नीतीश कुमार का इस्तीफा आज: तेजस्वी का आरोप- खजाना खाली कर जा रहे सीएम
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नीतीश कुमार का इस्तीफा आज: तेजस्वी का आरोप- 'खजाना खाली' कर जा रहे सीएम

बिहार में नीतीश युग के अंत के साथ सियासी घमासान शुरू; 3.88 लाख करोड़ के कर्ज में डूबा राज्य, तेजस्वी बोले- एनडीए ने बिहार को बनाया सबसे गरीब।


Bihar New CM : बिहार की राजनीति में मंगलवार का दिन एक बड़े बदलाव का गवाह बनने जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। इसके साथ ही राज्य की सत्ता में लंबे समय से चला आ रहा 'नीतीश युग' समाप्त हो जाएगा। उनके इस्तीफे के बाद अब बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलेगा। इस बीच पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोला है। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार ने बिहार के सरकारी खजाने को पूरी तरह खाली कर दिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब बिहार की सरकार स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि 'दिल्ली' के इशारों पर चलेगी।


तेजस्वी का वार: 20 साल बाद भी बिहार बेहाल
इस्तीफे की खबरों के बीच तेजस्वी यादव ने राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर नीतीश कुमार को कटघरे में खड़ा किया। तेजस्वी ने कहा कि एक तरफ मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्होंने राज्य की तिजोरी को खाली कर दिया है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि एनडीए के 20 साल के लंबे शासन के बाद भी बिहार देश का सबसे गरीब राज्य बना हुआ है। यहाँ प्रति व्यक्ति आय और निवेश देश में सबसे कम है। तेजस्वी ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने केवल कुर्सी बचाई, राज्य के विकास के लिए कोई ठोस बुनियादी ढांचा तैयार नहीं किया।

क्या सच में खाली है बिहार का खजाना?
तेजस्वी यादव के आरोपों पर गौर करें तो बिहार के आर्थिक आंकड़े काफी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि बिहार वर्तमान में देश के सबसे कर्जदार राज्यों में से एक है। राज्य की वित्तीय स्थिति पूरी तरह केंद्र सरकार की सहायता और उधारी पर टिकी है। बिहार सरकार का वर्ष 2026-27 का बजट 3.47 लाख करोड़ रुपये का है। इसमें से नियमित कमाई यानी रेवेन्यू रिसीट का 74% हिस्सा केंद्र सरकार से आता है। वहीं, कैपिटल रिसीट का 99% हिस्सा केवल कर्ज और उधारी से पूरा किया जा रहा है।

रोजाना 132 करोड़ रुपये सिर्फ कर्ज और ब्याज में
बिहार के बजट दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य सरकार कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसी हुई है। वर्ष 2025-26 तक बिहार पर 3.50 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। इसके 2026-27 में बढ़कर 3.88 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है। यह राज्य की कुल जीडीपी (GSDP) का लगभग 29% है। वर्तमान स्थिति यह है कि बिहार सरकार को हर साल 25,364 करोड़ रुपये का सिर्फ ब्याज चुकाना पड़ रहा है। अगर उधारी की मूल राशि और ब्याज को जोड़ दिया जाए, तो राज्य सरकार रोजाना करीब 132 करोड़ रुपये केवल कर्ज चुकाने में खर्च कर रही है।

पेंशन और सैलरी के बोझ तले दबा विकास
राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रशासनिक खर्चों में जा रहा है। लगभग 1.31 लाख करोड़ रुपये कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन में खर्च हो रहे हैं। वहीं 18 हजार करोड़ रुपये सब्सिडी में जा रहे हैं। इसका सीधा असर विकास योजनाओं पर पड़ रहा है। बजट का केवल 18% हिस्सा ही अस्पताल, सड़क, स्कूल और कॉलेज जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च हो पा रहा है। ऐसे में बिहार को मिलने वाले नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की चरमराई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की होगी।


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