
पृथ्वी से परे जीवन के संकेत? खगोलभौतिकीविद ने सावधानी बरतने की दी सलाह
भारत दौरे पर आए कैम्ब्रिज के खगोलभौतिकीविद ने अपनी टीम द्वारा K2-18b पर जीवन के संकेत, हायसीन (Hycean) दुनियाओं और एलियन जीवन की पुष्टि के लिए मजबूत सबूतों की जरूरत को समझाया
“हम या तो पृथ्वी से परे जीवन के पहले संकेत देख रहे हैं — या फिर एक पूरी तरह नई रासायनिक प्रक्रिया का पता लगा रहे हैं, जिसे हमने पहले कभी नहीं देखा। किसी भी स्थिति में, यह एक बड़ी उपलब्धि है,” यह कहना है भारत आए ब्रिटिश-भारतीय खगोलभौतिकीविद निक्कू मधुसूदन का, जिन्होंने आधुनिक खगोल विज्ञान में अपनी सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक का जिक्र करते हुए यह बात कही।
पिछले साल, James Webb Space Telescope की मदद से, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उनकी रिसर्च टीम ने एक्सोप्लैनेट K2-18b पर संभावित बायोसिग्नेचर (जीवन के संकेत) का पता लगाया — जो पृथ्वी से लगभग 120 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।
यह चौंकाने वाली खोज मानवता की ब्रह्मांड में स्थिति को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है और उस सदियों पुराने सवाल का जवाब दे सकती है — क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?
द फेडरल ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में खगोलभौतिकी के प्रोफेसर और एक्सोप्लैनेट विशेषज्ञ निक्कू मधुसूदन से इस खोज, एलियन जीवन को लेकर उत्साह के बीच बरती जा रही सावधानी, विज्ञान और दर्शन पर इसके प्रभाव, और एक्सोप्लैनेट विज्ञान के क्षेत्र में भारत की स्थिति पर बातचीत की। यहां उसके मुख्य अंश दिए गए हैं:
आप सौरमंडल के बाहर जीवन की संभावना को लेकर ‘सावधानीपूर्वक आशावादी’ क्यों हैं?
हाल ही में K2-18b ग्रह के अवलोकनों में हमें इसके वायुमंडलीय स्पेक्ट्रम में अतिरिक्त अवशोषण के संकेत मिले हैं। हमें लगता है कि यह डाइमिथाइल सल्फाइड या डाइमिथाइल डिसल्फाइड जैसे अणुओं की वजह से हो सकता है, जिन्हें पृथ्वी पर मुख्य रूप से जीवन द्वारा उत्पन्न बायोसिग्नेचर माना जाता है।
इसलिए, हमें लगता है कि इस ग्रह पर जीवन होने की संभावना हो सकती है। लेकिन हम बहुत सावधानी भी बरतना चाहते हैं क्योंकि ये अभी शुरुआती अवलोकन हैं। अभी हमारे पास जो प्रमाण हैं, उनकी विश्वसनीयता लगभग 95 प्रतिशत है। विज्ञान में यह पर्याप्त नहीं होता। अभी भी 5 प्रतिशत संभावना है कि जो हम देख रहे हैं, वह कोई यादृच्छिक संकेत हो या जीवन से संबंधित न हो।
हम इस अनिश्चितता को घटाकर 1 लाख में 1 या यहां तक कि 10 लाख में 1 तक लाना चाहते हैं। हमें उसी स्तर के भरोसे की जरूरत है।
इस खोज को निर्णायक साबित करने के लिए और क्या सबूत चाहिए?
