
Colonel Santosh Babu: पढ़ाई से लेकर बलिदान तक, जानिए ‘बैटल ऑफ गलवान’ के असली हीरो की पूरी कहानी
सलमान खान की फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ में दिखाए जा रहे कर्नल संतोष बाबू की असली कहानी.
सलमान खान की आने वाली फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ साल 2020 में हुए भारत-चीन सीमा संघर्ष में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि है. इस फिल्म में सलमान का किरदार जिस बहादुर अफसर से प्रेरित बताया जा रहा है, उनका नाम है कर्नल बिक्कुमल्ला संतोष बाबू. आज हम आपको बताएंगे कि कर्नल संतोष बाबू ने कहां से पढ़ाई की, उनके पास कितनी डिग्रियां थीं, भारतीय सेना में उनका सफर कैसा रहा और उन्होंने देश के लिए किस तरह सर्वोच्च बलिदान दिया.
कर्नल संतोष बाबू का बचपन और परिवार
कर्नल संतोष बाबू का जन्म 13 फरवरी 1983 को तेलंगाना के सूर्यापेट जिले में हुआ था, जो पहले आंध्र प्रदेश का हिस्सा था. वो ऑफ इंडिया के रिटायर्ड मैनेजर बिक्कुमल्ला उपेंद्र और उनकी पत्नी मंजुला के इकलौते बेटे थे. बचपन से ही संतोष बाबू पढ़ाई में होशियार और अनुशासनप्रिय थे. उनके अंदर देशसेवा की भावना बहुत कम उम्र से ही दिखाई देने लगी थी.
स्कूल से सैनिक स्कूल तक का सफर
कर्नल संतोष बाबू ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मंचरियाल जिले के श्री सरस्वती शिशुमंदिर स्कूल से की. यहां उन्होंने पहली से पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी. इसके बाद उन्होंने कोरुकोंडा के सैनिक स्कूल में दाखिला लिया. सैनिक स्कूल में पढ़ाई ने उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाया और यहीं से उनका सपना पक्का हो गया कि वे भारतीय सेना में अफसर बनेंगे.
NDA और IMA से मिली सैन्य शिक्षा
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद संतोष बाबू ने साल 2000 में नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) के 105वें कोर्स में प्रवेश लिया. यहां वो नवंबर स्क्वाड्रन से जुड़े थे. NDA से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने 2004 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से पास होकर भारतीय सेना में कमीशन हासिल किया. यानी कर्नल संतोष बाबू के पास सैनिक स्कूल, NDA और IMA से मिली प्रोफेशनल मिलिट्री ट्रेनिंग की मजबूत नींव थी. यही उनकी सबसे बड़ी डिग्री थी एक ट्रेंड प्रोफेशनल आर्मी ऑफिसर की.
सेना में कमीशन और शुरुआती तैनाती
10 दिसंबर 2004 को उन्हें 16 बिहार रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला. शुरुआत में उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई, जहां उन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियानों में हिस्सा लिया था. उनकी मेहनत और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए. 10 दिसंबर 2006 को उन्हें कप्तान बनाया गया. 10 दिसंबर 2010 को उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया था.
देश-विदेश में सेवाएं और ट्रेनिंग
सेना में रहते हुए संतोष बाबू ने कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं थी. उन्होंने वेलिंगटन के डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज में भी ट्रेनिंग ली, जो भारतीय सेना के चुनिंदा अफसरों को दी जाती है. वो कुछ समय तक राष्ट्रीय राइफल्स के साथ जुड़े रहे और अफ्रीका के कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के तहत भी तैनात रहे.
लेफ्टिनेंट कर्नल से कर्नल तक का सफर
साल 2017 में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत किया गया. इसके बाद उन्हें 35 इन्फैंट्री ब्रिगेड के मुख्यालय में GSO-I के रूप में नियुक्त किया गया. साल 2019 में वे फिर से जम्मू-कश्मीर में तैनात हुए और 2 दिसंबर 2019 को उन्होंने अपनी यूनिट 16 बिहार रेजिमेंट की कमान संभाली. फरवरी 2020 में उन्हें पूर्ण कर्नल के पद पर पदोन्नत किया गया.
गलवान घाटी में ऑपरेशन स्नो लेपर्ड
कर्नल संतोष बाबू ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान. पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में अपनी यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर थे. उन्हें दुश्मन के सामने एक ऑब्जर्वेशन पोस्ट स्थापित करने का काम सौंपा गया था. 15 जून 2020 की रात भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच आमने-सामने की हैंड-टू-हैंड फाइट हुई.
वीरगति और सर्वोच्च बलिदान
इस संघर्ष के दौरान कर्नल संतोष बाबू गंभीर रूप से घायल हो गए थे. लेकिन घायल होने के बावजूद वे अपनी आखिरी सांस तक वीरतापूर्वक लड़ते रहे. उन्होंने अपनी यूनिट का नेतृत्व किया और अपने जवानों को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश के लिए लड़ते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया. इसके बाद उनको महावीर चक्र से सम्मान भी दिया गया. उनकी बहादुरी, नेतृत्व और साहस को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया. ये भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है. साल 2021 में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने ये सम्मान उनके परिवार को प्रदान किया.
क्यों खास है कर्नल संतोष बाबू की कहानी?
कर्नल बिक्कुमल्ला संतोष बाबू की कहानी उन गुमनाम नायकों में से एक है, जिन्होंने बिना किसी शोहरत की चाह के देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. उनका जीवन हमें सिखाता है अनुशासन, नेतृत्व, निडरता और सच्ची देशभक्ति. सलमान खान की फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ के जरिए देश एक बार फिर कर्नल संतोष बाबू की वीरता को याद करेगा. सैनिक स्कूल से लेकर NDA, IMA और फिर भारतीय सेना के कर्नल बनने तक का उनका सफर प्रेरणा से भरा है. गलवान घाटी में उनका बलिदान भारतीय इतिहास में हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा. कर्नल संतोष बाबू सिर्फ एक अफसर नहीं थे, वो भारत की मिट्टी के सच्चे हीरो थे.

