
ईरान-इजरायल युद्ध का असर: 80% बासमती बाजार पर मंडराया खतरा, निर्यात हुआ ठप
अजय भलोटिया और वरुण गोयल ने बताया कैसे युद्ध की वजह से 4 लाख टन चावल का संकट खड़ा हुआ है। पैकिंग से लेकर शिपिंग तक, हर मोर्चे पर बढ़ी भारतीय एक्सपोर्टर्स की लागत।
Israel/USA Vs Iran War: इजरायल/अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण जंग को आज आठ दिन पूरे हो चुके हैं। इस युद्ध की तपिश अब केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे देशों के विदेशी व्यापार पर भी इसका गहरा और डरावना असर दिखने लगा है। सबसे बड़ा दुष्प्रभाव कृषि क्षेत्र और विशेषकर बासमती चावल के निर्यात (Export) पर पड़ा है। खाड़ी देशों में छिड़ी इस जंग ने भारतीय चावल निर्यातकों की कमर तोड़कर रख दी है। निर्यातकों के अनुसार, मिडिल ईस्ट का पूरा बाजार इस समय अनिश्चितता के घेरे में है। युद्ध के कारण रणनीतिक समुद्री रास्ते बंद या असुरक्षित हो गए हैं। कई देशों को जाने वाले माल के कंटेनर बीच रास्ते में ही लटक गए हैं। इससे भारतीय व्यापारियों को करोड़ों रुपये के भारी वित्तीय नुकसान की आशंका है। भारत के लिए मिडिल ईस्ट बासमती चावल का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण खपत केंद्र माना जाता है। इस समस्या को समझने के लिए द फ़ेडरल देश ने आल इंडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी अजय भालोटिया और चावल एक्सपोर्टर वरुण गोयल से बात की।
4 लाख टन चावल का संकट और शिपिंग लाइन्स की मनमानी
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी अजय भलोटिया ने इस संकट के आंकड़े साझा किए हैं। उनके अनुसार, लगभग 4 लाख टन भारतीय चावल इस समय युद्ध के कारण फंसा हुआ है। इसमें से 2 लाख टन माल भारतीय बंदरगाहों पर ही खड़ा रह गया है। वहीं, 2 लाख टन कार्गो या तो समुद्र में है या विदेशी डेस्टिनेशन पोर्ट पर है। शिपिंग लाइन्स ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए भारी 'वॉर सरचार्ज' वसूलना शुरू कर दिया है। नई बुकिंग और ट्रांजिट माल पर प्रति कंटेनर लगभग 2000 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जा रहा है। भारतीय रुपयों में यह राशि प्रति कंटेनर बहुत अधिक बैठती है। एक कंटेनर में अमूमन 24 से 25 टन चावल का निर्यात किया जाता है। इतना भारी सरचार्ज देना किसी भी छोटे या मंझले निर्यातक के लिए संभव नहीं है।
निर्यातकों पर $2000 के वॉर सरचार्ज का अतिरिक्त बोझ
चावल निर्यातक वरुण गोयल ने इस स्थिति पर अपनी गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने बताया कि मिडिल ईस्ट को होने वाला निर्यात अब पूरी तरह रुक सा गया है। शिपिंग लाइन्स द्वारा लगाया गया $2000 का सरचार्ज असल में $80 प्रति टन के बराबर है। चावल के व्यापार में मार्जिन पहले से ही बहुत कम और प्रतिस्पर्धी होता है। ऐसे में यह अतिरिक्त बोझ निर्यातकों के मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर देगा। पुराने ऑर्डर्स पर भी अब संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। कई विदेशी खरीदार इस बढ़े हुए खर्च को उठाने से साफ इनकार कर रहे हैं। वरुण गोयल के अनुसार, अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो कई निर्यातकों का दिवालिया निकल सकता है। अब स्थिति ऐसी है कि जो माल पहुंच चुका है, उसे उतारने पर भी विवाद बढ़ रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव और 'डिस्ट्रेस सेलिंग' का डर
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो यह युद्ध वैश्विक व्यापार के सबसे व्यस्त रास्तों को प्रभावित कर रहा है। इराक, कुवैत और ईरान जाने वाला माल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। युद्ध के कारण यह समुद्री रास्ता अब जहाजों के लिए पूरी तरह असुरक्षित घोषित हो चुका है। वरुण गोयल के अनुसार ईरान भारतीय बासमती चावल का एक बहुत बड़ा और पारंपरिक खरीदार देश रहा है। वहां की शिपमेंट रुकने से पूरा पेमेंट सर्कल और व्यापारिक लेनदेन बाधित हुआ है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय घरेलू बाजार में 'डिस्ट्रेस सेलिंग' यानी मजबूरी में बिक्री के हालात बन रहे हैं। जो चावल ऊंचे अंतरराष्ट्रीय दामों पर बिकना चाहिए था, उसके भाव घरेलू मंडियों में गिर रहे हैं। व्यापारी अब अपना स्टॉक निकालने के लिए औने-पौने दामों पर माल बेचने को मजबूर हो रहे हैं।
पैकेजिंग लागत में 50 रुपये किलो का बड़ा उछाल
युद्ध का असर केवल शिपिंग या समुद्री रास्तों तक ही सीमित नहीं है। कच्चे तेल की अस्थिरता ने सहायक उद्योगों, खासकर पैकेजिंग इंडस्ट्री को हिला दिया है। पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स से जुड़े कच्चे माल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। वरुण गोयल ने बताया कि चावल की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले पीपी बैग्स (PP Bags) महंगे हो गए हैं। प्लास्टिक दाने (PP दाना) की कीमत में अचानक 50 रुपये प्रति किलो की बड़ी वृद्धि हुई है। इससे पैकिंग लागत में प्रति टन 500 से 750 रुपये तक का इजाफा हुआ है। बाजार में अब कच्चे माल की भारी किल्लत और शॉर्टेज भी देखी जा रही है। अगर निर्यातक अफ्रीका जैसे अन्य बाजारों में माल भेजना चाहें, तो भी पैकिंग महंगी पड़ रही है। लागत बढ़ने से वैश्विक बाजार में भारतीय चावल की पकड़ कमजोर हो रही है।
बासमती बाजार का 80 प्रतिशत हिस्सा अब अधर में
आंकड़ों के लिहाज से भारत का बासमती निर्यात सालाना 4.5 से 5 बिलियन डॉलर के बीच रहता है। इस कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल मिडिल ईस्ट के देशों में जाता है। सऊदी अरब, यूएई, इराक और कुवैत जैसे देशों में भारतीय बासमती की भारी मांग रहती है। वर्तमान में इन सभी देशों के साथ व्यापारिक संपर्क युद्ध की वजह से पूरी तरह प्रभावित है। अजय भलोटिया के अनुसार, जहाजों पर मिसाइल हमले के डर से इंश्योरेंस कंपनियां भी हाथ पीछे खींच रही हैं। कोई भी निर्यातक इस समय नए ऑर्डर लेने या जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाई जा रही है। सभी को उम्मीद है कि यदि युद्ध एक-दो दिन में रुकता है, तो नुकसान की भरपाई संभव है।

