
UGC 2026 नियम और छात्र विरोध: योगेंद्र यादव का विश्लेषण, देखें VIDEO
योगेंद्र यादव का मानना है कि बहस में अधिकतर जनता या विपक्ष सही जानकारी के बिना अपनी राय दे रहे हैं। असली मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार नियम प्रभावी रूप से लागू हों या नहीं।
केंद्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 इक्विटी नियमों को लेकर देशभर में विरोध और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। 'The Federal' ने पूर्व UGC सदस्य और जाने-माने शिक्षाविद् योगेंद्र यादव से बातचीत की। यादव का कहना है कि इस सार्वजनिक बहस में असली मुद्दा गायब है — 'क्या नया है, नियम क्यों बदले गए और लागू होने पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।'
नया नियम: विरोध क्यों और कहां से?
योगेंद्र यादव का कहना है कि इस बहस में बड़ी भ्रांतियां हैं।
1. कुछ नया आया है: लोगों को लगता है कि यह नियम पूरी तरह नए हैं या क्रांतिकारी हैं, जबकि यह 2012 के नियमों का संशोधित रूप है। 2012 से ही जाति और भेदभाव विरोधी नियम लागू थे।
2. सरकार ने अकेले किया बदलाव: ऐसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले से निर्देश दिए थे कि मौजूदा नियमों को सुधारने और नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है। मोदी सरकार ने केवल कोर्ट के आदेश का पालन किया।
3. जाति भेदभाव पहली बार: यह भी गलत है। 2012 के नियमों में केवल SC और ST का नाम था; 2026 के नियमों में SC/ST/OBC को शामिल किया गया।
यादव ने कहा कि विरोध अक्सर सरकार के विरोधी दलों से आता है, लेकिन इस बार विरोध सरकार के समर्थकों और विचारधारा के भीतर से भी दिख रहा है। उन्होंने इसे "निर्मित असहमति" कहा, ताकि नियम लागू न हो सकें।
2012 से 2026: क्या बदला और क्या समान है?
समानता का मूल: संविधान और मौलिक अधिकार जाति, लिंग, भाषा, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को रोकते हैं। 2012 और 2026 के नियम इसी संवैधानिक लक्ष्य को लागू करने के लिए हैं।
जाति, लिंग और विकलांगता: नियम केवल जाति तक सीमित नहीं हैं। महिलाओं, शारीरिक रूप से विकलांग और अन्य समूहों के लिए भी हैं।
SC/ST से SC/ST/OBC: 2026 नियमों में केवल कुछ विशेष उल्लेख बढ़ाए गए हैं, मूल विचार समान है।
यादव ने कहा कि असली बहस इस बात पर होनी चाहिए कि भेदभाव को रोकने के नियम प्रभावी हैं या नहीं, न कि यह कि क्या नियमों में नई जातियाँ जोड़ी गई हैं।
नए नियमों के मुख्य बदलाव
योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तीन मुख्य बदलाव बताए:-
1. UGC की निगरानी: अब संस्थानों पर UGC की निगरानी होगी, जो पहले नहीं थी।
2. संस्थान के बाहर अपील: यदि समस्या संस्थान प्रमुख से है तो बाहर के लोकपाल या उच्च प्राधिकरण के पास अपील की जा सकेगी।
3. इक्विटी कमिटी: पहले एक अधिकारी था, अब पूरी इक्विटी कमिटी जिम्मेदार होगी।
साथ ही, नियम केवल शिकायत सुनने तक सीमित नहीं हैं; संस्थानों को सक्रिय उपाय करने होंगे। यादव ने कहा कि ये सकारात्मक कदम हैं, लेकिन कुछ मूल बातें सुप्रीम कोर्ट की इच्छा के विपरीत कमजोर कर दी गई हैं।
भेदभाव की परिभाषा: कमजोर हुई या नहीं?
पहले नियमों में भेदभाव के उदाहरण स्पष्ट थे (कक्षा, परीक्षा, आकलन आदि)। अब उदाहरण हटा दिए गए हैं। नियम लागू करना थोड़ा कठिन होगा। क्योंकि पीड़ित को अपने अनुभव को व्यापक श्रेणी में फिट करना होगा। संस्थागत निगरानी मजबूत हुई, लेकिन मूल परिभाषा कमजोर हुई।
क्या ये बदलाव असल में छात्रों की मदद करेंगे?
योगेंद्र यादव के अनुसार, नियम केवल तभी प्रभावी होंगे, जब उनका सख्ती से पालन होगा। 2012 के नियम सही तरीके से लागू नहीं हुए थे। विरोध-प्रदर्शनों को वह "निर्मित" मानते हैं, ताकि नियम कागजों में ही रह जाएं।
सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है?
यादव ने कहा कि 14 साल में ऐसे मामलों की संख्या नगण्य है। विरोध का असली कारण जातिवाद और पितृसत्ता है, न कि वास्तविक भेदभाव।
सुरक्षा उपाय और शिकायत निवारण
हर कानून का दुरुपयोग संभव है। नियम में शिकायत के कई स्तर हैं:-
1. इक्विटी कमिटी
2. उच्च प्राधिकरण
3. संस्थान के बाहर लोकपाल
इस तरह किसी के साथ अन्याय करने के मामले में उचित अपील प्रणाली मौजूद है।

