मनगढ़ंत आंकड़े और असली गुस्सा: कैसे समाज को बांट रही द केरल स्टोरी?
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मनगढ़ंत आंकड़े और असली गुस्सा: कैसे समाज को बांट रही 'द केरल स्टोरी'?

केरल स्टोरी 2: देखिए कैसे यह फ्रेंचाइजी सिनेमा को कहानी से हटाकर एक सोची-समझी पॉलिटिकल मैसेजिंग और क्रूड प्रोपेगेंडा का खतरनाक हथियार बना रही है।


The Kerala Story 2 : 'द केरल स्टोरी' (2023) का पूरा ताना-बाना एक विशिष्ट आधार पर टिका था। फिल्म का दावा था कि राज्य की 32,000 महिलाओं का धर्मांतरण किया गया। दावा था कि उन्हें वैश्विक आतंकी नेटवर्क में भर्ती किया गया। यही चौंकाने वाली संख्या फिल्म की मार्केटिंग का मुख्य हथियार बनी। हालांकि, यही इसका सबसे कमजोर तथ्यात्मक आधार भी साबित हुई। सुदीप्तो सेन द्वारा निर्देशित यह फिल्म काफी चर्चा में रही। अदा शर्मा ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म एक नर्सिंग छात्रा की कहानी दिखाती है। फिल्म के अनुसार, उसे मुस्लिम सहपाठियों ने सोची-समझी साजिश के तहत फंसाया। फिर उसे धर्मांतरित कर 'इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया' (ISIS) के क्षेत्र में भेजा गया। यह फिल्म उसकी प्रताड़ना को एक संगठित ऑपरेशन के रूप में पेश करती है। इसे हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने वाले 'लव जिहाद' के रूप में दिखाया गया।

ईमानदारी से बात करें तो मुद्दा केवल धर्मांतरण का नहीं है। कट्टरपंथ के मामले भारतीय अदालतों में पहले भी आए हैं। दशकों से अंतरधार्मिक विवादों के मामले दर्ज होते रहे हैं। लेकिन 32,000 महिलाओं की एक व्यापक साजिश का दावा संदिग्ध है। इस दावे ने ही फिल्म के विभाजनकारी निर्माण को उजागर किया। इस संख्या को तथ्य-जांचकर्ताओं ने बार-बार चुनौती दी है। उन्होंने इसे पूरी तरह गलत और निराधार साबित किया है। मार्केटिंग का यह केंद्रीय स्तंभ आज भी बिना किसी ठोस समर्थन के खड़ा है। इसी बीच 'द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड' रिलीज के लिए तैयार है। यह फिल्म 27 फरवरी को सिनेमाघरों में दस्तक देगी।

गलत सूचनाओं का गणित और कानूनी बाधाएं

मई 2023 में पहले भाग की रिलीज से पहले मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने इसके प्रचार में की गई अतिशयोक्ति पर लगाम लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति तो दे दी। लेकिन निर्माताओं को एक सख्त निर्देश भी दिया गया। उन्हें फिल्म में एक डिस्क्लेमर शामिल करना पड़ा। इसमें स्पष्ट किया गया कि 32,000 का आंकड़ा सत्यापित नहीं है। चूंकि निर्माता इस संख्या का कोई भी सबूत पेश नहीं कर सके। इसलिए अंततः उन्हें फिल्म के टीज़र को बदलना पड़ा। उन्होंने इसे 32,000 के बजाय केवल 'तीन' लड़कियों की कहानी बताया।

प्रोपेगेंडा की दुनिया में 'बिग लाई' (बड़ा झूठ) तकनीक का उपयोग होता है। एडोल्फ हिटलर ने अपनी पुस्तक 'मीन काम्फ' में इसका जिक्र किया था। यह तकनीक जनता के मन में एक चौंकाने वाला आंकड़ा बिठाती है। भले ही बाद में उस आंकड़े को अदालत में खारिज कर दिया जाए। लेकिन समाज में नफरत पैदा करने का काम तब तक पूरा हो जाता है। इसका उद्देश्य पूरे राज्य को एक साजिश के हिस्से के रूप में दिखाना है। यह एक विशिष्ट समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश होती है। इसका मुख्य लक्ष्य लोगों के मन में डर पैदा करना है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और केरल की धर्मनिरपेक्ष छवि

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपनी आलोचना पर पूरी तरह अडिग हैं। उन्होंने 17 फरवरी को दूसरे भाग का ट्रेलर आने के बाद इसकी कड़ी निंदा की। विजयन ने फिल्म को "गढ़ा हुआ नैरेटिव" करार दिया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना है। यह फिल्म राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल करने के लिए बनाई गई है। विजयन के अनुसार, हिंदुत्व ब्रिगेड को राज्य की यह छवि पसंद नहीं आती। वरिष्ठ कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी अपनी आवाज बुलंद की है। उन्होंने फिल्म पर 'नफरत फैलाने' का गंभीर आरोप लगाया है। थरूर का तर्क है कि सीक्वल उसी पुराने फॉर्मूले को दोहरा रहा है। उन्होंने धर्मांतरण के बड़े आंकड़ों पर कड़े सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक प्रचार सामग्री में दिए गए नंबरों का कोई स्रोत नहीं है।

