
बिना गैस कैसे मने जश्न? शादियों के मैन्यू में हो रहा बड़ा बदलाव
युद्ध के चलते पेट्रोलियम संकट गहराया। कमर्शियल गैस पर रोक से बैंक्वेट हॉल्स में लाइव काउंटर बंद। 900 का इंडक्शन 4000 में बिका, केरोसिन स्टोव की भी बढ़ी भारी मांग।
Israel/US Vs Iran : इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर अब भारतीय रसोई और व्यापार पर दिखने लगा है। पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई प्रभावित होने से देश में एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए सरकार ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पर रोक लगा दी है। इस फैसले से देशभर में पैनिक का माहौल बन गया है। खासतौर पर खाने-पीने के व्यवसाय और शादियों का सीजन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई व्यावसायिक गतिविधियां पूरी तरह से ठप होने की कगार पर पहुँच गई हैं।
पैनिक इतना गहरा है कि घरेलू गैस की किल्लत न हो, इसके लिए सरकार ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पर कड़ा पहरा लगा दिया है। यह सिर्फ एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि उन हजारों व्यवसायों के लिए एक बड़ा झटका है, जिनका चूल्हा 'कमर्शियल गैस' के नीले धुएं से जलता था।
सबसे ज्यादा मार उन बैंक्वेट हॉल्स और केटरर्स पर पड़ी है, जिनके पास पहले से ही शादियों की लंबी बुकिंग्स हैं। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई क्या रुकी, कालाबाजारी के जिन्न ने सिर उठा लिया है। जो सिलेंडर कल तक आसानी से उपलब्ध थे, वे अब या तो बाजार से गायब हैं या फिर उनकी कीमतें किसी लग्जरी आइटम की तरह वसूली जा रही हैं। इस अघोषित पाबंदी ने व्यावसायिक गतिविधियों की रफ्तार थाम दी है। खाने-पीने के शौकीन देश में अब 'लाइव काउंटर' सूने पड़ रहे हैं।
सबसे ज्यादा मार उन बैंक्वेट हॉल्स और केटरर्स पर पड़ी है, जिनके पास पहले से ही शादियों की लंबी बुकिंग्स हैं। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई क्या रुकी, कालाबाजारी के जिन्न ने सिर उठा लिया है। जो सिलेंडर कल तक आसानी से उपलब्ध थे, वे अब या तो बाजार से गायब हैं या फिर उनकी कीमतें किसी लग्जरी आइटम की तरह वसूली जा रही हैं। इस अघोषित पाबंदी ने व्यावसायिक गतिविधियों की रफ्तार थाम दी है। खाने-पीने के शौकीन देश में अब 'लाइव काउंटर' सूने पड़ रहे हैं।
सुलगते सवाल और ठंडे स्नैक्स
कम्युनिटी वेलफेयर बैंक्वेट एसोसिएशन के महासचिव कपिल नागपाल के शब्दों में वह दर्द झलकता है, जो आज हर बैंक्वेट संचालक महसूस कर रहा है। कपिल बताते हैं, "ज्यादातर हॉल्स की रसोई पीएनजी से चलती है, लेकिन 'लाइव स्टॉल' की आत्मा तो कमर्शियल सिलेंडर में ही बसती है। चाट, स्नैक्स, तंदूरी रोटियां और गरमा-गरम सब्जियां... इनके बिना कोई भी भारतीय शादी अधूरी है। सिलेंडर नहीं मिल रहे, जिससे इन स्टॉल्स को चलाने में पसीने छूट रहे हैं। नतीजतन, हर रात पार्टियों में आयोजकों और हमारे बीच तीखी बहस हो रही है।"
पुरानी बुकिंग और नई मुसीबत
शादियों की बुकिंग 6 से 8 महीने पहले की गई थी, जब न तो युद्ध की आहट थी और न ही गैस का यह संकट। एसके सेरेमनी बैंक्वेट्स और मैनिस ग्रीन लीफ रेस्टोरेंट चैन के जीएम पंकज ठाकुर कहते हैं, "सिलेंडर मिल भी रहे हैं तो उनकी कीमत चुकाना हमारे बस से बाहर हो रहा है। हम यह बढ़ा हुआ बोझ ग्राहकों पर डाल नहीं सकते क्योंकि एग्रीमेंट पुराने हैं। हमने विकल्प के तौर पर महंगे इंडक्शन चूल्हे खरीदे हैं, जिससे भारी आर्थिक चपत लगी है। हम मिन्नतें कर रहे हैं कि लोग मेनू में 'कोल्ड डिशेज' शामिल कर लें, लेकिन साख और पैसे का सवाल है, कोई समझने को तैयार नहीं।"
कप्तानों की शामत
बैंक्वेट हॉल में व्यवस्था संभालने वाले आनंद की आपबीती उस तनाव को बयां करती है जो फील्ड स्टाफ झेल रहा है। वे कहते हैं, "हमें रोज खरी-खोटी सुननी पड़ती है। हम कहते हैं सिलेंडर नहीं है, पर ग्राहक का जवाब होता है—हमने पैसे दिए हैं, हमें मतलब नहीं। कस्टमर के गुस्से को झेलना अब नामुमकिन होता जा रहा है।"
अतीत की ओर वापसी: जब 800 का इंडक्शन बना 4000 का सपना
युद्ध ने सिर्फ गैस ही नहीं छिनी, बल्कि लोगों के भीतर एक ऐसा डर पैदा कर दिया है कि वे आधुनिकता छोड़कर अतीत की ओर भाग रहे हैं। एलपीजी को लेकर देश में जो उहापोह की स्थिति बनी, उसने बाजार को लूट का अड्डा बना दिया है। सदर बाजार में चूल्हा व्यवसायी राम्निश गर्ग बताते हैं कि पिछले एक हफ्ते में इंडक्शन चूल्हों की मांग में ऐसा उबाल आया कि 800-900 रुपये का चूल्हा 4000 रुपये के पार पहुंच गया। बाजार से अच्छी क्वालिटी का माल साफ हो चुका है, अब बस 'चालू' माल ही भारी कीमतों पर मिल रहा है।
केरोसिन स्टोव की 'घर वापसी'
डर इतना बड़ा है कि जो लोग महंगा इंडक्शन नहीं खरीद सकते, वे पुराने जमाने के केरोसिन (मिट्टी का तेल) वाले चूल्हे और स्टोव बटोर रहे हैं। 15 मार्च को रविवार की छुट्टी के दिन भी लोगों ने राम्निश की दुकान के बोर्ड से नंबर निकालकर उन्हें घर से बुला लिया। वे कहते हैं, "मैंने उस दिन 700 केरोसिन वाले चूल्हे बेचे। इतना ही नहीं, जो डीजल वाले चूल्हे 5 हजार के थे, वे आज 30 से 40 हजार रुपये की बोली पर बिक रहे हैं।"
पैकेजिंग इंडस्ट्री पर भी गिरी बिजली: सेलो टेप की कीमतों में आग
इस युद्ध की काली छाया पेट्रोलियम उत्पादों से बनने वाली हर वस्तु पर पड़ रही है। फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश यादव बताते हैं कि पेट्रोलियम सप्लाई में बाधा का असर सेलो टेप और पैकेजिंग टेप पर भी पड़ा है। जो टेप का कार्टून 2 हजार रुपये का था, वह रातों-रात 3 हजार का हो गया। राकेश यादव का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग की लागत के नाम पर बाजार में गलत फायदा उठाया जा रहा है। असल में सप्लाई की उतनी कमी नहीं है, जितना मुनाफाखोरी का माहौल बनाया जा रहा है।
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