डॉलर पर निर्भरता बनी चुनौती, रुपये की गिरावट ने उठाए बड़े सवाल
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डॉलर पर निर्भरता बनी चुनौती, रुपये की गिरावट ने उठाए बड़े सवाल

डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट अब आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। घरेलू सामान, यात्रा, शिक्षा और इलाज की लागत बढ़ने की आशंका है।


डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 91 के स्तर से नीचे फिसलने के बाद यह मुद्दा अब सिर्फ अर्थशास्त्रियों की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर होता रुपया अब रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे प्रभावित कर रहा है और इसे भारतीय परिवारों के लिए डाइनिंग टेबल या किचन टेबल की बातचीत का विषय बनना चाहिए।

द फेडरल से बातचीत में काउंसिल फॉर फेयर बिजनेस प्रैक्टिसेज के अध्यक्ष स्वप्निल कोठारी और निकोरे एसोसिएट्स की मुख्य अर्थशास्त्री व संस्थापक मिताली निकोरे ने चेताया कि रुपये की गिरावट का असर घरेलू उपकरणों, यात्रा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत पर पड़ रहा है।जमीनी स्तर पर असर, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है

अब तक रुपये की कमजोरी पर चर्चा मुख्य रूप से व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा जैसे मैक्रोइकोनॉमिक पहलुओं तक सीमित रही है। लेकिन स्वप्निल कोठारी का कहना है कि इससे आम उपभोक्ता पर पड़ने वाला असर अक्सर अनदेखा रह जाता है।

उनके मुताबिक, जहां आयातक और निर्यातक हेजिंग जैसे उपायों से जोखिम संभाल सकते हैं, वहीं आम परिवारों को बढ़ी हुई कीमतों का सीधा सामना करना पड़ता है। कंपनियां बढ़ी लागत खुद वहन नहीं करतीं, बल्कि उसे उत्पाद की कीमतों में जोड़ देती हैं। यह बढ़ोतरी भले ही प्रति उत्पाद मामूली लगे, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका असर महंगाई के रूप में दिखाई देता है।

MSME और मध्यम वर्ग पर बढ़ता दबाव

कोठारी ने चेताया कि माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) इस स्थिति में खास तौर पर कमजोर हैं, जबकि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में इनकी भूमिका अहम मानी जाती है। उन्होंने कहा कि जीएसटी को सरल बनाने जैसे कदम भी रुपये की गिरावट से पैदा हुई लागत को पूरी तरह संतुलित नहीं कर सकते।

उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं होंगी महंगी

रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा असर उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं पर पड़ सकता है। फ्रिज, टीवी, कार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी पुर्जे आयात किए जाते हैं। कोठारी के अनुसार, भले ही मर्सिडीज या बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ियां भारत में असेंबल होती हों, लेकिन अगर आयातित हिस्सों की कीमत बढ़ती है तो अंतिम उत्पाद भी महंगा हो जाता है। मध्यम वर्ग के लिए ये वस्तुएं अब विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी हैं। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी सीधे घरेलू बजट पर असर डालती है।

रोजमर्रा के खर्च और क्रय शक्ति

हालांकि टमाटर और प्याज जैसी घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुएं रुपये की गिरावट से कम प्रभावित होती हैं, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इससे ज्यादा संवेदनशील है। कोठारी के अनुसार, टीवी या अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान की कीमत में 1,000 रुपये की बढ़ोतरी भी आम उपभोक्ता के लिए बड़ा झटका हो सकती है।

उन्होंने कहा कि कमजोर रुपया जरूरी नहीं कि वेतन में बढ़ोतरी लाए। नतीजतन, लोगों की क्रय शक्ति घटती है, भले ही आर्थिक वृद्धि के आंकड़े मजबूत क्यों न दिखें। इसके अलावा, ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है और आयातित मेडिकल उपकरणों की कीमत बढ़ने से स्वास्थ्य खर्च और बीमा प्रीमियम पर भी असर पड़ता है।

डॉलर पर निर्भरता बड़ी चुनौती

मिताली निकोरे ने कहा कि रुपये की गिरावट को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है। उन्होंने इंडोनेशिया का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां भी स्थानीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। उनके अनुसार, समस्या सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि यह समझने की है कि मुद्रा अवमूल्यन किस तरह आर्थिक वृद्धि के फायदों को कमजोर कर देता है।

उन्होंने कहा कि भारत की डॉलर पर निर्भरता बहुत गहरी है और इसे कम करने में दशकों लग सकते हैं। इसके लिए आयात प्रतिस्थापन, विदेशी मुद्रा भंडार का विविधीकरण और बेहतर फॉरेक्स प्रबंधन जरूरी है।

RBI और सरकार की भूमिका

निकोरे के मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रुपये को कुछ हद तक कमजोर रहने दिया। लेकिन अब केंद्रीय बैंक को बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर करने पर विचार करना चाहिए। साथ ही, तेल और सोने के आयात के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं और विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की जरूरत है।

दोनों विशेषज्ञों ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि ‘मेक इन इंडिया’ और पीएलआई जैसी योजनाओं से मदद मिली है, लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं और एफएमसीजी सेक्टर में अब भी आयात पर भारी निर्भरता बनी हुई है।

आगे क्या?

कोठारी ने आगाह किया कि आने वाले समय में लोगों को विदेश यात्रा और विदेशी शिक्षा जैसे खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है। उन्होंने श्रिंकफ्लेशन की भी चेतावनी दी, जहां कंपनियां कीमतें बढ़ाने के बजाय उत्पाद की मात्रा कम कर देती हैं।

अंत में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या रुपये की यह गिरावट नीतिगत सुधारों को मजबूर करेगी, जैसे 1991 के आर्थिक संकट ने किया था, या फिर इसे तब तक टाल दिया जाएगा जब तक कोई बड़ा संकट सामने न आ जाए।

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