इस फिल्म को केरल में भाजपा की आक्रामक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा लंबे समय से वामपंथी (LDF) और कांग्रेस (UDF) का गढ़ तोड़ना चाहती है। 2024 के आम चुनाव में त्रिशूर से सुरेश गोपी की जीत हुई थी। इसने पार्टी को राज्य में पहली संसदीय जीत दिलाई। इसके बाद दिसंबर 2025 में पार्टी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम जीता। केरल की विविध आबादी को लुभाने के लिए भाजपा सक्रिय है। पार्टी अब ईसाई समुदाय को भी अपने साथ जोड़ रही है। वह कृषि और 'लव जिहाद' जैसी उनकी चिंताओं पर बात कर रही है। जॉर्ज कुरियन जैसे नेताओं को कैबिनेट में जगह देना इसी का हिस्सा है।

कानूनी चुनौतियां और विरोधी का अमानवीयकरण

'द केरल स्टोरी 2' के सामने अब कानूनी मुश्किलें भी खड़ी हैं। केरल हाईकोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। इसमें फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ट्रेलर केरल को आतंकवाद का गढ़ दिखाता है। इससे पूरे राज्य और वहां के लोगों की छवि खराब हो रही है। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए सूचना मंत्रालय को नोटिस दिया है। सेंसर बोर्ड और निर्माता विपुल शाह को भी नोटिस जारी हुआ है। 24 फरवरी को इस मामले पर अगली सुनवाई होनी है। निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह इसे कानूनी मामलों पर आधारित बताते हैं। लेकिन यह दावा सच्चाई से काफी दूर नजर आता है।

प्रोपेगेंडा की सबसे बड़ी पहचान 'विरोधी का अमानवीयकरण' करना है। इस फिल्म में मुस्लिम पात्रों को केवल शिकारी दिखाया गया है। उन्हें जोड़-तोड़ करने वाले या कट्टरपंथियों के रूप में पेश किया गया। यह फिल्म हिंदू महिलाओं के विवेक को भी नकारती है। यह उन्हें 'भोली-भाली' बताकर उनकी निर्णय क्षमता पर सवाल उठाती है। यह जताती है कि उन्हें सुरक्षा के लिए किसी बाहरी ताकत की जरूरत है। सीक्वल की टैगलाइन "अब सहेंगे नहीं... लड़ेंगे" काफी आक्रामक है। यह स्पष्ट रूप से लोकलुभावन लामबंदी की भाषा है। यह समाज के एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ उकसाती है।

हिंसा का राष्ट्रीयकरण और कला का पतन

कहानी अब केरल से निकलकर राजस्थान और मध्य प्रदेश तक फैल गई है। फ्रेंचाइजी इस मुद्दे का राष्ट्रीयकरण करना चाहती है। फिल्म 'एट्रोसिटी पोर्न' का भरपूर सहारा लेती है। इसमें जबरन मांस खिलाने जैसे विचलित करने वाले दृश्य हैं। ये दृश्य दर्शकों के तार्किक दिमाग को सुन्न कर देते हैं। इससे लोगों में केवल डर या गुस्से की भावना पैदा होती है। सच्ची कला हमेशा समाज की जटिलताओं को दिखाती है। लेकिन जब सिनेमा केवल क्रोध भड़काता है, तो वह कला नहीं रहता। यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन बन जाता है। अदिति भाटिया और उल्का गुप्ता अभिनीत यह सीक्वल अधिक खतरनाक हो सकता है। इसमें अंतरधार्मिक संबंधों के बाद होने वाली हिंसा को बढ़ाया गया है।

सच्ची कला हमेशा सत्ता के सामने सवाल खड़े करती है। लेकिन 'द केरल स्टोरी' को सत्ता का पूरा समर्थन प्राप्त है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री स्वयं फिल्म का जमकर प्रचार करते हैं। राज्यों द्वारा इसे 'टैक्स-फ्री' करना इसे 'सरकारी सच' बना देता है। ऐसी स्थिति में फिल्म की सटीकता पर सवाल उठाना मुश्किल है। सवाल उठाने वालों को अक्सर 'राष्ट्रविरोधी' करार दिया जाता है। यह आलोचकों को चुप कराने का एक प्रभावी तरीका बन गया है। फिल्म की कमाई को ही इसके 'सत्य' होने का प्रमाण माना गया। 20-30 करोड़ के बजट वाली फिल्म ने 300 करोड़ से ज्यादा कमाए। लेकिन इसकी असली सफलता बॉक्स ऑफिस कलेक्शन नहीं है।

लोकतंत्र की जिम्मेदारी और भविष्य का संकट

इस फिल्म की असली 'उपलब्धि' जनता की सच पहचानने की शक्ति खत्म करना है। यह सार्वजनिक समझ को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। दार्शनिक हन्ना अरेंड्ट ने इस स्थिति पर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि प्रोपेगेंडा का असली शिकार वह है जो सच-झूठ में अंतर न कर पाए। केरल स्टोरी फ्रेंचाइजी ठीक यही काम कर रही है। यह फिल्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गई है। यह समुदायों के बीच नफरत की खाई को गहरा करने का उपकरण है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कहानीकार की जिम्मेदारी पुल बनाने की होती है। लेकिन यह फिल्म समाज को बांटने और उकसाने का काम कर रही है। यह नफरत की राजनीति को खाद-पानी देने का एक माध्यम बन गई है।

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