न चीख-पुकार, न खून-खराबा… फिर भी दिल चीर देती है ‘इक्कीस’, धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म का रिव्यू
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न चीख-पुकार, न खून-खराबा… फिर भी दिल चीर देती है ‘इक्कीस’, धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म का रिव्यू

धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ बिना शोर, बिना हिंसा के शहादत का दर्द दिखाती है. जानिए कैसी है श्रीराम राघवन की ये अलग वॉर बायोग्राफी.


बॉलीवुड में वॉर फिल्मों का एक तय फॉर्मूला रहा है. तेज म्यूजिक, दुश्मन को ललकारते डायलॉग, गोलियों की आवाज और आखिर में शहादत, लेकिन धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ इस भीड़ से बिल्कुल अलग रास्ता चुनती है. ये फिल्म न तो गला काटती है, न शोर मचाती है, फिर भी दर्शकों को अंदर तक रुला देती है. जब हम थिएटर में ‘इक्कीस’ देखने जाते हैं, तो हमें पहले से पता होता है कि कहानी एक शहीद की है. ये भी मालूम होता है कि अंत दुखद होगा. फिर भी हम ये फिल्म इसलिए देखते हैं ताकि उन गुमनाम नायकों को याद कर सकें, जिन्होंने देश के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी. ‘इक्कीस’ भी इसी भावना के साथ देखी जाती है, लेकिन ये उम्मीदों से कहीं ज्यादा गहराई तक असर करती है.

कहानी क्या है?

फिल्म की कहानी साल 2001 से शुरू होती है. पाकिस्तान के ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार के घर एक भारतीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर का स्वागत होने वाला है. ये भारतीय ब्रिगेडियर हैं मदनलाल खेत्रपाल (धर्मेंद्र). मदनलाल वही पिता हैं, जिनके बेटे अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) ने 1971 की भारत-पाक जंग में महज 21 साल की उम्र में शहादत दी थी. विभाजन के समय मदनलाल का परिवार सरगोधा (अब पाकिस्तान) से भारत आया था. ऐसे में सवाल उठता है जिस देश ने पहले उनका घर छीना और फिर उनका बेटा, उसी देश में यह पिता क्यों जाना चाहता है? इन्हीं सवालों के जवाब, अरुण खेत्रपाल की बहादुरी और एक पिता के भावनात्मक सफर को जानने के लिए आपको ‘इक्कीस’ देखनी होगी.

कैसी है फिल्म?

एक मशहूर कहावत है, “जो लोग युद्ध चाहते हैं, वे कभी लड़ते नहीं और जो लड़ते हैं, वे युद्ध नहीं चाहते।” ‘इक्कीस’ इसी सोच को पर्दे पर उतारती है. ये फिल्म उन परिवारों का दर्द दिखाती है, जिनका बेटा तिरंगे में लिपटकर घर लौटता है. यहां राष्ट्रवाद का शोर नहीं है, बल्कि खामोशी में छिपा दर्द है. न किसी की गर्दन उड़ती है, न लाशों के ढेर दिखते हैं, फिर भी शहादत की चुभन सीधे दिल में उतर जाती है. डायरेक्टर श्रीराम राघवन ने इस फिल्म को ‘धुरंधर’ या ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्मों के शोर से दूर रखा है. यहां लाउड बैकग्राउंड स्कोर नहीं, बल्कि भावनाओं का ठहराव है. ये आज के वायलेंस ट्रेंड के सामने खड़ा एक सशक्त और ईमानदार सिनेमा है.

राइटिंग और निर्देशन

‘इक्कीस’ का निर्देशन श्रीराम राघवन ने किया है और स्क्रिप्ट उन्होंने अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती के साथ मिलकर लिखी है. ‘बदलापुर’ और ‘अंधाधुन’ जैसी फिल्मों के लिए मशहूर श्रीराम यहां बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आते हैं. ये उनकी पहली वॉर बायोग्राफी है और उन्होंने बड़ा जोखिम लिया है. फिल्म भारत-पाक रिश्तों को अलग-अलग पीढ़ियों की नजर से दिखाती है. एक तरफ 21 साल का अरुण है, जो जोश से भरा हुआ है, तो दूसरी तरफ 30 साल बाद उसी जंग को देखने वाला पिता है, जिसके दिल में कड़वाहट नहीं, बल्कि समझ है. तकनीकी तौर पर भी फिल्म मजबूत है. टैंकों की लड़ाई को जिस सजीव तरीके से दिखाया गया है, वो हिंदी सिनेमा में कम ही देखने को मिलता है. ‘पूना हॉर्स’ रेजिमेंट और टैंक बटालियन का चित्रण रोंगटे खड़े कर देता है.

एक्टिंग

धर्मेंद्र इस फिल्म की आत्मा है. उनकी आंखों की खामोशी और चेहरे का दर्द बहुत कुछ कह जाता है. ये मानना मुश्किल होता है कि यह उनकी आखिरी फिल्म है. अगस्त्य नंदा ने एक अनुशासित आर्मी ऑफिसर के रूप में अच्छा काम किया है. कई जगह वो युवा अभिषेक बच्चन की याद दिलाते हैं. जयदीप अहलावत हमेशा की तरह दमदार हैं. असरानी छोटे रोल में मुस्कान छोड़ जाते हैं. सिमर भाटिया भी अपने किरदार में सधी हुई लगती हैं.

देखें या नहीं?

अगर आप सिर्फ मारधाड़, तेज डायलॉग और खून-खराबा देखने जाते हैं, तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है, लेकिन अगर आप दिल से बनी, सच्ची और संवेदनशील फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘इक्कीस’ जरूर देखें. ये फिल्म सिर्फ एक शहीद की कहानी नहीं, बल्कि उस गरिमा और दर्द की कहानी है, जिसे एक सैनिक का परिवार जीवन भर ढोता है. ‘बंदा’ के बाद अगर कोई फिल्म दिल से बनी है, तो वो ‘इक्कीस’ है. इस वीकेंड अपने नजदीकी सिनेमाघर में जाकर इस महान शहीद की अनकही कहानी का हिस्सा जरूर बनिए.

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