USA Iran War Oil Crisis And India : वैश्विक ऊर्जा बाजार में इस वक्त एक बड़ा और अनजाना संकट खड़ा हो गया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों के पहिए अचानक थम गए हैं। यह स्थिति किसी युद्ध के कारण नहीं बल्कि एक वित्तीय झटके की वजह से पैदा हुई है। ऊर्जा अर्थशास्त्री अनस अलहजी का कहना है कि दुनिया अब 'अनजान क्षेत्र' में प्रवेश कर चुकी है। बीमा कंपनियों ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों का 'वॉर रिस्क कवर' अचानक वापस ले लिया है। इस फैसले ने वैश्विक शिपिंग गतिविधियों को रातों-रात फ्रीज कर दिया है। कच्चे तेल से लेकर एलएनजी और उर्वरकों तक की आपूर्ति अब दांव पर लगी है। दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी संकरे समुद्री रास्ते से होती है। अब इस संकट के पीछे छिपे भू-राजनीतिक उद्देश्यों पर चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जानबूझकर पैदा की गई हो सकती है। आने वाले दिनों में तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
बीमा कंपनियों का बड़ा फैसला
विशेषज्ञों के अनुसार यह संकट ईरान के हमले से नहीं उपजा है। यह वित्तीय प्रणाली द्वारा लिया गया एक बड़ा फैसला है। वैश्विक बीमा कंपनियों ने जहाजों का बीमा कवर रद्द कर दिया है। इसके साथ ही प्रीमियम की दरों में भारी बढ़ोतरी की गई है। इसके चलते जहाज मालिकों ने इस रास्ते पर चलना बंद कर दिया है। विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि दुनिया ने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा। यह समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण धमनी है।
डोनाल्ड ट्रंप की रहस्यमयी चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बिल्कुल खामोश हैं। अक्सर तेल की ऊंची कीमतों पर ट्वीट करने वाले ट्रंप अब चुप हैं। अलहजी का कहना है कि ट्रंप की यह चुप्पी काफी चौंकाने वाली है। संदेह है कि इसके पीछे वाशिंगटन का कोई बड़ा गेम प्लान है। ट्रंप की यह चुप्पी ईरान के खिलाफ उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकती है। अमेरिका इस संकट का इस्तेमाल अपने आर्थिक लाभ के लिए कर सकता है।
अमेरिकी तेल को मिलेगा बड़ा फायदा
ट्रंप ने संकेत दिया है कि नौसेना टैंकरों को सुरक्षा दे सकती है। यह रणनीति 1980 के दशक के 'टैंकर युद्ध' की याद दिलाती है। यदि अमेरिकी नौसेना सुरक्षा देती है तो परिवहन लागत बढ़ जाएगी। इससे खाड़ी देशों से तेल निर्यात करना बहुत महंगा हो जाएगा। इसका सीधा फायदा अमेरिका के अपने तेल और एलएनजी को मिलेगा। वैश्विक बाजार में अमेरिकी तेल अब ज्यादा प्रतिस्पर्धी साबित होगा। इससे खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।
भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा असर
इस संकट की सबसे बड़ी मार भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाली है। भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का एक चौथाई हिस्सा यहाँ से मंगवाता है। भारतीय उर्वरक उद्योग पूरी तरह खाड़ी देशों की गैस पर निर्भर है। कतर से एलएनजी की आपूर्ति बाधित होने से संकट पैदा हुआ है। सरकार ने उर्वरक कंपनियों को गैस खपत कम करने को कहा है। यह संकट भारत में बुआई के मुख्य सीजन से ठीक पहले आया है।
अमेरिका से बढ़ेगा भारत का आयात यदि भारत में कृषि उत्पादन गिरता है तो समस्या और बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में भारत को अमेरिका से अनाज आयात करना पड़ेगा। यह वही परिणाम है जिसकी तलाश वाशिंगटन काफी समय से कर रहा था। अलहजी ने चेतावनी दी है कि यह संकट आर्थिक मंदी ला सकता है। बांग्लादेश जैसे देशों में पहले ही बिजली की भारी कटौती शुरू है। मिस्र और जॉर्डन को मिलने वाली गैस की सप्लाई भी बाधित हुई है।
100 डॉलर के पार जाएगा कच्चा तेल
ऊर्जा बाजार अब लंबे समय तक अस्थिरता झेलने के लिए तैयार है। सिटीग्रुप का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर तक रहेगा। वहीं वुड मैकेंजी ने कीमतें 100 डॉलर के पार जाने की बात कही। यदि सप्लाई एक महीने तक रुकी रही तो संकट गहरा जाएगा। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार तेल की कीमतों में जोखिम प्रीमियम बढ़ा है। आने वाले कुछ सप्ताह वैश्विक राजनीति के लिए बहुत ही नाजुक होंगे।