उपग्रह की परमाणु घड़ी हुई विफल, भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में?
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IRNSS-1एफ उपग्रह पर लगी परमाणु घड़ी 13 मार्च को विफल हो गई

उपग्रह की परमाणु घड़ी हुई विफल, भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में?

नेविगेशन उपग्रह आधुनिक युग के प्रकाश स्तंभ की तरह होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये प्रकाश की किरण भेजने के बजाय लगातार संकेतों की तरंगें प्रसारित करते हैं...


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आईआरएनएसएस-१ एफ उपग्रह पर लगी परमाणु घड़ी 13 मार्च को विफल हो गई। यह घटना नविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) के लिए अंतिम झटका साबित हुई, जिसे भारत का स्वदेशी ‘जीपीएस’ कहा जाता है और जिसे पहले आईआरएनएसएस (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) के नाम से जाना जाता था। इस उपग्रह के निष्क्रिय होने से भारत की स्वायत्त नेविगेशन क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो गई है।

इस उपग्रह समूह के माध्यम से नेविगेशन सेवाएं प्रदान करने के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों की आवश्यकता होती है। हालांकि, साल 2013 से अब तक प्रक्षेपित 11 उपग्रहों में से केवल तीन आईआरएनएसएस-1बी (अप्रैल 2014), आईआरएनएसएस-1एल (अप्रैल 2018) और दूसरी पीढ़ी के नविक उपग्रहों में पहला एनवीएस-01 (मई 2023) ही वर्तमान में कार्यरत हैं।

उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली कैसे काम करती है?

नेविगेशन उपग्रह आधुनिक युग के प्रकाश स्तंभ (लाइटहाउस) की तरह होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये प्रकाश की किरण भेजने के बजाय लगातार संकेतों की तरंगें प्रसारित करते हैं, जिनमें समय की जानकारी (टाइमस्टैम्प) और उनकी स्थिति शामिल होती है। आपका मोबाइल फोन या जीपीएस रिसीवर इन संकेतों को पकड़ता है और यह मापता है कि प्रत्येक संकेत को पहुंचने में कितना समय लगा।

क्योंकि रेडियो तरंगें प्रकाश की गति से चलती हैं। इसलिए समय में बहुत छोटा अंतर भी दूरी में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई संकेत आपको थोड़ा देर से प्राप्त होता है तो रिसीवर यह समझ जाता है कि वह उपग्रह आपसे अधिक दूरी पर है।

कम से कम तीन उपग्रहों से दूरी की जानकारी मिलने पर आपका रिसीवर “त्रिभुजीकरण” (ट्रायएंगुलेशन) नामक प्रक्रिया करता है। यह ऐसा ही है जैसे आप तीन मित्रों से यह पूछकर अपनी स्थिति पता करें कि आप उनसे कितनी दूरी पर हैं। हर दूरी एक वृत्त बनाती है और जहां ये तीनों वृत्त एक-दूसरे को काटते हैं, वही आपकी सटीक स्थिति होती है। अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई सहित। नेविगेशन उपग्रह भी मापने की पट्टी के बजाय संकेतों के समय के आधार पर यही प्रक्रिया अपनाते हैं।

एक नेविगेशन उपग्रह के केंद्र में परमाणु घड़ी धड़कती रहती है। यहां समय को सामान्य सेकंडों के गुजरने से नहीं। बल्कि परमाणुओं के प्राकृतिक कंपन के आधार पर मापा जाता है। पारंपरिक क्वार्ट्ज घड़ियों के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में एक सेकंड तक का अंतर पैदा कर सकती हैं, परमाणु घड़ियां इतनी सटीक होती हैं कि लगभग 10 करोड़ वर्षों में केवल एक सेकंड का ही अंतर होता है।

जब कोई संकेत अंतरिक्ष से आपके फोन तक पहुंचता है, तो यह घड़ी यह दर्ज करती है कि उसे आने में कितना समय लगा। समय में बहुत छोटी त्रुटि यहां तक कि एक अरबवें हिस्से जितनी भी आपकी लोकेशन को सैकड़ों मीटर तक गलत कर सकती है। यदि घड़ी काम नहीं करेगी। तो नेविगेशन भी संभव नहीं होगा। यही कारण है कि उपग्रहों में अक्सर एक से अधिक घड़ियां लगाई जाती हैं। इसरो ने प्रत्येक उपग्रह में तीन घड़ियां स्थापित की थीं। इसे ‘रेडंडेंसी’ कहा जाता है। अर्थात यदि एक घड़ी विफल हो जाए तो अन्य घड़ियां उसकी जगह काम संभाल लेती हैं और प्रणाली चलती रहती है।