हमें और अधिक अवलोकनों की जरूरत है — बार-बार किए गए अवलोकनों की — ताकि संकेत को मजबूत किया जा सके। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जो हम देख रहे हैं, वह वास्तविक है, न कि कोई सांख्यिकीय उतार-चढ़ाव।
अगर हम डाइमिथाइल सल्फाइड की मौजूदगी की पुष्टि कर पाते हैं और यह भी साबित कर देते हैं कि यह केवल जीवन द्वारा ही उत्पन्न होता है, न कि किसी गैर-जैविक प्रक्रिया से, तो यह एक बहुत मजबूत प्रमाण होगा।
फिलहाल, हम वहां तक नहीं पहुंचे हैं। लेकिन हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं — और यह शुरुआत ही अपने आप में महत्वपूर्ण है।
अगर जीवन की पुष्टि हो जाती है, तो इसका मानवता के लिए क्या मतलब होगा? क्या यह जीवन की खोज के एक नए युग की शुरुआत होगी?
अगर हम यह पुष्टि कर देते हैं कि डाइमिथाइल सल्फाइड जैसा अणु मौजूद है और वह जीवन द्वारा उत्पन्न होता है, तो यह मानवता के सबसे पुराने सवालों में से एक का जवाब दे देगा — क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?
यह एक बहुत बड़ा क्षण होगा। यह हमारे खुद को देखने के तरीके को मूल रूप से बदल देगा।
जहां हम अब तक ब्रह्मांड को केवल एक भौतिक स्थान के रूप में देखते हैं, जो तारों और आकाशगंगाओं से भरा है, वहीं हम इसे एक ऐसे स्थान के रूप में देखना शुरू करेंगे, जहां अन्य जगहों पर भी जीवन संभव हो सकता है — ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी पर महासागर या जंगल हैं।
हमारा नजरिया पृथ्वी-केंद्रित सोच से बदलकर एक बड़े, जीवित ब्रह्मांड का हिस्सा बनने की ओर जाएगा। हमें एहसास होगा कि हम एक बहुत बड़े तंत्र का छोटा सा हिस्सा हैं — और इससे ब्रह्मांड को देखने का हमारा तरीका पूरी तरह बदल जाएगा।
क्या आप बता सकते हैं कि Hycean एक्सोप्लैनेट क्या होते हैं? क्या यह शब्द आपने ही गढ़ा है?
“Hycean” शब्द “हाइड्रोजन” और “ओशन (महासागर)” से मिलकर बना है। ये ऐसे ग्रह होते हैं जिनका वायुमंडल हाइड्रोजन से भरपूर होता है और उनकी सतह पूरी तरह महासागर से ढकी होती है।
यह एक बिल्कुल अलग प्रकार के ग्रह हैं — हमारे सौरमंडल में इस तरह का कोई ग्रह मौजूद नहीं है। यही कारण है कि हमने इस शब्द को गढ़ा।
ये ग्रह खास तौर पर इसलिए रोमांचक हैं क्योंकि वर्तमान तकनीक के जरिए इनमें जीवन के संकेत तलाशना, पृथ्वी जैसे चट्टानी ग्रहों की तुलना में ज्यादा आसान हो सकता है।
अब तक वैज्ञानिकों का ध्यान मुख्य रूप से पृथ्वी जैसे ग्रहों को खोजने पर रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पृथ्वी जैसे ग्रहों पर जीवन के संकेत ढूंढने की हमारी क्षमता अभी लगभग 20 साल दूर है।
Hycean दुनिया के साथ, हमने उस भविष्य को वर्तमान के करीब ला दिया है। इन ग्रहों का अध्ययन आज के उपकरणों से संभव है, जैसे कि James Webb Space Telescope।
इसलिए, ये ग्रह जीवन की खोज के लिए एक ज्यादा तात्कालिक और व्यावहारिक रास्ता प्रदान करते हैं।
अप्रैल 2025 में आपकी खोज के बाद K2-18b को लेकर क्या अपडेट हैं?
