Manoj Kumar: वो अभिनेता जिन्होंने देशभक्ति को सिनेमा में पहचान दी
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Manoj Kumar: वो अभिनेता जिन्होंने देशभक्ति को सिनेमा में पहचान दी

मनोज कुमार, जिन्हें लोग प्यार से 'भारत कुमार' कहते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे.


मनोज कुमार (1937–2025) ने अपनी फिल्मों में 'भारत' का किरदार बड़ी ही सादगी और विनम्रता से निभाया. वो कभी सीना ठोकने वाले नायक नहीं थे. बल्कि जमीन से जुड़े एक संघर्षरत बेटे की तरह दिखाई दिए. उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि एक जागरूकता और जिम्मेदारी से भरी सिनेमा की मिसाल थीं. मनोज कुमार जिन्हें लोग प्यार से 'भारत कुमार' कहते थे. अब हमारे बीच नहीं रहे. 87 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. उन्होंने हिंदी सिनेमा को वो देशभक्ति दी जो ना तो जोर-जबरदस्ती थी और ना ही सिर्फ नारेबाजी. बल्कि दिल से निकली हुई सच्ची भावना थी.

जन्म और शुरुआती जीवन

मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी था. उनका जन्म 24 जुलाई 1937 को एबटाबाद अब पाकिस्तान में हुआ था. भारत-पाक विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया. बचपन का ये विस्थापन उनके दिल में हमेशा के लिए बस गया और बाद में उनके फिल्मों में भी झलकने लगा. दिल्ली में उन्होंने हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. बचपन से ही वे दिलीप कुमार के बहुत बड़े फैन थे, और उन्हीं के किरदार मनोज से प्रेरित होकर उन्होंने अपना नाम बदल लिया.

फिल्मी सफर की शुरुआत

1957 में फिल्म फैशन से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन शुरुआती कुछ फिल्में जैसे साहारा, चांद, और हनीमून ज्यादा नहीं चलीं. 1962 में आई हरियाली और रास्ता ने उन्हें पहचान दिलाई, लेकिन असली सफलता मिली 1964 की फिल्म वो कौन थी? इस थ्रिलर फिल्म के गाने लग जा गले और नैना बरसे आज भी लोगों की जुबान पर हैं.

असली मोड़: देशभक्त का किरदार

1965 में आई फिल्म शहीद, जिसमें उन्होंने भगत सिंह का किरदार निभाया, उनकी पहचान बदल गई. ये फिल्म न सिर्फ लोगों को पसंद आई, बल्कि तब के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तक इस फिल्म से प्रभावित हुए. शास्त्री जी के नारे जय जवान, जय किसान से प्रेरित होकर मनोज कुमार ने उपकार (1967) बनाई. ये उनकी डायरेक्टोरियल डेब्यू भी थी. इस फिल्म ने किसानों और सैनिकों की सच्ची कहानी दिखाई और सुपरहिट रहीय. मेरे देश की धरती सोना उगले जैसे गाने तो आज भी देशभक्ति के मौके पर बजते हैं. इस फिल्म के बाद उन्हें भारत कुमार कहा जाने लगा.

समाज और देश के लिए सिनेमा

1970 के दशक में उन्होंने रोटी कपड़ा और मकान, पूरब और पश्चिम, क्रांति जैसी फिल्में बनाई, जिनमें गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और देशप्रेम जैसे मुद्दे दिखाए गए. उन्होंने कभी स्टार बनने के लिए फिल्मों को नहीं चुना, बल्कि समाज का आईना दिखाने के लिए चुना. मनोज कुमार की फिल्में कभी-कभी आलोचना का शिकार भी हुईं कि वो बहुत भावुक हैं या ज्यादा देशभक्त हैं, लेकिन उनकी सच्चाई, ईमानदारी और सोच में देश के लिए प्यार साफ झलकता था.

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