नई श्रम संहिता और ड्राफ्ट नियम: कामगारों के अधिकार पर संकट, अर्थव्यवस्था को भी नुकसान
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नई श्रम संहिता और ड्राफ्ट नियम: कामगारों के अधिकार पर संकट, अर्थव्यवस्था को भी नुकसान

ड्राफ्ट नियम और नई श्रम संहिता कामगारों की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा को टालते हुए नियोक्ताओं को अधिक लाभ और नियंत्रण देती हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इससे कामगार असुरक्षित होंगे और लंबे समय में अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।


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30 दिसंबर को जारी चार नए श्रम संहिता (Labour Codes) के ड्राफ्ट नियमों ने कामगारों के अधिकारों को और कमजोर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये संहिता और ड्राफ्ट नियम न केवल न्यूनतम वेतन के दायरे को नहीं बढ़ाते, बल्कि बड़ी संख्या में कामगारों की कानूनी सुरक्षा भी हटा देते हैं, स्थायी नौकरियों की जगह संविदा कर्मचारियों (contractual workers) को बढ़ावा देते हैं और सामाजिक सुरक्षा को केवल दिखावटी तौर पर फैलाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये नियम और संहिता कामगारों की स्थिति और असुरक्षित बनाएंगे, जबकि नियोक्ताओं को अधिक शोषण करने और अपने मुनाफे को बढ़ाने का अवसर देंगे। लंबे समय में इससे आर्थिक नुकसान भी होने की आशंका है।

श्रम संहिता: कामगारों के लिए क्यों खतरनाक?

चार नई श्रम संहिता—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्य परिस्थितियां (OSHWC) संहिता कामगार विरोधी और नियोक्ता समर्थक माहौल बनाने की नींव रखती हैं।

वेतन संहिता 2019: न्यूनतम वेतन, बोनस और समान पारिश्रमिक कानूनों को एकीकृत करती है। लेकिन इसमें 90% कामगार, जो सामाजिक सुरक्षा से बाहर हैं, उन्हें शामिल नहीं किया गया।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020: ट्रेड यूनियनों, स्टैंडिंग ऑर्डर और विवाद समाधान को नियंत्रित करती है, जबकि हड़ताल, छंटनी और पुनर्नियुक्ति के नियमों को कमजोर करती है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020: संगठित, असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा को दिखावटी तौर पर बढ़ाती है, लेकिन असल लाभ सीमित हैं।

OSHWC संहिता 2020: स्वास्थ्य, सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों के नियमों को सभी सेक्टरों में समान करती है।

स्थायी नौकरियों का खात्मा

औद्योगिक संबंध संहिता स्थायी नौकरियों को खत्म करने का रास्ता खोलती है और मनमाने तरीके से छंटनी और सुरक्षा नियमों को कमजोर करती है। इसमें फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों (FTEs) की नई श्रेणी बनाई गई है, जिनकी अवधि तय नहीं है और उन्हें स्थायी बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। इससे नियोक्ता स्थायी कर्मचारियों की जगह FTEs को रखकर “मुख्य” काम भी करवाने लगेंगे।

संविदा कर्मचारियों का दुरुपयोग

OSHWC संहिता संविदा कर्मचारियों को मुख्य गतिविधियों में काम करने से रोकती है, लेकिन इसमें छूट भी दी गई है। यदि काम का भार अचानक बढ़ता है या केंद्र किसी गतिविधि को गैर-मुख्य घोषित करता है तो संविदा कामगारों का उपयोग संभव है। औद्योगिक संबंध संहिता 100 से अधिक कर्मचारियों वाली इकाइयों के लिए सरकारी अनुमोदन की सीमा बढ़ाकर 300 कर देती है। इससे 101–299 कर्मचारियों वाले फैक्ट्रियों में कामगारों की सुरक्षा समाप्त हो जाती है।

सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन

सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन दिखावटी हैं। असंगठित कामगारों के लिए पंजीकरण और लाभ प्राप्ति की प्रक्रियाएं जटिल और समय लेने वाली हैं। उदाहरण के लिए ई-श्रम पोर्टल ने पांच साल बाद भी लाभ सुनिश्चित नहीं किए हैं। संविदा कर्मचारियों को एक वर्ष के लगातार सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी मिलती है, लेकिन यह केवल तभी लागू होगा जब उनका अनुबंध एक वर्ष से अधिक का हो।

काम के घंटे और ओवरटाइम

ड्राफ्ट नियम 8 घंटे के कार्य दिवस को खत्म करते हैं और ओवरटाइम केवल “आराम दिवस” पर लागू होगा। कार्य का विस्तारित समय (spread over) हटाया गया है, जिससे कई राज्य पहले की तरह 10–12 घंटे कार्य करवा सकते हैं। साप्ताहिक कार्य समय 48 घंटे तय किया गया है, लेकिन इसे भी दो अलग-अलग शिफ्ट के कर्मचारियों के माध्यम से तोड़ा जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अध्ययन बताते हैं कि लंबी कार्य अवधि और कम वेतन का सीधा संबंध है। कम सुरक्षा और लाभ के कारण कामगार लंबे घंटे काम करने के लिए मजबूर होते हैं। इससे नवाचार और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अचानक दबाव क्यों?

केंद्र ने चार श्रम संहिता 2019 और 2020 में पारित की थीं, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया था। नवंबर 2025 में अचानक इन्हें लागू करने का कारण बिहार में मिली राजनीतिक सफलता माना जा रहा है। आर्थिक चिंताएं—उपभोक्ता खर्च में गिरावट, औद्योगिक उत्पादन, टैक्स संग्रह और निवेश में कमी भी इसे पीछे से प्रोत्साहित कर रही हैं। विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय व्यवसायों को श्रम कानूनों की “कठोरता” कभी बड़ी समस्या नहीं रही। नीतिगत रिपोर्ट्स और सर्वेक्षण बताते हैं कि प्रशासनिक अनुमोदन और साफ़-सुथरी प्रक्रियाएँ ही वास्तविक बाधा हैं, न कि श्रम कानून।

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