प्रारंभिक खोज के बाद काफी उत्साह देखा गया — यहां तक कि एलियन जीवन मिलने के बढ़ा-चढ़ाकर दावे भी किए गए। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, लेकिन यह भी दिखाती है कि हमें सावधानी बरतने की जरूरत क्यों है।
इसके बाद, कई अध्ययनों ने हमारे निष्कर्षों को चुनौती देने या उन्हें नए तरीके से समझाने की कोशिश की। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में कहा गया कि हमने पर्याप्त अणुओं पर विचार नहीं किया और 90 संभावित अणुओं का विश्लेषण किया गया।
इस पर हमने और आगे बढ़ते हुए 650 अणुओं का विश्लेषण किया — जो इस क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा अध्ययन है। हमने नियर-इन्फ्रारेड और मिड-इन्फ्रारेड दोनों प्रकार के डेटा का उपयोग किया।
फिर भी, केवल तीन अणुओं ने महत्वपूर्ण संकेत दिखाए, और उनमें डाइमिथाइल सल्फाइड फिर से शामिल था। बाकी दो भी जटिल अणु हैं, जो अक्सर जीवन या औद्योगिक प्रक्रियाओं से जुड़े होते हैं।
इसका मतलब है कि हम चाहे किसी भी तरीके से देखें, हमें कुछ जटिल चीज दिखाई दे रही है। यह या तो जीवन का संकेत है, या फिर कोई ऐसी रासायनिक प्रक्रिया है जिसे हम अभी तक समझ नहीं पाए हैं।
दोनों ही स्थितियां बड़ी खोज मानी जाएंगी।
किसी ग्रह में, जो अपने तारे के रहने योग्य क्षेत्र (habitable zone) में स्थित हो, दो या उससे अधिक प्रमुख कार्बन-युक्त अणुओं का मिलना अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है और यह संकेत देता है कि वह ग्रह संभावित रूप से रहने योग्य हो सकता है।
क्या आपकी रिसर्च को लेकर संदेह (skepticism) भी रहा है?
बिल्कुल, और यह अच्छी बात है। विज्ञान संदेह के जरिए ही आगे बढ़ता है।
हम सक्रिय रूप से वैकल्पिक व्याख्याओं पर विचार करते हैं। वास्तव में, हम खुद भी बार-बार अपने निष्कर्षों को गलत साबित करने की कोशिश करते हैं।
अगर अन्य वैज्ञानिक ठोस तर्क देते हैं, तो हम उन्हें गंभीरता से लेते हैं।
हमारा लक्ष्य यह साबित करना नहीं है कि हम सही हैं — बल्कि सच्चाई तक पहुंचना है।
हमारा लक्ष्य किसी भी कीमत पर जीवन ढूंढना नहीं है। लक्ष्य यह समझना है कि वास्तव में वहां क्या मौजूद है। अगर यह जीवन निकलता है, तो यह असाधारण होगा। अगर यह कोई नई रासायनिक प्रक्रिया निकलती है, तो वह भी एक बड़ी खोज होगी। किसी भी स्थिति में, हम ब्रह्मांड के बारे में कुछ मूलभूत नया सीखते हैं।
एक्सोप्लैनेट्स पर आपकी खोजों में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने कैसे मदद की है?
James Webb Space Telescope (JWST) अंतरिक्ष में मानवता द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे बड़ा टेलीस्कोप है। यह खगोल विज्ञान के कई क्षेत्रों में प्रगति को आगे बढ़ा रहा है, खासकर एक्सोप्लैनेट विज्ञान के अध्ययन में।
उदाहरण के लिए, इसी टेलीस्कोप की मदद से पहली बार K2-18b ग्रह के वायुमंडल में कार्बन युक्त अणुओं—मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड—का पता लगाया गया।
यह एक्सोप्लैनेट पृथ्वी से लगभग ढाई गुना बड़ा है, लेकिन इसका तापमान लगभग पृथ्वी जैसा है, और हमें लगता है कि यह ग्रह रहने योग्य (habitable) हो सकता है।
एक्सोप्लैनेट विज्ञान में इस तरह के कई अन्य अवलोकन किए जा रहे हैं, जो हमारे सौरमंडल से बाहर सितारों के आसपास मौजूद ग्रहों और उनके वायुमंडल को समझने में बड़ी प्रगति ला रहे हैं।
एक्सोप्लैनेट्स पर आपके काम ने ब्रह्मांड में मानवता की जगह को लेकर आपके नजरिए को कैसे बदला है?
