
इंडिया AI समिट: रट्टामार पढ़ाई से आगे बढ़ेगा शिक्षा का तंत्र
संप्रभु बड़े भाषा मॉडल (LLMs) के निर्माण से लेकर 500 वर्ष पुराने पुस्तक प्रारूप को बदलने तक, विशेषज्ञों ने रटने की पारंपरिक पद्धति से हटकर सहज, AI-आधारित शिक्षा की ओर हो रहे बड़े बदलाव पर अपने विचार रखे।
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंंत चौधरी ने मंगलवार (17 फरवरी) को यह कहकर सबका ध्यान आकर्षित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भारतीय छात्रों के मूल्यांकन के तरीके को मूल रूप से बदल सकती है। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि पारंपरिक परीक्षाएं भविष्य में अप्रासंगिक हो सकती हैं।
दिल्ली में समिट के दूसरे दिन बोलते हुए चौधरी ने कहा,“मुझे विश्वास है कि AI भारत के सभी छात्रों के बीच एक मजबूत समझ के रूप में उभरेगा। यही AI छात्रों के सीखने के तरीके को प्रभावित करेगा। और मेरी आशा—मैं यह एक स्कूल शिक्षा मंत्री के रूप में कह रहा हूं—यह है कि जब आप हर छात्र की सीखने की यात्रा का निरंतर मूल्यांकन करने में सक्षम होंगे, तो शायद एक दिन परीक्षाओं की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए, क्योंकि परीक्षाएं किसी एक समय बिंदु पर स्थिर मूल्यांकन होती हैं।”
उन्होंने आगे कहा,“AI के माध्यम से आप हर विशेष और अनोखे बच्चे को अधिक सहज और गहराई से समझ सकते हैं।”
AI प्रतिभा की कमी बड़ी चुनौती
चौधरी की यह टिप्पणी नीति-निर्माताओं, वेंचर कैपिटल नेताओं और शिक्षाविदों के बीच भारत की एआई रणनीति पर व्यापक चर्चा के दौरान आई। इसमें संप्रभु बड़े भाषा मॉडल विकसित करने, कक्षाओं की पुनर्कल्पना करने और उच्चस्तरीय शोध प्रतिभा बढ़ाने जैसे विषय शामिल थे।
PeakXV नामक वेंचर कैपिटल और ग्रोथ निवेश फर्म के प्रबंध निदेशक राजन आनंदन ने इस चुनौती को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए कहा कि भारत को केवल छोटे सुधारों से आगे बढ़कर अगली पीढ़ी की तकनीक में नेतृत्व करना होगा।
उन्होंने कहा,“अगर भारत को सच में वैश्विक एआई नेतृत्व बनाना है, तो हमें अगली पीढ़ी में अग्रणी बनना होगा। हमें विश्व-स्तरीय मॉडल विकसित करने होंगे। हमें नई आर्किटेक्चर खोजनी होंगी।”
उन्होंने अग्रणी देशों की तुलना में भारत में एआई प्रतिभा की कमी की ओर इशारा करते हुए कहा,“अमेरिका और ब्रिटेन में शीर्ष स्तर के 3,000-3,000 एआई शोधकर्ता हैं। भारत में केवल 200 हैं। हमें 5,000 से 10,000 विश्व-स्तरीय शोधकर्ताओं तक कैसे पहुंचना है? अगर हम ऐसा कर लेते हैं, तो हम जीत जाएंगे।”
तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर
चर्चा इसके बाद आधारभूत (फाउंडेशनल) मॉडल और तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर मुड़ गई। InflectionAI के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) विभु मित्तल ने चेतावनी दी कि जो देश अपने बड़े भाषा मॉडल (LLMs) विकसित करने में असफल रहेंगे, वे दीर्घकालिक रूप से पिछड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा,“शिक्षा में एक बात कही जाती है कि अगर आप पढ़ना सीखते नहीं हैं, तो सीखने के लिए पढ़ भी नहीं पाएंगे। यदि हम अपने स्वयं के LLM नहीं बनाएंगे, तो AI का प्रभावी उपयोग न कर पाने की वजह से कोई भी देश लगातार पीछे छूटता जाएगा। AI एक ‘एम्प्लीफायर’ है। यह एक व्यक्ति को कई लोगों जितना उत्पादक बना सकता है। यह हर संगठन में मौजूद खामियों को भरने में मदद कर सकता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि भारत के पास अपने LLM और अपने मॉडल हों।”
उन्होंने आगे कहा,“इसके और भी कारण हैं। हमारा ज्ञान, हमारी संस्कृति और हमारी संवेदनशीलताएं विशिष्ट हैं। हर देश को—लेकिन खासकर भारत जैसे विविध और समृद्ध परंपराओं वाले देश को ऐसा मॉडल चाहिए जिसे भारत ने बनाया हो और जिस पर भारत का नियंत्रण हो।”
रटने की पढ़ाई का अंत?
