
क्या सिनेमा में अब महिलाओं की कहानियां सच में केंद्र में आ रही हैं?
हाल के सालों में फिल्मों में महिला किरदार पहले से ज्यादा मजबूत, जटिल और वास्तविक नजर आ रहे हैं.
सिनेमा में महिलाओं की भूमिका को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है. हाल के सालों में फिल्मों में महिला किरदार पहले से ज्यादा मजबूत, जटिल और वास्तविक नजर आ रहे हैं, लेकिन फिल्म क्रिटिक Aseem Chhabra का मानना है कि ये बदलाव अभी पूरी तरह स्थायी नहीं हुआ है, बल्कि अभी भी ये कुछ हद तक अपवाद (exceptions) ही है.
महिला किरदार अब ज्यादा रियल और लेयर्ड
आज की फिल्मों में महिला किरदार पहले के मुकाबले ज्यादा गहराई वाले हो गए हैं. पहले जहां फिल्मों में रोती-बिलखती मां या स्टीरियोटाइप रोल दिखाए जाते थे, अब महिलाओं को फ्लॉज, इमोशंस और कॉम्प्लेक्सिटी के साथ दिखाया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर Anatomy of a Fall और Poor Things जैसी फिल्मों में महिला किरदार ग्रे शेड्स में नजर आते हैं. जहां दर्शक ये तय नहीं कर पाते कि वो सही हैं या गलत. यही चीज उन्हें ज्यादा असली और दिलचस्प बनाती है.
महिला केंद्रित कहानियां ,लेकिन क्या यह ट्रेंड है?
Hamnet जैसी फिल्में पूरी तरह महिला किरदार पर आधारित हैं. इसे Chloé Zhao ने डायरेक्ट किया है और इसमें मुख्य फोकस महिला के इमोशनल सफर पर है. लेकिन असीम छाबड़ा मानते हैं कि इसे कोई बड़ा ट्रेंड कहना जल्दबाजी होगी. उनके अनुसार, “कभी-कभी ऐसी फिल्में बनती हैं जहां महिला पूरी कहानी का केंद्र होती है, लेकिन ये हर साल होने वाली चीज नहीं है.”
महिलाओं के लिए नए तरह के रोल
एक और बड़ा बदलाव ये है कि अब उम्रदराज एक्ट्रेसेस के लिए भी मजबूत रोल लिखे जा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर फिल्म Weapons में Amy Madigan ने एक नेगेटिव और डरावना किरदार निभाया, जिसे काफी सराहा गया. पहले कई एक्ट्रेसेस ऐसे रोल से बचती थीं, लेकिन अब वे रिस्क लेने के लिए तैयार हैं. जो इंडस्ट्री के बदलते सोच को दिखाता है.
कैमरे के पीछे भी बढ़ रही महिलाओं की मौजूदगी
इस साल ऑस्कर में सिनेमैटोग्राफर Autumn Durald Arkapaw की जीत ऐतिहासिक रही. सिनेमैटोग्राफी जैसे टेक्निकल फील्ड में लंबे समय से पुरुषों का दबदबा रहा है. उनकी जीत ये दिखाती है कि महिलाएं अब सिर्फ स्क्रीन पर ही नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे भी अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं. ये पल कुछ हद तक Frances McDormand के उस मशहूर ऑस्कर मोमेंट की याद दिलाता है, जब उन्होंने सभी महिला कलाकारों को खड़े होकर पहचान देने की अपील की थी.
क्या जेंडर टेक्निकल काम को प्रभावित करता है?
असीम छाबड़ा का मानना है कि डायरेक्शन और राइटिंग में महिला दृष्टिकोण साफ नजर आता है, लेकिन सिनेमैटोग्राफी या एडिटिंग जैसे टेक्निकल काम में ये फर्क उतना स्पष्ट नहीं होता. उदाहरण के लिए, Thelma Schoonmaker ने Martin Scorsese की फिल्मों को एडिट किया है, जिनमें Raging Bull जैसी हिंसक फिल्म भी शामिल है. ये दिखाता है कि टैलेंट और क्रिएटिव समझ जेंडर से ज्यादा मायने रखती है.
ऑस्कर में बदलाव
ऑस्कर अवॉर्ड्स में भी महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है, लेकिन आंकड़े अभी भी बराबरी नहीं दिखाते. Kathryn Bigelow पहली महिला थीं जिन्होंने बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर जीता Chloé Zhao ने भी ये अवॉर्ड जीता, लेकिन आज भी इस कैटेगरी में महिलाओं की संख्या बेहद कम है. ये साफ दिखाता है कि इंडस्ट्री में बदलाव हो रहा है, लेकिन अभी भी पुरुषों का दबदबा कायम है.
बदलाव शुरू हुआ है, लेकिन अधूरा है
कुल मिलाकर, सिनेमा में महिलाओं की कहानियां अब पहले से ज्यादा मजबूत और केंद्र में जरूर आई हैं. किरदारों में गहराई आई है, नए तरह के रोल मिल रहे हैं और कैमरे के पीछे भी महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. लेकिन ये बदलाव अभी पूरी तरह स्थायी नहीं है. इसे एक मजबूत ट्रेंड बनने में अभी समय लगेगा. फिर भी, ये कहना गलत नहीं होगा कि सिनेमा अब धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा है जहां महिलाओं की कहानियां सिर्फ सहायक नहीं, बल्कि मुख्य धारा (mainstream) बनेंगी.

