शहरी विकास में बदलाव या वही पुरानी कहानी, क्या है अर्बन चैलेंज फंड?
x

शहरी विकास में बदलाव या वही पुरानी कहानी, क्या है अर्बन चैलेंज फंड?

स्मार्ट सिटीज़ मिशन के बाद 4 लाख करोड़ का अर्बन चैलेंज फंड लॉन्च किया गया है। लेकिन वित्तीय कमी और पुरानी खामियों की पुनरावृत्ति पर सवाल बरकरार है।


स्मार्ट सिटीज़ मिशन (SCM) के निर्धारित समय से पाँच वर्ष अधिक, कुल 10 वर्ष पूरे होने के एक साल से भी कम समय बाद केंद्र सरकार ने एक और बड़े शहरी अवसंरचना कार्यक्रम को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में ‘अर्बन चैलेंज फंड’ (UCF) को स्वीकृति दी है, जिसकी कुल राशि 4 लाख करोड़ रुपये होगी। इसमें से 1 लाख करोड़ रुपये (25 प्रतिशत) केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय सहायता के रूप में दिए जाएंगे, जबकि शेष राशि राज्य सरकारों, शहरी स्थानीय निकायों और निजी भागीदारों से अगले पाँच वर्षों में जुटाई जाएगी। इसे शहरी विकास के दृष्टिकोण में “प्रतिमान बदलाव” बताया जा रहा है—जहाँ अनुदान आधारित वित्तपोषण से हटकर “बाजार-आधारित, सुधार-प्रेरित और परिणामोन्मुख अवसंरचना निर्माण” पर जोर दिया गया है। योजना के अनुसार कम-से-कम 50 प्रतिशत परियोजना लागत बाजार से जुटाई जाएगी।

अपर्याप्त वित्तीय प्रावधान

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत को अपने शहरी अवसंरचना के निर्माण और उन्नयन की सख्त आवश्यकता है। मजबूत अवसंरचना शहरी केंद्रों को न केवल रहने योग्य बनाती है बल्कि उन्हें आर्थिक विकास का इंजन भी बनाती है। हाल ही में जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने विश्व बैंक के हवाले से कहा कि भारत की शहरी आबादी 2011 के 31 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत (करीब 60 करोड़) तक पहुँच जाएगी और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 70 प्रतिशत योगदान देगी। तुलना में, चीन, अमेरिका और जर्मनी के शीर्ष 10 शहर 2023 में केवल 9 प्रतिशत आबादी और 28 प्रतिशत GDP का योगदान करते हैं।

सर्वेक्षण ने चेतावनी दी कि भारत के शहरी क्षेत्रों में “किसी भी प्रकार का अवसंरचनात्मक संकट” राष्ट्रीय विकास पर “असमानुपाती प्रभाव” डाल सकता है। जनवरी 2024 की विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2036 तक शहरी अवसंरचना के लिए 840 अरब डॉलर (लगभग 70 लाख करोड़ रुपये) की आवश्यकता होगी, जो प्रति वर्ष 4.6 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। इस दृष्टि से देखें तो अगले पाँच वर्षों के लिए 4 लाख करोड़ रुपये का UCF स्पष्ट रूप से अपर्याप्त प्रतीत होता है।

स्मार्ट सिटीज़ मिशन से क्या बदला?

केंद्रीय मंत्रिमंडल के बयान के अनुसार UCF की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

बाजार आधारित वित्त, निजी भागीदारी और नागरिक-केंद्रित सुधारों पर जोर।

लचीले, उत्पादक, समावेशी और जलवायु-संवेदनशील शहरों का निर्माण, जो आर्थिक विकास के अगले चरण के प्रमुख चालक बनें।

कम-से-कम 50 प्रतिशत वित्तपोषण बाजार स्रोतों—नगरपालिका बॉन्ड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP)—से जुटाना।

शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को “बैंकेबल एसेट क्लास” के रूप में स्थापित करना।

शहरी शासन, वित्तीय प्रणाली, परिचालन दक्षता और शहरी नियोजन में व्यापक सुधार।

4,223 शहरों की साख सुधारने के लिए 5,000 करोड़ रुपये का विशेष कोष।

“चैलेंज-आधारित ढाँचे” के तहत परियोजनाओं का चयन और सुधारों से जुड़ी फंडिंग।

सिद्धांततः सभी शहरों को शामिल करना।

पहली नज़र में यह दृष्टिकोण उचित लगता है, किंतु इसके अधिकांश तत्व स्मार्ट सिटीज़ मिशन से भिन्न नहीं हैं। अंतर केवल इतना है कि SCM 100 चयनित शहरों तक सीमित था।

पुरानी विफलताओं की पुनरावृत्ति?

