क्या ईरान युद्ध के पीछे पेट्रोडॉलर की राजनीति? समझिए पूरा खेल
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क्या ईरान युद्ध के पीछे पेट्रोडॉलर की राजनीति? समझिए पूरा खेल

ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच पेट्रोडॉलर थ्योरी चर्चा में है। विश्लेषकों के मुताबिक तेल व्यापार को डॉलर में बनाए रखना अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकता हो सकती है।


Petrodollar System News: अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को 12 दिन से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन हालात अभी शांत होते नहीं दिख रहे। आधिकारिक तौर पर इस युद्ध की वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बताया जा रहा है, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे वैश्विक ऊर्जा बाजार और डॉलर की राजनीति भी एक बड़ा कारण हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका का वैश्विक दबदबा काफी हद तक डॉलर पर टिका हुआ है। इसलिए वह किसी भी स्थिति में डॉलर की ताकत कमजोर नहीं होने देना चाहता। इसी संदर्भ में पेट्रोडॉलर और पेट्रोडॉलर वॉर थ्योरी की चर्चा अक्सर सामने आती है।

पेट्रोडॉलर क्या है?

पेट्रोडॉलर उस व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें दुनिया भर में तेल और गैस का व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डॉलर की मांग बनी रहती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिलता है।

विश्लेषकों का तर्क है कि अगर तेल का व्यापार किसी दूसरी मुद्रा जैसे यूरो या चीनी युआन में होने लगे, तो इससे डॉलर की वैश्विक ताकत कमजोर पड़ सकती है। इसलिए अमेरिका ऊर्जा बाजार में डॉलर की केंद्रीय भूमिका बनाए रखने की कोशिश करता है।

अमेरिका के मकसद पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के कई विदेशी हस्तक्षेपों को सिर्फ तेल के नजरिये से समझना पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि इसके पीछे पेट्रोडॉलर सिस्टम को बनाए रखने की रणनीति भी हो सकती है।इस व्यवस्था के तहत दुनिया का अधिकांश तेल कारोबार डॉलर में होता है, जिससे अमेरिकी मुद्रा का वैश्विक वर्चस्व बना रहता है।

पेट्रोडॉलर वॉर थ्योरी क्या कहती है?

पेट्रोडॉलर वॉर थ्योरी के समर्थकों का तर्क है कि अमेरिका अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा या मानवीय कारणों का हवाला देकर विदेशों में हस्तक्षेप करता है, लेकिन असल चिंता ऊर्जा व्यापार में डॉलर की भूमिका को सुरक्षित रखना होती है।इस थ्योरी के अनुसार यदि कोई देश तेल की कीमतें डॉलर के बजाय किसी दूसरी मुद्रा में तय करने की कोशिश करता है, तो वह अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है। ऐसे मामलों में आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक दबाव या सैन्य कार्रवाई तक देखने को मिल सकती है।

कैसे शुरू हुआ पेट्रोडॉलर सिस्टम ?

1971 में ब्रेटन वुड्स सिस्टम खत्म होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को गोल्ड स्टैंडर्ड से अलग कर दिया। इससे डॉलर को पहले मिलने वाला सोने का समर्थन खत्म हो गया।इसके बाद 1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ। इसके तहत सऊदी अरब ने अपना तेल केवल डॉलर में बेचने पर सहमति दी, जबकि अमेरिका ने उसे सुरक्षा और वित्तीय सहयोग की गारंटी दी। बाद में ओपेक के अन्य देशों ने भी इसी मॉडल को अपनाया और धीरे-धीरे वैश्विक तेल व्यापार डॉलर आधारित हो गया। यही व्यवस्था पेट्रोडॉलर सिस्टम के नाम से जानी जाने लगी।

क्या है पेट्रोडॉलर रिसाइक्लिंग?

तेल निर्यातक देशों को तेल बेचने से जो डॉलर मिलते हैं, उनका बड़ा हिस्सा वे अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और अन्य वित्तीय संपत्तियों में निवेश कर देते हैं। इस प्रक्रिया को “पेट्रोडॉलर रिसाइक्लिंग” कहा जाता है।आज दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत तेल कारोबार डॉलर में होते हैं। इसके साथ ही वैश्विक बैंकिंग नेटवर्क SWIFT भी डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली को मजबूत बनाता है।

कब-कब डॉलर को चुनौती मिली?

पेट्रोडॉलर थ्योरी के समर्थक कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं।

साल 2000 में इराक के नेता सद्दाम हुसैन ने तेल का व्यापार डॉलर के बजाय यूरो में करने की घोषणा की थी। 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हमला हुआ और बाद में वहां तेल कारोबार फिर से डॉलर में होने लगा।

लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी ने अफ्रीका में गोल्ड आधारित मुद्रा दीनार का विचार रखा था। 2011 में नाटो के सैन्य अभियान के दौरान उनकी सत्ता खत्म हो गई।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने चीन और रूस के साथ तेल व्यापार बढ़ाने और डॉलर से अलग भुगतान व्यवस्था की कोशिश की, जिसके बाद अमेरिका ने उस देश पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।

ईरान क्यों अहम माना जाता है?

विश्लेषकों के अनुसार ईरान लंबे समय से अपने तेल व्यापार में डॉलर के विकल्प तलाशता रहा है। 2000 के बाद से ईरान ने यूरो और युआन जैसी मुद्राओं में व्यापार की संभावनाओं पर काम किया है। इसी वजह से कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक ऊर्जा बाजार और मुद्रा राजनीति के बड़े समीकरण भी जुड़े हो सकते हैं।

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