राष्ट्रीय क्षमता से आगे बढ़ते हुए मित्तल ने तर्क दिया कि AI शिक्षण पद्धति (पैडागॉजी) को भी पूरी तरह बदल सकता है और रटने की प्रवृत्ति को खत्म कर सकता है।
उन्होंने कहा,“अब हम रटने पर ध्यान नहीं देंगे। हम याद करने पर जोर नहीं देंगे। हम विश्लेषण पर अधिक ध्यान देंगे। हम सीमाओं को आगे बढ़ाने पर फोकस करेंगे।”
मित्तल ने यह भी सुझाव दिया कि सदियों से लगभग अपरिवर्तित रहे पुस्तकों के प्रारूप में भी जल्द बदलाव आ सकता है।
उन्होंने कहा,“हमारे पास 500 वर्षों से किताबें हैं और उनके स्वरूप में मूलभूत बदलाव नहीं हुआ है। मुझे लगता है कि आने वाले वर्षों में किताबों की जगह मूल रूप से AI मॉडल ले सकते हैं—ऐसी किताबें जिनसे आप बात कर सकें, लेखक से संवाद कर सकें, यहां तक कि उससे बहस भी कर सकें।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा,“क्या आप महाभारत को लेखक के दृष्टिकोण से या द्रौपदी या विदुर के नजरिए से पढ़ना नहीं चाहेंगे? आप इन सभी चीजों का वर्णन, समझ और विश्लेषण उन तरीकों से पाना चाहेंगे जो पहले कभी संभव नहीं थे।”
सीखने में आनंद और जिज्ञासा
मित्तल ने यहां तक कहा कि भविष्य में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) की मौजूदा शिक्षण शैली की आवश्यकता भी बदल सकती है।
उन्होंने कहा,“मेरे विचार से शिक्षा का स्वरूप ऐसा बदलेगा जो अधिक जिज्ञासा, अधिक प्रेरणा और सीखने के स्वाभाविक आनंद को बढ़ावा दे। इसलिए मैं थोड़ा विवादित बयान दूं, शायद भविष्य में हमें IITs की आज जैसी शिक्षण पद्धति की जरूरत न रहे।”
डिजिटल वास्तविकताएं और चुनौतियां
जहां उद्योग जगत के नेताओं ने महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश की, वहीं शिक्षाविदों ने सावधानीपूर्वक क्रियान्वयन, पहुंच और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया।
IIT कानपुर के मनींद्र अग्रवाल ने भारत की डिजिटल वास्तविकताओं की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि AI का एकीकरण इन्हें ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।
उन्होंने कहा,“AI टूल्स का एकीकरण स्मार्टफोन और व्हाट्सएप जैसे लोकप्रिय ऐप्स के जरिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। छात्रों के प्रशिक्षण के लिए उपयोग की जाने वाली हर सामग्री और हर मॉडल सभी छात्रों के लिए उपलब्ध होना चाहिए। यह एक विशाल प्रयास होगा, क्योंकि इसके लिए कम-बैंडविड्थ वाले मॉडल विकसित करने होंगे, जो कभी-कभी ऑफलाइन भी काम कर सकें।”
उन्होंने तर्क दिया कि यदि ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार किया जाता है, तो शिक्षा की पहुंच सार्वभौमिक हो सकती है।
उन्होंने कहा,“इन सभी व्यवस्थाओं के लागू हो जाने के बाद जो मुझे विश्वास है कि अगले एक-दो वर्षों में हो जाएंगी सामग्री की डिलीवरी सार्वभौमिक हो सकती है, बशर्ते हम उनके लिए उपयुक्त छोटे मॉडल विकसित कर सकें। यही वह कुंजी होगी जिससे देश के हर एक छात्र तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाई जा सकेगी।”
IIT Bombay की सुनीता सरावगी ने एक और महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डाला-शैक्षणिक वातावरण में नियंत्रण और निगरानी।
उन्होंने कहा,“मेरे अनुसार एक बहुत बड़ी चुनौती AI मॉडलों की ‘स्टियरेबिलिटी’ (नियंत्रण-क्षमता) है। जब छात्र अपनी पढ़ाई को बेहतर बनाने के लिए AI का उपयोग करें, तो हम चाहते हैं कि शिक्षक इन मॉडलों को नियंत्रित और विनियमित कर सकें। मौजूदा ‘प्रॉम्प्ट-आधारित’ नियंत्रण प्रणाली मुझे इतनी महत्वपूर्ण तैनाती के लिए पर्याप्त नहीं लगती, जहां हमें यह सुनिश्चित करना है कि सीखने की प्रक्रिया में AI के उपयोग पर मानवीय निगरानी बनी रहे, ताकि छात्रों के संज्ञानात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।”

