौते को “प्रथम दृष्टया पूरी तरह असंतुलित” बताते हुए द फेडरल को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि इसमें टैरिफ प्रतिबद्धताओं में भारी असमानता है। जहां अमेरिका भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाने जा रहा है, वहीं भारत अमेरिकी वस्तुओं को लगभग शुल्क-मुक्त पहुंच देने को तैयार है।

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर धर बताते हैं कि यह समझौता विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत के लंबे समय से चले आ रहे रुख से अलग है, भारतीय निर्यातकों को कोई ठोस फायदा नहीं देता और घरेलू उद्योग के साथ-साथ बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को भी कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है।

सवाल: अब तक उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह अंतरिम व्यापार समझौता कितना संतुलित है?

मैं यह बात सोमवार (2 फरवरी) की रात से कह रहा हूं, जब ट्रंप ने ट्वीट कर कहा था कि यह डील पूरी हो गई है। टैरिफ का अंतर साफ तौर पर दिखता है। अमेरिका भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा, जबकि भारत अमेरिकी निर्यात को ड्यूटी-फ्री पहुंच दे रहा है। यह अपने आप में पूरी तरह असंतुलित सौदा है।

इन तथाकथित ‘रेसिप्रोकल टैरिफ्स’ से पहले, भारतीय उत्पादों पर अमेरिका का औसत टैरिफ करीब 2.5 प्रतिशत था। यह समझौता अमेरिकी टैरिफ को लगभग सात गुना बढ़ा देता है। यह एक बेहद अजीब स्थिति है।

भारत हमेशा यह कहता रहा है कि एक विकासशील देश होने के नाते उसे ‘विशेष और विभेदित व्यवहार’ (Special and Differential Treatment) का अधिकार है। इसका मतलब यह था कि विकसित देश विकासशील देशों की तुलना में कम टैरिफ लगाएंगे। यहां हमने ठीक उलटा स्वीकार कर लिया है—विकसित देश ज्यादा टैरिफ लगाएगा और हम अपने टैरिफ खत्म कर रहे हैं।

WTO की मंत्रीस्तरीय बैठक जल्द होने वाली है। हमें वहां कहीं ज्यादा सक्रिय रुख अपनाना चाहिए था, न कि इस तरह के एकतरफा ढांचे को स्वीकार करना चाहिए था। दशकों से भारत WTO और दूसरे मंचों पर इस सिद्धांत की रक्षा करता रहा है, क्योंकि इससे हमें सिर्फ टैरिफ में ही नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की समय-सीमा और अन्य क्षेत्रों में भी फायदा मिलता है। यह समझौता उस पूरी सोच के खिलाफ है और गहराई से असंतुलित दिखता है।

सवाल: लेकिन क्या दूसरे प्रतिस्पर्धी निर्यातक भी इसी तरह के टैरिफ का सामना नहीं कर रहे हैं, जिससे भारत को थोड़ा फायदा मिल सकता है?

कपड़ों (गारमेंट्स) का उदाहरण लें। बांग्लादेश और वियतनाम पर 19 प्रतिशत टैरिफ है, जबकि भारत पर 18 प्रतिशत। एक प्रतिशत का यह अंतर हमें कोई वास्तविक फायदा नहीं देता। बांग्लादेश कीमत के लिहाज से कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी है और वियतनाम कहीं ज्यादा कुशल। हम पहले ही वैश्विक बाजारों में उनसे प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष कर रहे हैं। टैरिफ लगभग बराबर होने से यह हकीकत नहीं बदलती। अगर कोई फायदा चाहिए होता, तो कहीं ज्यादा बड़ा टैरिफ अंतर जरूरी था।

सवाल: क्या यह ट्रंप के दौर में बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के टूटने का भी संकेत है?

हां। ट्रंप साफ तौर पर वैश्विक व्यापार व्यवस्था को उलट-पलट देना चाहते हैं। लेकिन भारत और अन्य देश WTO की प्रासंगिकता बहाल करने के लिए एकजुट होने की कोशिश कर रहे थे। जो हम अब कर रहे हैं, वह एक तरह का हार मान लेने वाला रवैया दिखाता है—यह मान लेना कि ट्रंप जो चाहें करेंगे और बहुपक्षीय व्यवस्था को कुचलने दिया जाए।

यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है। इसका असर वित्त, जलवायु परिवर्तन और दूसरे बहुपक्षीय समझौतों पर भी पड़ता है। भारत, जो कभी इन क्षेत्रों में नेतृत्व करता था, अब विरोध करने के बजाय समर्पण करता दिख रहा है।

सवाल: क्या इतने बड़े स्तर पर व्यापार खोलने से भारतीय उद्योग ज्यादा कुशल बन पाएगा?

