
Dhurandhar The Revenge Review: पब्लिक को खुश करने का 'धुरंधर' फॉर्मूला, कहानी बेकार, एक्शन शानदार
धुरंधर-2 का मुख्य किरदार जकीरत सिंह रांगी (रणवीर सिंह) एक तरफ राष्ट्रीय कर्तव्य से बंधा है और दूसरी तरफ अपने निजी अतीत से जूझ रहा है। कहानी में 'स्मार्ट ट्विस्ट' डालने की कोशिश की गई है।
Dhurandhar-2 Movie Review: निर्देशक आदित्य धर की महत्वाकांक्षी दो-भागों वाली गाथा, 'धुरंधर', अब अपने दूसरे अध्याय 'धुरंधर: द रिवेंज' के साथ पूरी हो गई है। लगभग आठ घंटे लंबे इस सिनेमाई सफर को देखकर एक बात तो साफ है, अगर संपादक शिवकुमार वी. पणिक्कर और संगीतकार शाश्वत सचदेव न होते, तो यह फिल्म अपनी ही हिंसा के बोझ तले दब जाती। फिल्म की तकनीकी टीम ने पूरी कोशिश की है कि एक बिखरी हुई और उबाऊ कहानी को अनुभव में बदल दिया जाए, लेकिन क्या केवल तकनीक एक फिल्म को महान बना सकती है?
कहानी और निर्देशन की चुनौतियां
आदित्य धर ने फिल्म को छह अध्यायों में बांटा है, लेकिन यह विभाजन कहानी को कोई खास गहराई नहीं देता। फिल्म का रनटाइम 229 मिनट है, जो दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेता है। कहानी में 'स्मार्ट ट्विस्ट' डालने की कोशिश तो की गई है, लेकिन वे अक्सर बेतुके लगते हैं। फिल्म एक प्रतिशोध की गाथा होने का दावा करती है, जो केवल आतंकवाद के खिलाफ है, न कि किसी देश या समुदाय के। लेकिन, फिल्म के भीतर के संवाद और घटनाक्रम कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
फिल्म में मानवीय संवेदनाओं, जैसे प्यार, नुकसान, गुस्सा और वफादारी को दिखाने की पूरी गुंजाइश थी। मुख्य किरदार जकीरत सिंह रांगी (रणवीर सिंह) एक तरफ राष्ट्रीय कर्तव्य से बंधा है और दूसरी तरफ अपने निजी अतीत से जूझ रहा है। लेकिन आदित्य धर ने इन भावनाओं को गहराई से तलाशने के बजाय 'ट्रिगर-हैप्पी' (ज्यादा गोलीबारी और हिंसा) होने का रास्ता चुना।
विवादास्पद राजनीति और चित्रण
'धुरंधर: द रिवेंज' कई जगहों पर केवल एक खास विचारधारा को खुश करने की कोशिश करती नजर आती है। फिल्म में 2014 के चुनावों, खालिस्तानी उग्रवाद, और अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दों का जिक्र जिस तरह से किया गया है, वह सिनेमाई से ज्यादा प्रोपेगेंडा जैसा लगता है। 2016 की एक प्रमुख वास्तविक घटना को 'ऑपरेशन ग्रीन लीफ' का नाम देकर सरकार के मास्टरस्ट्रोक के रूप में पेश करना, कहानी की मौलिकता पर सवाल खड़े करता है।
हिंसा का स्तर इतना अधिक है कि वह रोमांच पैदा करने के बजाय विचलित करने लगता है। संवादों को 'घूस के जवाब देंगे' जैसी शैली में रखा गया है, जो शायद तालियां बटोरने के लिए तो ठीक हैं, लेकिन एक परिपक्व सिनेमा के मापदंडों पर खरे नहीं उतरते।
कलाकारों का प्रदर्शन
रणवीर सिंह ने हमजा और जकीरत सिंह रांगी की दोहरी भूमिका में अपनी पूरी जान झोंक दी है। उनकी प्रतिबद्धता काबिले तारीफ है। हालांकि, बाकी कलाकार फीके नजर आते हैं। संजय दत्त का किरदार 'चौधरी असलम' एकतरफा और उबाऊ है। अर्जुन रामपाल, जो एक आईएसआई अधिकारी की भूमिका में हैं, खौफ पैदा करने में नाकाम रहे हैं। आर. माधवन का किरदार 'अजय सन्याल' मर्दानगी की पुरानी दलीलों (हम मर्द हैं) के जरिए काम निकलवाता दिखता है, जो आज के सिनेमा में काफी बचकाना लगता है।
फिल्म में महिलाओं के लिए बहुत कम जगह है। सारा अर्जुन का किरदार 'यलीना' भावनात्मक होने के बावजूद बेबस नजर आता है। फिल्म का पूरा नैरेटिव पुरुष-प्रधानता के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है।
तकनीकी रूप से 'धुरंधर' एक उपलब्धि हो सकती है। कैमरा वर्क शानदार है और एक्शन कोरियोग्राफी में एक लय है। लेकिन फिल्म में परिपक्वता और स्पष्ट उद्देश्य की कमी है। यह फिल्म सिद्धांतों पर चलने के बजाय दर्शकों की 'डिमांड' को पूरा करने वाला एक 'कैटरिंग एजेंट' बन गई है। पुराने गानों के रीमिक्स (रंभा हो, थम्मा थम्मा) और आसान समाधानों के जरिए दर्शकों को खुश करने की कोशिश तो की गई है, लेकिन एक यादगार सिनेमा बनाने का मौका हाथ से निकल गया है।

