
मिडिल ईस्ट की जंग: अब थाली से चिप तक मचेगा हाहाकार, खाद और हीलियम संकट
ईरान युद्ध से दुनिया की सप्लाई-चेन ध्वस्त, यूरिया की कीमतों में 60% का उछाल और हीलियम संकट से टेक इंडस्ट्री पर मंडराया काला साया; जानें कैसे प्रभावित होगा आपका जीवन।
Israel/USA - Iran War's Negative Impact : मिडिल ईस्ट में भड़की जंग अब केवल मिसाइलों और मोर्चों तक सीमित नहीं रह गई है। इस युद्ध की लपटें रसोई गैस, पेट्रोल पंपों से आगे निकलकर अब सीधे हमारे खेतों और हाई-टेक फैक्ट्रियों तक पहुँच चुकी हैं। ईरान और पड़ोसी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक सप्लाई-चेन को बुरी तरह झकझोर दिया है। दुनिया भर में तेल की कीमतों को लेकर मचे हाहाकार के बीच एक नया और गंभीर संकट पैदा हो गया है। इस बार निशाना ऊर्जा के साथ-साथ हमारी थाली और तकनीक भी है। युद्ध के कारण फर्टिलाइजर यानी खाद की भारी किल्लत शुरू हो गई है। इसके साथ ही टेक इंडस्ट्री के लिए ऑक्सीजन समान 'हीलियम गैस' का भंडार भी खतरे में है। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
सप्लाई-चेन के इस भीषण संकट ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। युद्ध की वजह से रबी और खरीफ की फसलों की तैयारी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ सेमीकंडक्टर चिप के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली हीलियम की कमी से इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स महंगे हो सकते हैं। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक, होर्मुज स्ट्रैट, अब एक "चोक-पॉइंट" बन गया है। यहाँ से गुजरने वाला हर टैंकर अब अनिश्चितता के साये में है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाला है। चलिए विस्तार से समझते हैं कि यह युद्ध कैसे हमारे जीवन के हर पहलू को बदल रहा है।
होर्मुज स्ट्रैट: सप्लाई-चेन का वो 'गला' जहाँ फंसी है दुनिया
इस पूरे संकट का केंद्र होर्मुज स्ट्रैट है, जो वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध के कारण इस रास्ते से होने वाला व्यापार पूरी तरह बाधित हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार, तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। लेकिन बात सिर्फ तेल की नहीं है; इसी रास्ते से दुनिया की 46% यूरिया सप्लाई और भारी मात्रा में हीलियम गैस गुजरती है। जब यह रास्ता रुकता है, तो पूरी दुनिया की ऊर्जा और औद्योगिक रफ्तार थम जाती है।
खेती पर संकट: $700 के पार पहुँचा यूरिया
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली खाद 'यूरिया' की कीमतें आसमान छू रही हैं। खाड़ी देशों से होने वाला यूरिया एक्सपोर्ट 40% से 60% तक महंगा हो गया है। पिछले साल की तुलना में कीमतें $500 से बढ़कर $700 प्रति मीट्रिक टन के पार निकल गई हैं।
इस संकट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
ऊर्जा पर निर्भरता: खाद बनाने में नेचुरल गैस का 70% योगदान होता है, जिसकी सप्लाई युद्ध के कारण बाधित है।
प्लांट्स पर ताले: कतर के बड़े यूरिया प्लांट्स में उत्पादन ठप होने से भारत और बांग्लादेश जैसे देशों में खाद कारखाने बंद करने पड़े हैं।
बुवाई में देरी: नार्दर्न हेमिस्फीयर में बुवाई का समय है, और खाद न मिलने से फसल की पैदावार गिर सकती है।
टेक इंडस्ट्री का 'साइलेंट किलर': हीलियम संकट
जंग का एक और डरावना पहलू हीलियम गैस की कमी है। सीएनबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कतर दुनिया की एक-तिहाई हीलियम सप्लाई करता है। लेकिन रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी पर हमलों के बाद हीलियम का उत्पादन रुक गया है। हीलियम का उपयोग सेमीकंडक्टर चिप बनाने की 'फोटोलिथोग्राफी' प्रक्रिया और कूलिंग में होता है।
साउथ कोरिया और ताइवान जैसे देश अपनी 50% से अधिक हीलियम जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। हीलियम की स्पॉट कीमतें 70% से 100% तक बढ़ गई हैं। अगर यह स्थिति जारी रही, तो स्मार्टफोन, लैपटॉप और कारों में लगने वाली चिप की कमी हो जाएगी। इससे भविष्य में टेक उत्पादों की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं।
भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत अपनी जरूरत का 40% यूरिया और फॉस्फेटिक खाद मिडिल ईस्ट से मंगाता है। इसी तरह ब्राजील भी पूरी तरह आयात पर निर्भर है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो खाद्य महंगाई (Food Inflation) को रोकना मुश्किल होगा। एक तरफ महंगी खाद से अनाज महंगा होगा, वहीं हीलियम संकट से डिजिटल इंडिया की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। यह युद्ध अब "थाली से चिप तक" एक ऐसा घाव दे रहा है, जिसकी भरपाई में सालों लग सकते हैं।
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