2015-25 के स्मार्ट सिटीज़ मिशन का उद्देश्य 100 शहरों में जीवन-स्तर सुधारना था। 10 वर्षों में 1.6 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए, जिनमें केंद्र का योगदान 48,000 करोड़ रुपये था। परियोजनाएँ “नागरिक भागीदारी” के माध्यम से लागू की गईं।

फरवरी 2024 की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने इसके परिणामों को असंतोषजनक बताया। कारणों में योजना और क्षमता की कमी, ग्रीनफील्ड परियोजनाओं का अभाव, परियोजनाओं में बार-बार बदलाव, जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी तथा रखरखाव में ढिलाई शामिल थे। निजी भागीदारी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही—PPP के माध्यम से कुल लागत का केवल 6 प्रतिशत ही जुटाया जा सका।

जनवरी 2026 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में कर्नाटक के सात शहरों में लागू ICT समाधानों को अप्रभावी बताया गया। इनमें इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम, स्मार्ट वॉटर, स्मार्ट हेल्थ, स्मार्ट पार्किंग आदि शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार तकनीकी हस्तक्षेपों का उपयोग न्यूनतम रहा, क्योंकि आवश्यकताओं का सही आकलन नहीं किया गया था।

दशकों से अनसुलझी संस्थागत समस्याएँ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने शहरी विकास में प्रमुख संस्थागत समस्याओं—खंडित महानगरीय शासन और सीमित वित्तीय स्वायत्तता—की ओर इशारा किया। अक्टूबर 2025 की एक खोजी रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 10 वर्षों की फंडिंग के बावजूद SCM ने केवल सतही सुधार किए, दीर्घकालिक रणनीति का अभाव रहा।

इसी प्रकार, 2005-12 के जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (JNNURM), जिसका बजट 1 लाख करोड़ रुपये था, की समीक्षा रिपोर्टों (2012) ने भी खराब योजना, स्वामित्व की कमी, क्षमता अभाव और “एक ही ढाँचा सब पर लागू” दृष्टिकोण जैसी खामियाँ उजागर की थीं। इन कमियों से सबक लिए बिना SCM लागू किया गया।

क्या UCF अलग साबित होगा?

सबसे बड़ी चिंता यह है कि केंद्र या आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने SCM का गुणात्मक मूल्यांकन नहीं किया। जून 2025 की अंतिम रिपोर्ट में केवल मात्रात्मक आँकड़े प्रस्तुत किए गए—8,067 परियोजनाओं में से 7,555 पूर्ण, 512 प्रगति पर। लेकिन संसदीय समिति और अन्य विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए मुद्दों का उल्लेख नहीं किया गया।

SCM के दौरान कोई वार्षिक या मध्यावधि समीक्षा नहीं हुई, जिससे समय रहते सुधार संभव हो सकते थे। केवल अंतिम चरण में मात्रात्मक मूल्यांकन से वास्तविक प्रभाव का आकलन संभव नहीं है।

UCF की संरचना और उसके घटक बड़े पैमाने पर SCM की पुनरावृत्ति प्रतीत होते हैं। यदि पूर्व की गलतियों—कमजोर योजना, सीमित जवाबदेही, अपर्याप्त निजी निवेश, और संस्थागत सुधारों की अनदेखी—को दूर करने के ठोस उपाय नहीं किए गए, तो आशंका है कि UCF भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह अपेक्षित परिणाम देने में विफल रह सकता है।

स्पष्ट है कि भारत के शहरी भविष्य की सफलता केवल धन आवंटन पर नहीं, बल्कि प्रभावी शासन, पारदर्शिता, दीर्घकालिक दृष्टि और वास्तविक सुधारों पर निर्भर करेगी।

Read More
Next Story