मुझे ऐसा नहीं लगता। भारत ने करीब 22 मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं। जिन-जिन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ हमने FTA किया है, उनके साथ हमारा व्यापार घाटा बढ़ा है, क्योंकि भारतीय उद्योग न तो प्रतिस्पर्धा कर पाया है और न ही प्रभावी ढंग से निर्यात कर पाया है।

भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और कृषि में गंभीर प्रतिस्पर्धात्मक समस्या है। अगर हम कीमत, गुणवत्ता और मानकों में प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, तो शून्य टैरिफ भी कोई मदद नहीं करेगा। अगर हम घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, तो अचानक वैश्विक स्तर पर कैसे हो जाएंगे?

इसके अलावा, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार में अब टैरिफ असली मुद्दा नहीं रह गया है। वे गैर-टैरिफ उपायों पर निर्भर करते हैं—जैसे खाद्य सुरक्षा मानक, पर्यावरण मानक और श्रम मानक—जो सभी WTO के तहत वैध हैं। हमारे नीति-निर्माता अब भी मानते हैं कि दुनिया सिर्फ टैरिफ के इर्द-गिर्द घूमती है।

विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने हाल ही में कहा था कि आज व्यापार में असली बाधाएं गैर-टैरिफ उपाय हैं। दुर्भाग्य से, हमारे नीति-निर्माता इस सच्चाई को समझ नहीं पाए हैं।

सवाल: क्या भारतीय निर्यातक इन गैर-टैरिफ मानकों को पूरा कर सकते हैं?

खाद्य सुरक्षा को ही देख लीजिए। भारत में प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में रसायनों और कीटनाशकों का स्तर अक्सर स्वीकार्य सीमा से ज्यादा होता है। उपभोक्ता बड़े पैमाने पर इससे अनजान हैं और सुरक्षित उत्पादों की मांग को लेकर कोई मजबूत उपभोक्ता आंदोलन भी नहीं है।

व्यवसाय घरेलू बाजार में घटिया उत्पाद बेचने के आदी हो गए हैं और मान लेते हैं कि वैश्विक बाजार भी इसे स्वीकार कर लेगा। ऐसा नहीं होगा। सिर्फ टैरिफ घटाने से प्रतिस्पर्धा नहीं आएगी। हम मैन्युफैक्चरिंग मजबूत करने में नाकाम रहे हैं, चीन पर हमारी निर्भरता बढ़ रही है और FTA साझेदारों के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है।

सवाल: क्या यह समझौता वाकई ‘रेसिप्रोकल’ है, जैसा दावा किया जा रहा है?

बिलकुल नहीं। ट्रंप की ‘रेसिप्रॉसिटी’ की परिभाषा ही गलत है। उनका मानना है कि व्यापार घाटा अपने आप में अनुचित है और इसे टैरिफ के जरिए ठीक किया जाना चाहिए। जबकि व्यापार बाजार की ताकतों से चलता है। अगर अमेरिका ने प्रतिस्पर्धा खो दी है, तो वह ज्यादा आयात करेगा और घाटा बढ़ेगा। वैश्विक एकीकरण को उलटकर दंडात्मक टैरिफ को ‘रेसिप्रोकल’ कहना शब्दों का गलत इस्तेमाल है।

सवाल: कृषि और जीएम फसलों की सुरक्षा को लेकर क्या भरोसा है?

कोई कानूनी स्पष्टता नहीं है। संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत कृषि में सभी गैर-टैरिफ बाधाएं हटाएगा। सबसे बड़ी गैर-टैरिफ बाधा जीएम प्रतिबंध थे। अगर सभी बाधाएं हटाई जाती हैं, तो इसका मतलब जीएम आयात की अनुमति होगा। अगर कृषि को वाकई बाहर रखा गया है, तो समझौते में इसे साफ-साफ लिखा जाना चाहिए।

सवाल: क्या यह एक चेतावनी है?

बिलकुल। यह सिर्फ टैरिफ घटाने का मामला नहीं है। भारत को अपना घर दुरुस्त करना होगा—कृषि और उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा और वैश्विक मानकों के अनुरूप ढलना होगा। अगर हम ऐसा नहीं कर सकते, तो सिर्फ टैरिफ कटौती के सहारे बाजार खुलने का भ्रम पालना बंद करना होगा।

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