भारत का ऑटो उद्योग ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित, जानें क्या हैं नए अवसर और चुनौतियां
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भारत का ऑटो उद्योग ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित, जानें क्या हैं नए अवसर और चुनौतियां

एक सकारात्मक बात यह है कि चीनी ऑटो पार्ट्स पर अमेरिका के उच्च टैरिफ से भारतीय निर्माताओं की ओर मांग बढ़ सकती है। क्योंकि खरीदार चीनी आयात के विकल्प तलाश रहे हैं।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'ट्रंप रेसिप्रोकल ट्रेड एक्ट' (TRTA) के तहत लागू किए गए नए टैरिफ़ भारत के ऑटो उद्योग को प्रभावित करने जा रहे हैं। यह 27% के पारस्परिक टैरिफ भारतीय ऑटो निर्माताओं के लिए एक चुनौती बन सकते हैं, खासकर टाटा मोटर्स और उसकी लग्जरी ब्रांड जैगुआर लैंड रोवर (JLR) के लिए। वहीं, कुछ ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं, जैसे भारत फोर्ज और मोथरसन ग्रुप को इस स्थिति से अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है। यह सब तब हो रहा है जब दुनिया भर की आपूर्ति श्रृंखलाएं पहले से ही बदलावों और संकटों का सामना कर रही हैं।

ऑटो पार्ट्स निर्माताओं को फायदा

भारत के ऑटो पार्ट्स अमेरिका को निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में से एक है। हालांकि, भारत के कुल अमेरिका निर्यात में ऑटो पार्ट्स का हिस्सा महज 1.8% है, फिर भी अमेरिका भारतीय ऑटो पार्ट्स का 28% हिस्सा खरीदता है। भारत के प्रमुख निर्माता जैसे भारत फोर्ज और मोथरसन ग्रुप पहले से ही अमेरिकी बाजार में अच्छी पैठ बना चुके हैं। भारत फोर्ज ने FY24 में कुल ₹4,928 करोड़ का निर्यात किया, जिसमें से 17.4% या ₹856 करोड़ की आय अमेरिका से आई। इसी तरह, मोथरसन ग्रुप ने FY24 में ₹98,879 करोड़ का राजस्व अर्जित किया, जिसमें से 18% हिस्सा अमेरिका से था। इस नए टैरिफ सिस्टम से इन कंपनियों को लाभ हो सकता है। क्योंकि अमेरिकी बाजार अब चीन से आयात कम करने की कोशिश कर रहा है और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहा है।

ऑटो उद्योग को लाभ

भारत के चेन्नई क्षेत्र को "दक्षिण का डेट्रॉइट" कहा जाता है और यह टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड, रॉयल एनफील्ड और टीवीएस मोटर जैसी प्रमुख कंपनियों का घर है। ट्रंप के टैरिफ़ के कारण, अगर अमेरिकी खरीदार चीन से अपनी निर्भरता कम करते हैं तो चेन्नई के इन ऑटो पार्ट्स निर्माताओं को फायदा हो सकता है।

पारंपरिक इंजन वाहनों को बढ़ावा

ट्रंप की नीतियां इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बजाय पारंपरिक इंजन वाहनों को बढ़ावा देने वाली हैं। इस दृष्टिकोण से चेन्नई की कंपनियां जैसे अशोक लीलैंड और रॉयल एनफील्ड, जो कंबशन इंजन वाहनों का निर्माण करती हैं, अधिक मांग देख सकती हैं। यह नीति भारतीय ऑटो निर्माताओं के लिए एक बूस्ट साबित हो सकती है, खासकर जब ट्रंप प्रशासन चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास कर रहा है।

भारतीय कार निर्माताओं को नुकसान

दूसरी तरफ, भारतीय कार निर्माता जैसे जैगुआर लैंड रोवर (JLR) और अन्य कंपनियां 25% टैरिफ़ से प्रभावित हो सकती हैं। JLR की उत्तरी अमेरिकी बिक्री FY25 की तीसरी तिमाही में 44% बढ़ी थी। लेकिन अब इन नए टैरिफ़ के कारण उसकी बिक्री पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जेएम फाइनेंशियल के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के आयातित वाहनों पर 25% टैरिफ़ का असर भारत के कार निर्माताओं पर साफ दिखाई दे सकता है। हालांकि, भारतीय कार निर्माता जिनका मुख्य उत्पादन अमेरिका में नहीं है, उन्हें उतना अधिक नुकसान नहीं होगा।

टैरिफ़ गणनाओं में असमानता

भारत और अमेरिका के बीच ऑटो व्यापार पहले से असंतुलित रहा है। 2024 में भारत ने अमेरिका को $2.8 बिलियन मूल्य के ऑटो पार्ट्स निर्यात किए। जबकि अमेरिका का निर्यात भारत को केवल $0.42 बिलियन था। इस असंतुलन के बावजूद, टैरिफ़ गणनाओं में एक बड़ा अंतर है। जेएम फाइनेंशियल के मुताबिक, अमेरिकी निर्यात पर भारत द्वारा लगाए गए 24.1% औसत टैरिफ़ और भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ़ केवल 1.1% है। यह अंतर टैरिफ़ युद्ध के एक प्रमुख कारण के रूप में उभरा है, जिसके कारण ट्रंप प्रशासन ने पारस्परिक टैरिफ़ की योजना बनाई।

भारत की रणनीति

भारत ने पहले से ही इस व्यापार संघर्ष का सामना करने के लिए कदम उठाए हैं। मार्च में नई दिल्ली ने बिलेट्रल ट्रेड एग्रीमेंट के लिए Terms of Reference (ToR) पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा भारत ने अमेरिका से आयातित कुछ प्रमुख उत्पादों, जैसे हाई-एंड मोटरसाइकिल्स, कृषि उत्पादों और बोरबोन व्हिस्की पर आयात शुल्क कम किया था। विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब तेज़ प्रतिक्रिया देने के बजाय सांस्कृतिक और कूटनीतिक उपायों को प्राथमिकता देगा।

इतिहास फिर से दोहराएगा?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका फिर से मंदी की ओर बढ़ सकता है, जैसा कि 1930 के स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट के दौरान हुआ था। उस समय व्यापार युद्ध ने वैश्विक व्यापार संकट को और गहरा कर दिया था। ऐसे में, ट्रंप के टैरिफ़ नीतियां भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।

भारत के लिए भविष्य की दिशा

हालांकि, भारत को चीन पर बढ़े हुए टैरिफ़ से लाभ हो सकता है। लेकिन अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता की कमी चिंता का कारण बन सकती है। अगर मैक्सिको और कनाडा जैसे देशों को यूएसएमसीए के तहत शुल्क-मुक्त व्यापार की सुविधा प्राप्त है तो भारत के लिए इस स्थिति का मुकाबला करना कठिन हो सकता है। भारत के लिए यह एक "वेट-एंड-वाच" स्थिति होगी। यह देखना होगा कि अगले कुछ महीनों में अमेरिकी टैरिफ़ नीतियों का असर कैसे होता है और भारत किस प्रकार अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बेहतर बनाने में सफल होता है।

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