हालांकि इसरो उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण करने में सक्षम था। लेकिन महत्वपूर्ण परमाणु घड़ी एक चुनौती बनी रही। क्षेत्रीय स्तर की नेविगेशन प्रणाली को शीघ्र स्थापित करने के लिए भारत ने परमाणु घड़ियों का आयात करने का निर्णय लिया।

पहले नविक उपग्रहों में स्विट्ज़रलैंड निर्मित रूबिडियम परमाणु घड़ियां लगाई गई थीं, जिन्हें स्पेक्ट्राटाइम नामक कंपनी ने आपूर्ति की थी।

इसके बाद समस्याएं शुरू हो गईं। आईआरएनएसएस-1ए, 1सी, 1डी, 1ई, 1जी और अंततः 1एफ उपग्रहों की घड़ियां समय से पहले ही खराब हो गईं। इनमें से पांच उपग्रहों में तीनों घड़ियां पूरी तरह बंद हो गईं, जबकि अन्य में एक या दो घड़ियां विफल हुईं, जिससे उनकी उपयोगी आयु कम हो गई।

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं थी। यूरोपीय उपग्रहों में भी इसी प्रकार की विफलताएं सामने आईं। साल 2017 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने इन विफलताओं की जांच की, जिसमें संभावित कारण के रूप में ग्राउंड परीक्षण के दौरान शॉर्ट सर्किट को जिम्मेदार ठहराया गया। किसी भी नेविगेशन प्रणाली के लिए घड़ी का विफल होना, उपग्रह के विफल होने के समान है, क्योंकि सटीक समय ही इसकी सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

चीन ने अलग रास्ता अपनाया। उसने शुरुआत में विभिन्न आयातित घड़ियों का उपयोग किया। लेकिन जल्द ही अपनी स्वयं की घड़ियां विकसित कर लीं और आयात पर निर्भरता समाप्त कर दी।

यह स्पष्ट हो गया था कि यदि भारत को अपनी नेविगेशन प्रणाली का निर्माण और संचालन करना है। तो उसे अपनी स्वयं की परमाणु घड़ियां विकसित करनी होंगी। इसी दिशा में 2010 के दशक के मध्य में स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी पर काम शुरू हुआ। साल 2022–23 तक भारतीय रूबिडियम परमाणु आवृत्ति मानक पूरी तरह से प्रमाणित हो चुका था। आज नई एनवीएस-श्रृंखला के उपग्रहों में यही स्वदेशी घड़ियां लगाई जा रही हैं।


(चित्र: आईआरएनएसएस-1एफ उपग्रह के एकीकरण की फ़ाइल फोटो, स्रोत: इसरो)

उपग्रह बनाना, विशेष रूप से नेविगेशन उपग्रह, तकनीकी विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी की मांग करता है। इसके साथ ही पर्याप्त बजट भी अत्यंत आवश्यक होता है। लेकिन बढ़ते कार्यक्षेत्र जैसे गहरे अंतरिक्ष मिशन, चंद्रमा और मंगल अभियानों, नियोजित मानव अंतरिक्ष उड़ान, वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण और नई पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों के विकास के कारण इसरो पर कार्यभार लगातार बढ़ रहा है। विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, काम का दायरा बढ़ने के बावजूद तकनीकी कर्मियों की संख्या में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है। बजट भी पर्याप्त नहीं माना जा रहा। ऐसे में नई श्रृंखला के नेविगेशन उपग्रहों का निर्माण उस स्तर पर नहीं पहुंच पाया है, जिसकी अपेक्षा की जाती है।

उभरते वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अपना स्वयं का उपग्रह आधारित स्थिति निर्धारण और नेविगेशन तंत्र कोई विलासिता नहीं। बल्कि एक अनिवार्यता है। हाल की वैश्विक घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आत्मनिर्भरता के बिना भारत को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में ‘आत्मनिर्भरता’ की अवधारणा अब पुरानी नहीं। बल्कि समय की आवश्यकता बन चुकी है।

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