
नीति आयोग का चौंकाने वाला दावा! 7 साल में किसानों की आय दोगुनी
रमेश चंद का दावा कि FY16-FY23 में किसानों की आय दोगुनी हुई, कई विशेषज्ञों और आंकड़ों के आधार पर भ्रामक और विवादित साबित हुआ है। इस पूरे विवाद से यह साफ होता है कि किसानों की वास्तविक आय वृद्धि और सरकारी आंकड़ों में अंतर अब भी बड़ी चुनौती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि नीति आयोग ने FY16 से FY23 तक किसानों की आय को दोगुना होने का दावा किया है, जबकि केंद्र सरकार ने इसे कभी आधिकारिक तौर पर दावा नहीं किया। यह दावा 10 अक्टूबर 2025 को आयोग के सदस्य रमेश चंद ने देहरादून में भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थानों (IASSI) की वार्षिक कॉन्फ्रेंस में अपने अध्यक्षीय संबोधन में किया। चंद आयोग के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और उन्हें केंद्रीय राज्य मंत्री के समकक्ष दर्जा प्राप्त है। यह दावा तब सामने आया, जब जनवरी 2026 में एक बिजनेस डेली ने IASSI की त्रैमासिक जर्नल की रिपोर्ट प्रकाशित की, जो आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं है।
7 वर्षों में 108% वृद्धि का दावा
IASSI में प्रस्तुत पेपर “Agriculture in Meeting Aspirations of Rising India” में चंद ने कहा कि किसानों की आय FY16-FY23 में 108% बढ़ी। उन्होंने कहा कि फसल और पशुपालन क्षेत्रों से किसानों की आय में 107% की वृद्धि हुई। यानी कि मछलीपालन और वनीकरण जैसी सहायक गतिविधियों को छोड़कर भी कृषि से किसानों की आय में समान वृद्धि हुई। चंद ने आगे कहा कि पिछले 10 वर्षों में (FY15-FY24) किसानों की आय में 126% की वृद्धि हुई, जो मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। खास बात यह है कि चंद ने इस आंकड़े के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के GDP डेटा का इस्तेमाल किया, जो अब तक किसी अर्थशास्त्री द्वारा उपयोग नहीं किया गया।
विशेषज्ञों ने दावे को नकारा
कई विशेषज्ञों और आधिकारिक रिपोर्टों ने चंद के दावे को गलत या भ्रामक बताया है। पूर्व CACP अध्यक्ष और ICRIER के फेलो अशोक गुलाटी ने जनवरी 2026 में लिखा कि FY16-FY23 के लिए स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, किसानों की आय में वृद्धि 50% से कम थी। कृषि मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में “किसानों की आय दोगुनी करने” पर कोई दावा नहीं किया। इसके बजाय 28 केंद्र सरकार की योजनाओं का हवाला देते हुए कहा कि कृषि एक राज्य विषय है। ICAR की 2022 रिपोर्ट में 75,000 किसानों के दोगुनी आय का दावा किया गया था, लेकिन अप्रैल और मई 2024 में की गई जांच में कई किसानों के नाम गलत पाए गए या उनके पास कृषि भूमि नहीं थी। PM-AASHA योजना पर खर्च केवल चुनावी सालों (2019 और 2024) में हुआ; बाकी समय में सरकार ने एक भी पैसा खर्च नहीं किया। NSSO के SAS 2018-19 आंकड़े बताते हैं कि कुल आय में से केवल 37% आय फसल उत्पादन से थी, बाकी 63% “मजदूरी, गैर-खेती व्यवसाय, जमीन पट्टे और पशुपालन” से।
चंद के आंकड़े भ्रामक
चंद ने किसानों की आय का अनुमान GDP डेटा के OS/MI (Operating Surplus / Mixed Income) डेटा से लगाया, जो किसी भी अर्थशास्त्री द्वारा प्रयोग नहीं किया जाता। TISS के कृषि अर्थशास्त्री आर रामकुमार ने कहा कि यह उनका अपना तरीका है। अर्थशास्त्री आमतौर पर सर्वेक्षण आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सरदारा सिंह जोहल ने कहा कि यह दावा “विश्वसनीय नहीं” है। चंद ने यह नहीं बताया कि 108% वृद्धि का आंकड़ा कैसे निकाला गया। उन्होंने निगमित और सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा अलग न करने का बहाना यह दिया कि यह “कृषि आय का छोटा हिस्सा है।” CAGR के आधार पर भी FY16-FY23 की सात वित्तीय वर्षों में 108% वृद्धि का आंकड़ा सही नहीं आता।
GDP डेटा पर शक
अरविंद सुब्रमणियन ने 2019 में दावा किया कि FY12-FY17 तक GDP वृद्धि 2.5-3.7 प्रतिशत अधिक दिखाई गई। IMF ने नवंबर 2025 में NSA (जिसमें GDP डेटा शामिल है) की गुणवत्ता और गणना पद्धति पर ‘C’ ग्रेड दिया। कृषि GVA डेटा पर भी अतिशयोक्ति के आरोप लगे हैं। इसके अलावा सितंबर 2023 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और खाद्य सचिव संजय चोपड़ा ने भी कृषि उत्पादन और वास्तविक आंकड़ों में अंतर की चिंता जताई।

