नई शिक्षा नीति पर सवाल, ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का दावा बेबुनियाद
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नई शिक्षा नीति पर सवाल, ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का दावा बेबुनियाद'

यूजीसी के नए नियमों और एनईपी पर बहस तेज है। प्रो. सुखदेव थोरात के मुताबिक ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का कोई सबूत नहीं, बल्कि सुधार असमानता बढ़ा सकते हैं।


उच्च शिक्षा से जुड़े व्यापक सुधारों का एक पैकेज जिसे भेदभाव-रोधी सुरक्षा और गुणवत्ता सुधार के रूप में पेश किया गया ने जाति, पहुंच और भारतीय विश्वविद्यालयों के भविष्य को लेकर गहरी दरारें उजागर कर दी हैं। नए यूजीसी (UGC) नियमों के खिलाफ विरोध से लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके क्रियान्वयन पर रोक लगाए जाने तक, यह बहस अब इस बड़े सवाल तक पहुंच गई है कि क्या नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत भारत की शिक्षा व्यवस्था पहले से कम समानतापूर्ण होती जा रही है।

द फेडरल ने अर्थशास्त्री और शिक्षाविद् प्रो. सुखदेव थोरात से बातचीत की। उन्होंने बताया कि “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” यानी उलटे भेदभाव की आशंकाओं के पीछे कोई ठोस सबूत क्यों नहीं हैं, नीति में बदलाव किस तरह उच्च शिक्षा तक पहुंच को प्रभावित कर रहे हैं, और मौजूदा सुधार असमानता कम करने के बजाय उसे और मजबूत करने का जोखिम क्यों पैदा कर रहे हैं।

क्या नए यूजीसी नियमों के तहत ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का कोई सबूत है?

मेरे अनुसार यह तर्क पूरी तरह निराधार है। यूजीसी के 2026 के नियम, यूपीए सरकार के तहत बने 2012 के नियमों की तुलना में बेहतर हैं। 2012 के नियमों को रोहित वेमुला की मां ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि सुरक्षा प्रावधानों के बावजूद उनके बेटे को भेदभाव झेलना पड़ा, जो अंततः उसकी मौत का कारण बना। याचिका का उद्देश्य इन नियमों के बेहतर और सख्त क्रियान्वयन की मांग करना था।

संशोधित नियमों का उद्देश्य सुरक्षा को और मजबूत करना है। मौजूदा आपत्ति यह है कि जाति पहले से ही भेदभाव की सामान्य परिभाषा में शामिल है, इसलिए अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को अलग से नामित करने से ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ हो सकता है। यह तर्क टिकता नहीं है। शिकायतों की जांच एक इक्विटी कमेटी करती है, जहां कोई स्वतः धारणा नहीं बनाई जाती। 2012 के नियमों के 11 वर्षों में SC, ST या OBC छात्रों द्वारा उलटे भेदभाव या दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग का एक भी दर्ज मामला सामने नहीं आया।

तो फिर यह दावा अब क्यों किया जा रहा है? यह कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक मुद्दा है। हमारे पास छुआछूत, अत्याचार, धार्मिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून हैं। कोई यह नहीं कहता कि इन्हें हटा दिया जाए क्योंकि इनका दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन जब जाति का नाम सीधे लिया जाता है, तो असहजता पैदा होती है। पिछले एक दशक में जाति को सामाजिक सच्चाई के रूप में स्वीकार करने के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ा है। यह जाति और छुआछूत को सार्वजनिक विमर्श से बाहर रखने की कोशिश का हिस्सा है — जिसमें पाठ्यक्रम से आंबेडकरवादी और दलित विषयवस्तु को कम करना या हटाना भी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2026 के नियमों पर रोक के बाद आगे क्या?

फिलहाल 2012 के नियम लागू रहेंगे। अदालत ने संकेत दिया है कि एक विशेषज्ञ समिति 2026 के नियमों में कानूनी अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए सुधार कर सकती है। मुझे उम्मीद है कि यह ढांचा और बेहतर होकर लौटेगा। 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई अहम होगी।

2020 की नई शिक्षा नीति (NEP) पर आपकी मुख्य आपत्ति क्या है?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे उच्च शिक्षा प्रणाली के गंभीर अध्ययन के बिना लागू किया गया। पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में आई थी, जिसके बाद 1992 में कार्यक्रम कार्यान्वयन (Programme of Action) बना। करीब 37 वर्षों तक सुधार उसी ढांचे के भीतर रहे। इससे पहले राधाकृष्णन और कोठारी जैसे आयोगों ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का गहन अध्ययन किया, डेटा इकट्ठा किया और व्यापक परामर्श के बाद सिफारिशें दीं।

इसके विपरीत, 2020 की नीति ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज़’ पर आधारित है, जो अक्सर अमेरिका से ली गई हैं, लेकिन इस बात का विश्लेषण नहीं किया गया कि भारत की शिक्षा व्यवस्था खासकर निजीकरण के चलते कैसे बदल चुकी है।

निजीकरण ने उच्च शिक्षा को कैसे बदला है?