अभी जब हम रात के आसमान को देखते हैं, तो हमें एक विशाल लेकिन निर्जीव ब्रह्मांड दिखाई देता है—तारे और आकाशगंगाएं, जो सिर्फ भौतिक वस्तुएं हैं।
अगर हमें कहीं और जीवन मिल जाता है, तो यह सब कुछ बदल देगा। तब आसमान एक निर्जीव जगह नहीं लगेगा, बल्कि जीवंत महसूस होगा—एक “जीवित आकाश” जैसा।
यह हमारी पहचान का विस्तार करेगा—हम सिर्फ पृथ्वी पर रहने वाली एक प्रजाति नहीं रहेंगे, बल्कि एक कॉस्मिक इकोसिस्टम का हिस्सा बन जाएंगे।
सिर्फ एक ग्रह पर जीवन मिलना ही यह संकेत देगा कि ऐसे और भी कई संसार मौजूद हो सकते हैं।
इस विशाल और फैलते ब्रह्मांड में भगवान की जगह कहां है?
मुझे इसमें कोई विरोधाभास नहीं दिखता। अलग-अलग धर्म भगवान की अलग-अलग व्याख्या करते हैं।
यह तर्क दिया जा सकता है कि भगवान उस अंतिम वास्तविकता (ultimate reality) का प्रतीक हैं, जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है। अगर इस परिभाषा में पूरा ब्रह्मांड शामिल है, तो हम जो भी खोजते हैं, वह उसी वास्तविकता का हिस्सा है।
इसलिए, मुझे विज्ञान और भगवान की अवधारणा के बीच कोई टकराव नहीं दिखता।
इतने रोचक क्षेत्र में काम करने के बावजूद आप ‘Project Hail Mary’ या ‘Inception’ जैसी साइंस फिक्शन फिल्मों की ओर आकर्षित क्यों नहीं होते?
मेरे लिए मेरा काम ही विज्ञान की अग्रिम पंक्ति (cutting edge) पर है। मैं रोज़ ऐसे विचारों और खोजों से जुड़ा रहता हूं, जो अक्सर कल्पना से भी ज्यादा अजीब और रोमांचक होते हैं।
इसलिए मुझे अलग से प्रेरणा ढूंढने की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरी “साइंस फिक्शन” बहुत जल्दी असली विज्ञान बन जाती है।
एक्सोप्लैनेट रिसर्च में भारत की क्या भूमिका है?
इस क्षेत्र में पहले से ही काफी काम हो रहा है—ग्रहों के निर्माण से लेकर उनके वायुमंडल के अध्ययन तक। पिछले एक दशक में इसमें जबरदस्त प्रगति हुई है।
भारतीय शोधकर्ता वैश्विक स्तर पर काम कर रहे हैं और भारत तेजी से इस क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी बनता जा रहा है।
भारत एक्सोप्लैनेट विज्ञान से जुड़े नए मिशनों की भी योजना बना रहा है। अंतरिक्ष मिशनों और स्पेस साइंस दोनों में भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
छात्रों के लिए ISRO के मिशनों, खगोलभौतिकी अनुसंधान और ग्राउंड-बेस्ड टेलीस्कोप्स के जरिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं।
भविष्य खासकर युवा वैज्ञानिकों के लिए बेहद उज्ज्वल है। छात्र एक्सोप्लैनेट विज्ञान पर काम करने वाले संस्थानों में मास्टर्स और ग्रेजुएट स्तर से शुरुआत कर सकते हैं।
इसके अलावा, ISRO और अन्य प्रयोगशालाओं में भी खासकर उपकरण निर्माण (instrumentation) और मिशन डेवलपमेंट के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध हैं।

