पीएचडी या गुलामी? दम घोंटू माहौल और शोषण से हारते देश के स्कॉलर्स
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पीएचडी या गुलामी? दम घोंटू माहौल और शोषण से हारते देश के स्कॉलर्स

IIT कानपुर में छात्र की आत्महत्या ने मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाए हैं। अनपेड लेबर, हरासमेंट और सुपरवाइजर की मनमानी से पीएचडी स्कॉलर्स डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं।


Suicide By PHD Scholar : IIT कानपुर में एक पीएचडी स्कॉलर की आत्महत्या ने सबको झकझोर दिया है। इस दुखद घटना ने भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य अब एक गंभीर मुद्दा बन गया है। आत्महत्या की घटना के बाद शिक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय ने तीन सदस्यों की एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य नियमों के पालन की जांच करेगी। इसका उद्देश्य भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है। लेकिन देश भर के पीएचडी छात्रों के लिए यह कोई नई बात नहीं है। यह घटना उस सिस्टम की याद दिलाती है जो छात्रों को तोड़ देता है। छात्र एक बेहद जहरीले माहौल का सामना कर रहे हैं। यहाँ शक्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ा हुआ है। छात्रों पर काम का भारी दबाव रहता है। वे अपनी एकेडमिक सफलता के लिए पूरी तरह सुपरवाइजर पर निर्भर होते हैं। शिकायत निवारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस कारण छात्र लंबे समय तक मानसिक तनाव में रहने को मजबूर हैं।


रिसर्च में सामने आया कड़वा सच

अकादमिक शोध भी छात्रों के इन अनुभवों की पुष्टि कर रहे हैं। 'एग्जामिनिंग टॉक्सिक सुपरविजन' नामक रिसर्च पेपर में कई खुलासे हुए हैं। इसे जामिया मिलिया इस्लामिया और दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स ने लिखा है। यह पेपर 2022 में एमराल्ड इनसाइट जर्नल में प्रकाशित हुआ था। इसमें सुपरविजन के तरीके को मानसिक स्वास्थ्य संकट का मुख्य कारण माना गया है। कई छात्रों ने गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याओं की शिकायत की है। इनमें डिप्रेशन, चिंता, तनाव और आत्महत्या के विचार शामिल हैं। छात्रों ने भावनात्मक रूप से टूट जाने की बात स्वीकार की है। उन्हें लगता है कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। पीएचडी का पूरा सफर उनके लिए भावनात्मक रूप से थकाने वाला बन गया है।


सुपरवाइजर की मनमानी और शक्ति का दुरुपयोग

डॉ. नसरीना सिद्दीकी इस संकट की जड़ स्ट्रक्चरल डिपेंडेंस को मानती हैं। पीएचडी स्कॉलर्स मानसिक समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इसका कारण यह है कि वे पूरी तरह अपने सुपरवाइजर पर निर्भर हैं। रिसर्च टॉपिक चुनने से लेकर फेलोशिप पाने तक सब कुछ सुपरवाइजर तय करते हैं। हर चीज के लिए उनकी 'मंजूरी' लेना अनिवार्य होता है। यह शक्ति संतुलन पूरी तरह एक तरफ झुका हुआ है। अक्सर रिसर्च सुपरवाइजर इस ताकत का दुरुपयोग करते हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की भारी कमी है। अगर कोई छात्र पीड़ित महसूस करता है, तो उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। IIT कानपुर के छात्र बताते हैं कि डिग्री जमा करने में भी देरी की जाती है। यह सब सुपरवाइजर के मूड पर निर्भर करता है।


बिना वेतन के मजदूरी और निजी काम

लैब-आधारित विषयों में छात्रों का जीवन और भी कठिन है। साइंस के छात्रों को लैब में दिन में 16 घंटे बिताने पड़ते हैं। अगर वे नहीं रहते, तो उनकी उपस्थिति काट दी जाती है। एक्सटेंशन पीरियड में उन्हें पैसे नहीं मिलते, पर काम जारी रहता है। बात सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। छात्रों से फैकल्टी के निजी काम भी करवाए जाते हैं। यह हर संस्थान में सामान्य बात हो गई है। छात्रों को किराने का सामान लाने के लिए भेजा जाता है। उन्हें बच्चों को स्कूल से लाने का काम सौंपा जाता है। कई बार उन्हें रिश्तेदारों को अस्पताल ले जाना पड़ता है। रेलवे स्टेशन से परिवार के सदस्यों को लाना भी उनकी जिम्मेदारी बना दी जाती है। इस तरह के कामों पर शायद ही कभी सवाल उठाए जाते हैं।


जेएनयू और पंजाब यूनिवर्सिटी के मामले

जेएनयू में पीएचडी छात्र नजर मोहम्मद का मामला बहुत गंभीर है। उन पर कैंपस में एबीवीपी सदस्यों द्वारा हमला किया गया था। इसके बाद उनके सुपरवाइजर ने उन्हें गाइड करने से मना कर दिया। उन्हें 'सुरक्षा खतरा' बताकर लैब का एक्सेस बंद कर दिया गया। उनकी फेलोशिप के आवेदन भी रोक दिए गए। अंत में उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए भारत छोड़ना पड़ा। वहीं, पंजाब यूनिवर्सिटी में एक छात्रा ने निजी काम करने से मना किया था। उसे शादी के दौरान परीक्षा का सीटिंग प्लान बनाने को कहा गया था। मना करने पर उसे प्रोग्राम से निकालने की धमकी दी गई। उसे कॉन्फ्रेंस में पेपर प्रस्तुत करने से भी रोक दिया गया।


कार्रवाई का अभाव और डर का माहौल

आरटीआई कार्यकर्ता ईशान माता ने कई संस्थानों की जांच की है। उन्होंने पाया कि ऐसे मामलों में 'कल्चर ऑफ इम्प्युनिटी' काम करता है। जांच कमेटियों में अक्सर फैकल्टी मेंबर ही होते हैं। इसमें छात्रों का प्रतिनिधित्व न के बराबर होता है। कई बार जांच में दुर्व्यवहार के सबूत मिल जाते हैं। इसके बावजूद दोषी फैकल्टी पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती। अकादमिक जगत में दोषियों को बचाने का चलन है। इसी कारण अधिकांश पीड़ित छात्र शिकायत ही नहीं करते। उन्हें अपने करियर के बर्बाद होने का डर रहता है। ईशान माता का कहना है कि संस्थानों में सख्त नियम होने चाहिए। शिकायतों से निपटने के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र की जरूरत है।



(आत्महत्याओं को रोका जा सकता है। मदद के लिए कृपया आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन पर कॉल करें: नेहा सुसाइड प्रिवेंशन सेंटर – 044-24640050; आसरा हेल्पलाइन आत्महत्या रोकथाम, भावनात्मक सहायता और ट्रॉमा हेल्प के लिए — +91-9820466726; किरण, मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास — 1800-599-0019, दिशा 0471-2552056, मैत्री 0484 2540530, और स्नेहा की आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन 044-24640050।)


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