
देश के कई विश्वविद्यालयों में आखिर छात्रसंघ चुनाव अब भी क्यों नहीं हो रहे हैं?
कर्नाटक में छात्र चुनावों की घोषणा से देशभर के विश्वविद्यालय परिसरों में लंबे समय से स्थगित पड़े चुनावों पर बहस फिर तेज हुई
कर्नाटक सरकार द्वारा राज्य के विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराने की हालिया घोषणा के बाद भारत में कैंपस लोकतंत्र को लेकर लंबे समय से चल रही बहस फिर तेज हो गई है। हालांकि कई विश्वविद्यालयों में नियमित रूप से छात्र चुनाव होते हैं, लेकिन देश के कई बड़े और प्रतिष्ठित कैंपसों में चुनाव या तो वर्षों से बंद हैं या उनकी जगह वैकल्पिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था लागू कर दी गई है।
छात्र संगठनों का लंबे समय से तर्क रहा है कि विश्वविद्यालयों में छात्रों के प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के लिए चुनी हुई छात्रसंघ बेहद जरूरी हैं। वे इस संदर्भ में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हैं, जिसने कैंपस चुनाव कराने के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे।
इसके बावजूद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, राजस्थान विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और लखनऊ यूनिवर्सिटी जैसे कई विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय से ठप पड़े हैं।
यहां इन विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति के इतिहास और आखिरी बार चुनाव कब हुए थे, उस पर एक नजर:
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की लंबी और सक्रिय परंपरा रही है। यहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी छात्र सभा और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया जैसे राष्ट्रीय दलों से जुड़े छात्र संगठन कैंपस में सक्रिय रहे हैं।
हालांकि विश्वविद्यालय में 1990 के दशक के अंत से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं।
BHU के ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के कार्यकर्ता रोशन पांडे के अनुसार, “आखिरी छात्रसंघ चुनाव 1996 में हुआ था। 1997 में चुनाव की घोषणा हुई थी, लेकिन हिंसा की एक घटना के बाद विश्वविद्यालय अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया।”
समय-समय पर छात्र संगठनों ने सीधे चुनाव बहाल करने की मांग की है। लेकिन छात्रसंघ को फिर से शुरू करने के बजाय विश्वविद्यालय ने छात्र परिषद जैसे वैकल्पिक प्रतिनिधित्व मॉडल लागू करने की कोशिश की, जिसे आलोचक सीधे चुने गए प्रतिनिधियों जितना वैध नहीं मानते।
रोशन पांडे ने बताया, “2011 में छात्र परिषद के चुनाव घोषित हुए थे, लेकिन वह केवल एक साल ही चले। इसके बाद 2014 में भी परिषद चुनाव की घोषणा हुई, लेकिन हिंसा का हवाला देते हुए चुनाव नहीं कराए गए। तब से अब तक किसी भी प्रकार के चुनाव नहीं हुए हैं।”
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU)
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का छात्रसंघ भारत के सबसे पुराने छात्र संगठनों में से एक है और कैंपस जीवन में इसकी अहम भूमिका रही है।
यहां पदाधिकारियों का चुनाव सीधे मतदान से होता है। हालांकि उम्मीदवार आम तौर पर राष्ट्रीय छात्र संगठनों के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में नहीं लड़ते, लेकिन जीतने के बाद अक्सर किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ जाते हैं।
यह छात्रसंघ लंबे समय तक विश्वविद्यालय में छात्र नेतृत्व का एक प्रभावशाली मंच माना जाता रहा है।
NSUI के राज्य समिति सदस्य मोहम्मद रेहान के अनुसार, “AMU में 2018-19 के बाद से चुनाव नहीं हुए हैं। कैंपस में तनाव और कानून-व्यवस्था की चिंताओं के चलते चुनाव स्थगित कर दिए गए थे।”
उन्होंने बताया कि छात्रसंघ बहाल करने के लिए अदालत में याचिकाएं भी दायर की गई हैं और हाल ही में एक भूख हड़ताल भी हुई थी, जिसके बाद प्रशासन ने चुनाव कराने का आश्वासन दिया था।
