
सैलरी FD में लगाने की सोच रहे हैं? Gen Z को जाननी चाहिए ये बातें
FD महंगाई को मात नहीं दे सकते। क्योंकि, इसका रिटर्न महंगाई के बराबर होता है और टैक्स स्लैब में तो यह उससे भी कम है।
नई पीढ़ी के लिए सैलरी मिलने का दिन अब सिर्फ राहत नहीं, बल्कि सवाल उठाने का मौका बन गया है कि यह पैसा आखिर कहां चला जाता है? जैसे-जैसे आय बढ़ती है और वित्तीय जिम्मेदारियां गहरी होती हैं, पैसे के निर्णय गंभीर हो जाते हैं। जैसे ही सैलरी बैंक एकाउंट में आती है, चारों तरफ से एडवाइज मिलनी शुरू हो जाती हैं—FD सुरक्षित हैं, म्यूचुअल फंड महंगाई को हराते हैं, अभी SIP शुरू करो, शेयर बाजार भविष्य है… ये बातें सुनने में आम हैं, लेकिन इन्हें सही तरीके से समझना उतना आसान नहीं है।
ब्याज की बुनियादी समझ
इन सभी विकल्पों के मूल में एक चीज है—ब्याज (Interest)। ब्याज मूलतः पैसे की कीमत है। जब आप अपने पैसे बैंक, कंपनी या बाजार में देते हैं तो आप इसके बदले कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। बैंक ब्याज देते हैं, जबकि शेयर बाजार रिटर्न देता है। भारत में ब्याज दरें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) तय करता है। RBI रेपो दर तय करता है, जो वह दर है जिस पर बैंक पैसा उधार लेते हैं। जब रेपो दर बढ़ती है, बैंक ब्याज दरें भी सामान्यतः बढ़ती हैं और जब घटती है, बैंक दरें कम हो जाती हैं। इसी कारण से FD दरें समय के साथ बदलती रहती हैं।
FD कैसे काम करता है?
फिक्स्ड डिपॉजिट मतलब आपका पैसा बैंक में एक निश्चित अवधि के लिए रखना—जैसे 1 साल, 3 साल या 5 साल और तय ब्याज दर पर रिटर्न पाना। इस रिटर्न का शेयर बाजार या आर्थिक उतार-चढ़ाव से कोई लेना-देना नहीं। इस स्थिरता के कारण ही FDs को सुरक्षित माना जाता है। इसके अलावा हर बैंक में ₹5 लाख तक की जमा राशि सरकार द्वारा बीमित होती है, जो निवेशकों को अतिरिक्त सुरक्षा देती है।
विशेषज्ञों की सलाह
- इमरजेंसी फंड
- शॉर्ट-टर्म गोल्स
- सुरक्षित निवेशक
फिक्स्ड डिपॉजिट मुख्यतः नज़दीकी समय के उद्देश्यों के लिए उपयुक्त है। अगर अगले 3-5 साल में पैसे की जरूरत है और जोखिम नहीं उठाना चाहते तो FD मददगार है।
महंगाई का खतरा
समस्या तब आती है, जब FDs को लंबी अवधि के निवेश के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कई लोग 10-15 साल के लिए पैसे FD में लॉक कर देते हैं, जो विशेषज्ञों के अनुसार खराब वित्तीय निर्णय है। भारत में ऐतिहासिक रूप से महंगाई लगभग 7% रही है। हाल के वर्षों में यह घटकर लगभग 6% हो गई है। इसके मुकाबले FD रिटर्न आमतौर पर 6-7% के बीच होता है। टैक्स कटने के बाद वास्तविक रिटर्न और भी कम हो जाता है। उदाहरण के लिए ₹1 लाख का FD 7% ब्याज दर पर साल भर में ₹1.07 लाख देगा। लेकिन अगर महंगाई 6% है तो वास्तविक बढ़ोतरी मात्र ₹1,000 होती है।
विशेषज्ञ अरुण कुमार कहते हैं कि FD का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि यह महंगाई के बाद आपके पैसे को बढ़ने नहीं देता। जो आप आज खरीद सकते हैं, वह कुछ साल बाद शायद उतना ही या उससे भी कम खरीद पाएंगे। कुल मिलाकर FDs सुरक्षा, निश्चितता और मानसिक शांति देते हैं, लेकिन लंबी अवधि के लिए धन वृद्धि सीमित होती है। लेकिन लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए FD पर्याप्त नहीं।
अरुण कुमार का कहना है कि FD मूलतः महंगाई को मात नहीं दे सकते। अधिकतम इसका रिटर्न महंगाई के बराबर होता है और उच्च कर स्लैब में तो यह उससे भी कम है। आखिरकार निवेश का फैसला लक्ष्यों, समय सीमा और जोखिम क्षमता पर निर्भर करता है। FD क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, इसे समझना स्मार्ट वित्तीय निर्णय लेने की पहली सीढ़ी है।