आज निजीकरण सबसे प्रमुख विशेषता बन चुका है। आधे से अधिक विश्वविद्यालय निजी हैं। लगभग 65 प्रतिशत कॉलेज और करीब 67 प्रतिशत स्टैंडअलोन डिप्लोमा व सर्टिफिकेट संस्थान निजी हैं।

यह आंकड़ा भी वास्तविकता को पूरी तरह नहीं दर्शाता, क्योंकि सरकारी संस्थानों में भी सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स के जरिए निजीकरण हो चुका है। अनुदान अपर्याप्त होने के कारण ये संस्थान ऊंची फीस वसूलते हैं। कर्नाटक जैसे राज्यों में, अगर सरकारी संस्थानों के सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स को शामिल किया जाए, तो करीब 73 प्रतिशत छात्र प्रभावी रूप से निजी स्तर की फीस दे रहे हैं।

‘क्वालिटी रिफॉर्म्स’ समानता को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं?

कई सुधार गुणवत्ता सुधार के नाम पर लाए जाते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से गरीब छात्रों की पहुंच कम कर देते हैं। एक बड़ा उदाहरण है संबद्ध (अफिलिएटिंग) विश्वविद्यालयों को खत्म कर यूनिटरी विश्वविद्यालय बनाना। अफिलिएटिंग मॉडल छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में कॉलेजों को फैलाता है, जिससे पढ़ाई सस्ती और व्यावहारिक होती है। इसके विपरीत, बड़े बहु-विषयक यूनिटरी विश्वविद्यालय शहरों में केंद्रित होते हैं, जिससे छात्रों को पलायन, किराया और जीवन-यापन का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। इससे पहुंच घटती है।

इसी तरह, तीन साल की स्नातक डिग्री को चार साल का करना लागत बढ़ाता है। समय के साथ नौकरी बाजार चार साल की डिग्री को तरजीह देगा, लेकिन गरीब छात्र अतिरिक्त वर्ष का खर्च नहीं उठा पाएंगे।

एमफिल (MPhil) हटाने से क्या असर पड़ता है?

यह वंचित छात्रों के लिए शोध में प्रवेश का एक अहम रास्ता बंद कर देता है। जेएनयू जैसे संस्थानों में कई छात्रों ने एमफिल के जरिए पीएचडी की तैयारी की या नौकरी हासिल की। इसे हटाने से शोध डिग्रियों तक पहुंच सीमित होती है और आर्थिक प्रगति में देरी होती है।

मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम में समस्या क्या है?

यह ड्रॉपआउट को सामान्य बना देता है। एक या दो साल बाद निकलने वाले छात्रों को सर्टिफिकेट या डिप्लोमा तो मिल जाता है, लेकिन उनके वापस लौटकर पूरी डिग्री करने की संभावना कम हो जाती है। धीरे-धीरे उच्च शिक्षा उन्हीं तक सीमित रह जाती है जो लंबे समय तक पढ़ाई का खर्च उठा सकते हैं, जबकि गरीब छात्र शुरुआती एग्ज़िट पर ही रुक जाते हैं।

क्या कॉमन एंट्रेंस टेस्ट पहुंच को कम करते हैं?

हां। ये परीक्षाएं उन छात्रों के पक्ष में जाती हैं जो कोचिंग और टेस्ट-तैयारी पर खर्च कर सकते हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कॉमन टेस्ट लागू होने के बाद जेएनयू जैसे संस्थानों में SC/ST प्रतिनिधित्व घटा है। जब भारत की कुल नामांकन दर ही कम है, तब ऐसे हाई-स्टेक फ़िल्टर पहुंच को और खराब करते हैं।

‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ पर आपकी आपत्ति क्या है?

भारत में उत्पन्न ज्ञान पढ़ाना समस्या नहीं है यह पहले से पाठ्यक्रम में मौजूद है। समस्या यह है कि ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ को जिस तरह परिभाषित और लागू किया जा रहा है, वह व्यवहार में ब्राह्मणवादी ग्रंथों और विचारधाराओं को तरजीह देता है, जबकि बौद्ध, चार्वाक जैसी गैर-ब्राह्मण परंपराओं को बाहर कर देता है। यह राजनीतिक विज्ञान और नैतिक शिक्षा को भी प्रभावित कर रहा है। यह भारतीय ज्ञान का तटस्थ समावेशन नहीं है, बल्कि पाठ्यक्रम को वैचारिक परियोजना में बदलने का जोखिम है, जो आलोचनात्मक सोच और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करता है।

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