लेकिन बाद में प्रशासन ने फिर कहा कि अभी चुनाव कराने के लिए माहौल अनुकूल नहीं है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ऐतिहासिक रूप से उत्तर भारत के सबसे राजनीतिक रूप से सक्रिय परिसरों में से एक माना जाता है। यहां से कई प्रमुख राजनीतिक नेता निकले हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और वी.पी. सिंह भी इस विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ (AUSU) को अक्सर मुख्यधारा की राजनीति का प्रशिक्षण केंद्र माना जाता रहा है।
कैंपस में अशांति या प्रशासनिक फैसलों के कारण कई बार चुनाव स्थगित किए गए, लेकिन अतीत में कई बार उन्हें फिर से शुरू भी किया गया।
हालांकि सबसे हालिया छात्र संघ चुनाव 2018 में हुआ था, जिसमें समाजवादी छात्र सभा (SCS) ने जीत हासिल की थी।
एनएसयूआई के इलाहाबाद विश्वविद्यालय इकाई अध्यक्ष सौरभ सिंह के अनुसार: “यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया था, जहां विश्वविद्यालय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर चुनाव न कराने की बात कही थी। चुनाव बहाल करने के लिए लगातार आंदोलन हुए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय ने अब तक इस पर कोई कदम नहीं उठाया है।”
राजस्थान विश्वविद्यालय
जयपुर स्थित राजस्थान विश्वविद्यालय लंबे समय से राज्य में छात्र राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र संघ (RUSU) के चुनावों में आमतौर पर ABVP और NSUI जैसे बड़े छात्र संगठनों के बीच कड़ा मुकाबला होता रहा है।
परंपरागत रूप से ये चुनाव हर साल होते थे और राज्य की राजनीति में भी इन्हें करीब से देखा जाता था। आखिरी चुनाव 2022 में हुआ था, जिसमें एक निर्दलीय उम्मीदवार — जो अब एनएसयूआई नेता हैं — विजेता बने थे।
एनएसयूआई कार्यकर्ता विजयपाल कुरी के अनुसार: “इसके बाद विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू करने का हवाला देते हुए चुनाव नहीं कराए। शुरुआत में 2023 में कहा गया था कि चुनाव सिर्फ स्थगित किए जा रहे हैं, लेकिन उसके बाद से अब तक चुनाव नहीं हुए। प्रशासन का कहना है कि चुनाव कराने से NEP लागू करने की प्रक्रिया प्रभावित होगी।”
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव लगभग दो दशकों से बंद हैं, जो भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों में सबसे लंबे अंतरालों में से एक है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया छात्र संघ का आखिरी चुनाव 2006 में हुआ था। इसके बाद प्रशासन ने कैंपस में अशांति की आशंका का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया रोक दी।
बताया जाता है कि उस समय छात्र संघ के अध्यक्ष की कथित पिटाई की घटना के बाद प्रशासन ने यह फैसला लिया था। 2017 में विश्वविद्यालय ने सिद्धांततः छात्र संघ बहाल करने पर सहमति जताई थी, लेकिन अब तक चुनाव दोबारा शुरू नहीं हुए हैं।
छात्र संगठनों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव न होने से छात्रों के पास अपनी समस्याएं उठाने के लिए कोई प्रतिनिधि मंच नहीं है।
जामिया के छात्र रोशन अब्बास ने कहा: “यह मांग कई बार उठाई गई है, हाल के समय में भी। इसी मुद्दे सहित कई मांगों को लेकर पिछले साल 17 छात्रों को निलंबित भी किया गया था।”
लखनऊ विश्वविद्यालय
लखनऊ विश्वविद्यालय में भी छात्र राजनीति का लंबा इतिहास रहा है। यहां का लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ (LUSU) कई ऐसे नेताओं के लिए मंच रहा है जो बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में गए।
हालांकि पिछले दो दशकों में कई बार छात्र संघ चुनाव लंबे समय तक स्थगित रहे हैं।
आखिरी छात्र संघ चुनाव सितंबर 2005 में हुआ था। इसके बाद कानूनी विवादों और कैंपस में हिंसा की आशंकाओं के कारण चुनाव प्रक्रिया लंबे समय तक ठप हो गई।
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र ज्योति कुमार राय के अनुसार, “हर जगह की तरह यहां भी आधिकारिक कारण अराजकता बताया गया, लेकिन असलियत यह है कि उस समय की बसपा सरकार को यह रास नहीं आया, क्योंकि पिछली बार जीतने वाले उम्मीदवार समाजवादी छात्र सभा से जुड़े थे।”

