
एआई द्वारा बनायी गयी तस्वीर
युद्ध की मार: उद्योगों पर लटकती तलवार और कामगारों में घर वापसी का डर
LPG की सप्लाई ढीली होने और कच्चे माल के दाम बढ़ने से उद्योगों की कमर टूटी। कमर्शियल PNG सप्लाई पर 80% की बंदिश और बढ़ती महंगाई से अब कामगारों में घर वापसी का डर।
Gas Crisis And It's Impact : कहने को युद्ध हजारों मील दूर मिडिल ईस्ट की सरहदों पर लड़ा जा रहा है, लेकिन इसकी तपिश दिल्ली के सदर बाजार की गलियों और बवाना के कारखानों में साफ महसूस की जा सकती है। युद्ध जितना लंबा खिंच रहा है, अनिश्चितता का धुआं उतना ही गहरा होता जा रहा है। यह सिर्फ तेल की कीमतों का खेल नहीं है, यह एक मजदूर की थाली, एक छोटे व्यापारी की साख और एक मध्यमवर्गीय परिवार के बजट पर सीधा हमला है।
प्लास्टिक और एल्युमीनियम: कच्चा माल हुआ 'पहुंच से बाहर'
आज सदर बाजार में सन्नाटा पसरने लगा है। प्लास्टिक का सामान बेचने वाले राजीव साहनी का दर्द जायज है। प्लास्टिक, जो सीधे तौर पर पेट्रोलियम पदार्थों (कच्चे तेल) से बनता है, उसके दाम रातों-रात 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। वजह है 'प्लास्टिक दाने' की भारी किल्लत और बढ़ते दाम।
व्यापारी परेशान हैं क्योंकि ग्राहक पुरानी कीमतों पर अड़ा है और सप्लायर नया माल देने को तैयार नहीं। यही हाल एल्युमीनियम उद्योग का है। भले ही एल्युमीनियम का युद्ध से सीधा वास्ता न हो, लेकिन इसे गलाने (Casting) के लिए इस्तेमाल होने वाली LPG की सप्लाई क्या रुकी, पूरी चेन ही प्रभावित हो गई है। बवाना के उद्यमी शोकिंदर गोयल बताते हैं कि पहले जिस एल्युमीनियम की ढलाई 2 रुपये प्रति किलो होती थी, आज अगर कोइ जुगाड़ से गैस सिलेंडर लेकर धलाई करता है तो उसे 10 रुपये प्रति किलो में करवाना पड़ रहा है। लागत पांच गुना बढ़ गई है, जिससे काम या तो रुक गया है या घाटे में चल रहा है।
बवाना इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्री चलाने वाले राजीव गोयल का कहना है कि मजदूरों को रोकना अपने में एक चुनौती बन गयी है। उन्हें गैस सिलिंडर मिल नहीं पा रहा है, इसलिए वो बेचैन है। परिवार के साथ रह रहे मजदुर सबसे ज्यादा परेशान हैं। कई फक्ट्री ऐसी हैं, जहाँ फिलहाल काम रुका हुआ है। इसलिए मजदूरों के मन में और भी ज्यादा डर बैठा हुआ है।
कामगारों का पलायन: " यहाँ गैस नहीं, गांव में लकड़ी तो मिलेगी"
इस पूरे संकट का सबसे मानवीय और डराने वाला पहलू है मजदूरों का डर। छोटे-मोटे ढाबों पर खाना खाने वाले कामगारों के लिए अब दो वक्त की रोटी भी लग्जरी हो गई है। सिलेंडर की कमी से ढाबों ने खाने और चाय के दाम बढ़ा दिए हैं।
राजीव साहनी ने ये भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के संसद में दिए गए 'कोरोना जैसे हालात' वाले बयान ने इस डर को और ज्यादा बढ़ा दिया है। मजदूरों को लग रहा है कि फिर से तालाबंदी न हो जाए। उनके मन में एक ही बात है "हमें शहर में गैस नहीं मिल रही, खाना महंगा है, इससे अच्छा गांव लौट जाएं, वहां कम से कम लकड़ी जलाकर चूल्हा तो जल जाएगा।"
व्यापारियों की जंग: मशीनें बचाएं या मजदूर?
व्यापारी वर्ग आज दोतरफा युद्ध लड़ रहा है। FESTA के अध्यक्ष राकेश यादव के मुताबिक, वे अपने कामगारों को रोकने के लिए अपनी जेब से इंडक्शन चूल्हे, केरोसिन स्टोव और जैसे-तैसे सिलेंडर की व्यवस्था कर रहे हैं। संगठन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर 'अटल कैंटीन' की मांग की है ताकि मजदूरों को 5 रुपये में भोजन मिल सके और वे शहर छोड़कर न जाएं। अगर लेबर चली गई, तो युद्ध थमने के बाद भी बाजार नहीं संभल पाएंगे।
PNG का '80% नियम' और भ्रम का माहौल
इंडस्ट्रियल इलाकों में एक नया संकट IGL के नोटिस से आया है। नोटिस कहता है कि फैक्ट्रियां अपनी औसत खपत का केवल 80 प्रतिशत ही इस्तेमाल करें। लेकिन समस्या यह है कि नोटिस अधूरा है। अगर खपत 80% से ज्यादा हुई तो क्या होगा? भारी जुर्माना लगेगा या कनेक्शन काट दिया जाएगा? इस 'भ्रम' की वजह से आधी फैक्ट्रियां डर के मारे बंद पड़ी हैं।
बूटेन गैस और अनिश्चितता का बाजार
राजीव साहनी का कहना है कि मिडिल ईस्ट के तनाव ने छोटे सिलेंडरों (बूटेन गैस) के दाम भी 45 रुपये से बढ़ाकर 90 रुपये कर दिए हैं। दुकानदार माल दबाकर बैठे हैं और सप्लाई कब बंद हो जाए, किसी को नहीं पता।
यह युद्ध केवल मिसाइलों और टैंकों का नहीं रह गया है। यह दिल्ली के उस कारीगर का भी है जिसका चूल्हा बुझने की कगार पर है, और उस छोटे उद्यमी का भी है जिसकी उम्र भर की जमा पूंजी इस महंगाई और अनिश्चितता की भेंट चढ़ रही है। सरकार को जल्द ही दखल देना होगा, वरना मिडिल ईस्ट की आग हमारे मध्यम और लघु उद्योगों (MSMEs) को भस्म कर देगी।
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