
रुपये की गिरावट पर RBI का ‘डबल अटैक’, बड़ा सवाल - कितने दिन रहेगी मजबूती?
आरबीआई ने रुपये में कमजोरी को थामने के लिए जो दो फैसले लिए उसके चलते रुपये अपने ऑलटाइम-लो से संभल गया. लेकिन बड़ा सवाल उठता है क्या ये कदम काफी सोबित होगा.
फॉरेक्स मार्केट (Forex Market) में इस हफ्ते बेहतर ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. एक तरफ डॉलर के मुकाबले रुपये का वैल्यू 95.23 रुपये के अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर जा लुढ़का. और इसी हफ्ते में आरबीआई के सख्त कदम के चलते डॉलर के मुकाबले रुपये में पिछले 12 सालों में सबसे बड़ी मजबूती भी देखने को मिली है. लगातार कमजोर हो रहे रुपये को सहारा देने के लिए आरबीआई (RBI) ने एक हफ्ते में दो बड़े फैसले लिए. आरबीआई के इस कदम का असर भी पड़ा और अपने ऐतिहासिक निचले लेवल से रुपये में मजबूती लौटी. लेकिन सवाल उठता है रुपये में आई ये मजबूती लंबे समय तक जारी रहेगी या फिर ये केवल एक दिन की तेजी साबित होगी?
आरबीआई ने NDF की सुविधा पर लगाई रोक
बात कर लेते हैं आरबीआई के उन दो फैसलों की जो सेंट्रल बैंक ने डॉलर के खिलाफ रुपये में जारी गिरावट को रोकने के लिए लिया है. नए वित्त वर्ष 2026-27 के शुरू होते ही आरबीआई ने रुपये को संभालने के लिए 1 अप्रैल को बड़ा फैसला लिया. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों को विदेशों में रुपये पर होने वाले सबसे बड़े सौदे नॉन-डिलिवरेबल डेरीवेटिव फॉरवर्ड (NDF) की सुविधा देने पर रोक दिया. आरबीआई के इस फैसले का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंगापुर और लंदन जैसे वैश्विक फाइनेंशियल हब को झटका लगा जहां ऐसे सौदों को अंजाम दिया जाता है. एक अनुमान के मुताबिक इन मार्केट्स में रोज़ाना करीब 149 अरब डॉलर का लेन-देन होता है. आरबीआई के इस कदम का असर 2 अप्रैल के फॉरेक्स मार्केट में देखने को मिला. एक ही दिन में रुपये में डॉलर के मुकाबले 2 फीसदी की मजबूती लौटी जो पिछले 12 साल में सबसे बड़ी उछाल साबित हुई. रुपया 95 के निचले स्तर से सुधरकर करीब 92.8 प्रति डॉलर तक पहुंच गया.
क्या होता है NDF?
सवाल उठता है क्या होता है NDF (Non-Deliverable Derivative Forward). NDF एक ऐसा सौदा (contract) है जिसमें असल में रुपये का लेन-देन नहीं होता, बल्कि रुपये और डॉलर में जो अंतर होता है वही ट्रेडर्स का प्रॉफिट और नुकसान होता है और उसी अंतर का भुगतान किया जाता है. इसके तहत कोई डॉलर या रुपये की असली खरीद-बिक्री नहीं होती है. उदाहरण के लिए मान लीजिए दो व्यक्ति के बीच आपस में ये तय होता है कि 6 महीने बाद डॉलर का रेट 85 रुपये होगा. लेकिन 6 महीने बाद डॉलर के मुकाबले रुपये का असली रेट 90 रुपये हो जाता है तो 5 रुपये का जो फर्क है उसी का भुगतान किया जाता है. यही NDF कहलाता है. जिन देशों में करेंसी पर नियंत्रण होता है और उसी करेंसी की ट्रेडिंग की जाती है. निवेशक सीधे भारत के बाजार में ट्रेड नहीं कर सकते ऐसे में वे विदेश में बैठकर NDF के जरिए रुपये पर दांव लगाया जाता है सट्टेबाजी की जाती है. बड़ी कंपनियां यानी कॉरपोरेट्स, विदेशी निवेशक या फिर बैंक इसमें ट्रेडिंग करते हैं. इस प्रकार के सौदे ज्यादातर ऑफशोर मार्केट जैसे सिंगापुर, दुबई, लंदन किया जाता है और इस ट्रेड का सेटलमेंट डॉलर में किया जाता है.
सट्टेबाजी रोकने के लिए RBI का बड़ा फैसला
RBI ने ऐसा क्यों किया? तो इस सवाल का जवाब है रुपये में जारी कमजोरी के चलते बढ़ता दबाव. विदेश में सट्टेबाज़ी (NDF) बढ़ गई थी और बाजार में रुपये में आसान मुनाफा बनाने का खेल चल रहा था. RBI ने साफ कर दिया है कि Forex मार्केट अब सट्टेबाज़ी के लिए नहीं, बल्कि असली बिज़नेस जरूरत (Hedging) के लिए इसका इस्तेमाल होगा.
बैंकों पर आरबीआई का नकेल
28 मार्च 2026 को आरबीआई ने सबसे बैंकों के लिए 'नेट ओपन पोजीशन' (NOP) की सीमा 100 मिलियन डॉलर तय कर दी. पहले बैंक अपनी पूंजी का 25 फीसदी तक डॉलर रख सकते थे, जिससे सट्टेबाजी की संभावना बढ़ती जा रही थी. नई सीमा तय होने के बाद बैंकों को डॉलर के बड़े स्टॉक को बेचने और रुपया खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस फैसले के चलते बैंकों को करीब 30 अरब डॉलर से ज्यादा के सौदों को जल्द से जल्द निपटाना पड़ा. आरबीआई के इस कदम का असर सोमवार 30 मार्च को करेंसी मार्केट में दिखा भी. रुपये में मजबूती लौटी लेकिन केवल चंद घंटों के लिए. और उसी दिन डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट आ गई और रुपया पहली बार 95 के लेवल को तोड़ते हुए 95.23 के लेवल पर जा लुढ़का था.
आरबीआई के फैसले के साइड इफेक्ट्स!
रुपये में कमजोरी को थामने के लिए आरबीआई के इन फैसलों के कुछ नकारात्मक पहलु भी है. जैसे बाजार में तरलता (liquidity) कम हो सकती है, विदेशी निवेशक सतर्क हो सकते हैं और बॉन्ड मार्केट में निवेश घट सकता है. इससे सरकार के लिए कर्ज लेना भी महंगा हो सकता है. दरअसल, आरबीआई दोराहे पर खड़ा है. अगर वह ब्याज दर बढ़ाता है, तो इसका असर आर्थिक विकास की रफ्तार पर पड़ेगा और अगर वो दखल नहीं देता है तो रुपये में तेज गिरावट आ सकती है. ऐसे में आरबीआई ने बाजार में सीधे दखल देकर सट्टेबाज़ी पर लगाम लगाने का फैसला किया है. आरबीआई के इस कदम के चलते रुपये में मजबूती जरूर आई है लेकिन लंबी अवधि में इसका फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव कितनी जल्द खत्म हो और कच्चे तेल की कीमतें में आए. ऐसा हुआ नहीं तो आरबीआई के ये सभी कदम बेकार साबित हो सकते हैं.
लेकिन अब नजर 6-8 अप्रैल तक चलने वाली आरबीआई मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक पर है. तीन दिनों तक MPC की बैठक में सभी पहुलओं पर चर्चा होगा और गवर्नर संजय मल्होत्रा का संबोधन भी होगा और वे मीडिया से भी मुखातिब होंगे.

